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गिद्धौर : बनझुलिया का विषहरी स्थान जहाँ पूरी होती है भक्तों की हर मुरादें

{gidhaur.com | डब्लू पंडित/अभिषेक कुमार झा} :
गिद्धौर की ऐतिहासिक धरती पर धर्म और अध्यात्म का विशेष महत्व रहा है। गिद्धौर एवं इसके अंतर्गत आने वाले 8 पंचायतों में से हरेक पंचायत में धर्म और अध्यात्म का स्थल है जो स्थानीय लोगों के लिए आस्था और विश्वास का केन्द्र बना है। इसी स्थलों में पतसंडा पंचायत अंतर्गत बनझुलिया गाँव स्थित माँ विषहरी से स्थानीय लोगों की आस्था जुड़ी है, जहाँ सच्चे मन और निर्मल हृदय से माँगी गई हर मुरादें पूरी होती है।

प्रखंड कार्यालय से महज 1.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बनझुलिया गाँव की कुलदेवी एवं मंशा देवी कही जाने वाली माँ विषहरी की पूजा-अर्चना तो प्रत्येक दिन होती है लेकिन वर्ष में एक बार आश्विन शुक्ल पक्ष के अष्टमी अर्थात् जगरणा के दिन बड़े ही धूम- धाम से किया जाता है।

इस दिन यहाँ के पुजारियों एवं ग्रामीणों के द्वारा साँप, बिच्छू, डायन, जोगिन, इत्यादि से बचाव का विशेष मंत्र गाया जाता है। यद्यपि आधुनिक विज्ञान के आविर्भाव से भौतिक एवं जैविक दुनिया के बारे में मनुष्य के ज्ञान में तीव्र वृद्धि हुई है, परंतु हमारे समाज की शिक्षित व अशिक्षित दोनों ही वर्गों की बहुसंख्य आबादी निर्मूल एवं रूढ़िगत मान्यताओं की कट्टर समर्थक है, इस लेकर बनझुलिया में उक्त वार्षिक पूजा में समाज के लगभग हर वर्ग के लोगों की उपस्थिति देखी जाती है।
स्थानीय बुजुर्गों की यदि मानें तो, इस वार्षिक पूजा के दिन परिसर में पीतल के लोटे के साथ बैठते हैं जो कि मंत्र एवं माँ विषहरी की महिमा से स्वतः घूमने लगता है। इस घूर्नण के दौरान पूजारियों द्वारा महामंत्र का विधिवत उच्चारण किया जाता है।

पूजा की समाप्ति पर बरहा खेला जाता है और इस क्रम में स्थानीय भक्तगण अपने हाथों पर बरहा मरवाते है, सामने खड़े लोगों को ऐसा एहसास होता है कि मानों बड़ी जोर से चोटें लगी हो, लेकिन माँ बिषहरि की कृपा से चोट का एहसास नहीं होता है।

प्रतिदिन के अलावे अश्विन शुक्ल पक्ष में माँ विषहरी के भक्तगण अपनी श्रद्धा और इच्छाशक्ति से प्रसाद, झाप, फूलहारा इत्यादि का चढावा चढ़ाकर मंगल जीवन की कामना करते हैं। भव्य रूप से होने वाले इस वार्षिक पूजा का संचालान प्रजापति (कुम्हार) जाति के स्थानीय लोग करते हैं, जिसके पश्चात विशेष मंत्र उच्चारण कर कार्यक्रम समाप्त कर दी जाती है और मौजूद लोगों के साथ-साथ पूरे बनझुलिया के ग्रामीणों के बीच महाप्रसाद बाँटा जाता है।
बनझुलिया के कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि हमारे गाँव में लगभग सौ वर्षों से माँ  विषहरी की पूजा-अर्चना की परंपरा चलते आ रही है। बहुत पहले इस विषहरी पिंड के बगल में एक विशाल कटहल का पेड़ था, उस पेड़ के जड़ में एक बिल था जिसमें एक भयंकर साँप हमेशा देखा जाता था, लेकिन सर्प किसी को काटता नहीं था, आंधी की वजह से पेड़ गिर जाने के कारण उस स्थान पर सुखदेव पंडित नामक पुजारी ने उस स्थान पर एक नीम का पेड़ लगाया।

लेकिन वर्ष 2011 में आई तेज आंधी ने नीम के उस विशाल पेड़ को भी अपने चपेट में ले लिया। तब से मां विषहरी को पिण्डी के रूप में बनझुलिया के बीचों बीच स्थापित किया गया है, जहाँ स्थानीय ग्रामीणों की आस्था केन्द्रित होती है।