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जरूर पढ़ें : यहाँ के बांसुरी की धुन कभी गूंजती थी वृन्दावन में

[gidhaur.com | धोरैया(बांका)] :-  जिला के धोरैया प्रखंड क्षेत्र के बबुरा पंचायत अंतर्गत मकैता गांव के बीहारपुर टोला के 8 नं. वार्ड  में हस्तकला से निर्मीत बासुंरी का निर्माण किया जाता है। फिर भी इनकी गरीबी देखते ही बनती है। कारण कि  इनको ना तो सरकार कि तरफ से कोई सहायता मिल पाई है ना ही प्रशासन की ओर से। यहां लगभग 100 से 125 घरों में जिनकी आबादी लगभग 500 के आसपास है, इसी रोजगार से जुड़े हुए हैं। बासुंरी बनाना और दूर दराज के मेले में जाकर बेचना ही इनकी जिन्दगी है। 

बिहार-झारखंड तक सिमट कर रह गई बांसुरी की बिक्री 

 बांसुरी बनाने वाले कारीगर बजरंगी राम, सुखदेव राम, रंजीत राम, गुच्छो राम, अनिल राम, तनीक राम, शिवनारायण राम, योगेन्द्र राम, चंदन राम, रूदल राम, अनिरूद्ध राम, वकील राम इत्यादी लोगों ने बताया कि हमारे माता पिता भी इसी काम से जुड़े हुए थे। वहां मौजूद कारीगर ने बताया कि कभी हमलोग तरह तरह की बांसुरी का निर्माण कर टाटा, वृंदावन,दिल्ली, कलकत्ता आदि के बाजार में भी बेचा करते थे, लेकिन बढ़ती मंहगाई के कारण हमारा बाजार झारखण्ड और बिहार के बाजारों में ही सिमट कर रह गई है।

कम आमदनी से घर चलाना मुश्किल

बांसुरी बनाने के लिये लगने वाली बांस की भोग नली भी मंहगी हो गई है, लिहाजा इसके निर्माण में राशि बढ़ जाने के कारण आमदनी कम हो गई है और घर चलाना भी मुश्किल हो गया है। जितने हाथ उतने काम की कहावत पर उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करते हैं इसलिए हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नही दे पाते।

बांसुरी बनाते कारीगर

सिमटता जा रहा है बांसुरी उद्योग
सरकार अगर इस उद्योग पर ध्यान दे तो यह एक वृहद उद्योग माना जा सकता है और इसे एक बार फिर से लम्बी दूरी के बजारों में बेचा जा सकता है। नई-नई बादनों के आने के बाद भी बांसुरी की मांग बरकरार है लेकिन लागत और आमदनी धीरे धीरे घटने से यह उद्योग भी सिमटता जा रहा है। जिससे हम सभी चिंतित हैं। पहले हमलोग बांस कि फोंक नली दुर्गापुर से लाते थे लेकिन पैसों कि कमी के चलते अभी भागलपुर के हबीबपुर से लाते हैं। 

घूम-घूमकर बेचते हैं बांसुरी

उन्होंने अपना दुखड़ा सुनाते हुए यह भी कहा कि अगर सरकार हम कारीगरों की मदद करे तो एक बार फिर हम वृहद पैमाने पर बांसुरी का उत्पादन करते हुए कई राज्यों में अपनी बांसुरी कि धुन पहुँचाकर अपने प्रखंड और जिले को गौरवान्वित कर सकते है।
पाठकों को बता दें कि करीगरों की मेहनत से तैयार की गई बांसुरी से वृन्दावन का भी इलाका गूंजता था पर आज महंगाई के बाजार में वो धुन विलुप्त होते जा रही है।

(अरुण कुमार गुप्ता)
बांका  |  13/06/2018, बुधवार