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चकाई : आजादी के 70 दशक बाद भी शोषित और पीड़ित हैं आदिवासी


   {चकाई | श्याम सिंह तोमर}

गुरूवार को एसकेएस हाईस्कूल प्रांगण में 24वां अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस धूमधाम से मनाया गया. वहीं कार्यक्रम की शुरुआत जिप सदस्य रामलखन मुर्मू,एस आई नुनुवां टुडू एवं कई ग्राम प्रधानों द्वारा दिप प्रज्वल्लित कर किया गया. सभा में आये अतिथियों का स्वागत आदिवासी नृत्य , गायन एवं माला पहनाकर लड़कियों द्वारा किया गया. वहीं सभा को संबोधित करते हुए चकाई थाने के एस आई नुनुवां टुडू ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस सिर्फ उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व, संघर्ष, हक-अधिकारों और इतिहास को याद करने के साथ-साथ जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की समीक्षा करने के मनाया जाता है. आगे बताया कि आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में विश्व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया गया था. इसके बाद विश्व के सभी देशों में अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस को मनाया जा रहा है,पर अफसोस भारत के आदिवासी समुदाय आज भी उपेक्षित है. वही कार्यक्रम के अध्यक्षता कर रहे जिप सदस्य रामलखन मुर्मू ने कहा कि आजादी के सात दशक बाद भी देश के आदिवासी उपेक्षित, शोषित और पीड़ित हैं.

आदिवासी समाज की पर्व त्योहार सोहराय एवं विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर सरकार को सरकारी छुट्टियां देनी चाहिए थी परंतु सरकार इसे नजरअंदाज कर रही है. आदिवासी समुदाय के लोगों कोई सुनने वाला नही है. आदिवासी को आरक्षण के नाम पर सिर्फ एक प्रतिशत ही संतुष्ट करना पड़ रहा है. जंगल एवं पहाड़ों पर रहने वाले आदिवासियों समुदाय के लोगों को नक्सली कहकर प्रताड़ित करना पुलिस प्रशासन बन्द करें अन्यथा विवश होकर आदिवासी समाज के लोग चरणबद्ध तरीके आंदोलन करेगी.वही उन्होंने कहा कि पर्यावरण को दूषित होने से बचाने में आदिवासी समुदाय के लोगों का अहम योगदान दे रही है जिस कारण माफिया लोग जंगल की पेड़ों को काटने साहस नहीं जुटा पाते हैं.

वहीं आदिवासी नेता मुंशी मरांडी ने कहा कि राजनीतिक पार्टियाँ और नेता वोट बैंक हेतु आदिवासियों के उत्थान की बात करते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं करते. आज जंगली एवं पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार एवं विकास का जो वातावरण निर्मित होना चाहिए, वैसा नहीं हो पा रहा है, इस पर कोई ठोस आश्वासन इन निर्वाचित सरकारों से मिलना चाहिए अक्सर आदिवासियों की अनदेखी कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ लेने वाली बातों को हवा देना एक परम्परा बन गयी है.

मौके पर मुंशी बेसरा, रमेश हेम्ब्रम, पूरन सोरेन, चुनचुन मुर्मू, नायका मरांडी, नुनुलाल बेसरा आदि सैंकड़ो आदिवासी समुदाय के लोग उपस्थित थे.