- उपेक्षा और अतिक्रमण की दोहरी मार झेल रहा ऐतिहासिक जलस्रोत
- बाजार का कूड़ा बना सबसे बड़ा खतरा, ग्रामीणों ने संरक्षण की उठाई मांग
- कभी मछली पालन और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र रहा तालाब, अब बन चुका है डंपिंग यार्ड
गिद्धौर/जमुई। गिद्धौर प्रखंड मुख्यालय अंतर्गत पतसंडा पंचायत स्थित ऐतिहासिक राजमहल के पीछे का तालाब आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी गिद्धौर की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाने वाला यह ऐतिहासिक जलस्रोत अब उपेक्षा, प्रदूषण और अतिक्रमण की मार झेलते हुए अपने अस्तित्व को बचाने की जंग लड़ रहा है। पूरे गिद्धौर बाजार से निकलने वाले कचरे को वर्षों से इस तालाब में डंप किए जाने के कारण इसकी स्थिति दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। तालाब का जल प्रदूषित हो चुका है और चारों ओर फैले कूड़े-कचरे से वातावरण भी दूषित होने लगा है।
कभी जीवन का आधार था यह तालाब
स्थानीय लोगों के अनुसार एक समय यह तालाब क्षेत्र के लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी जलस्रोत था। यहां मछली पालन होता था, पशुओं को पानी पिलाया जाता था, लोग कपड़े धोते थे और विभिन्न सामाजिक गतिविधियां भी इसी परिसर में आयोजित होती थीं। लेकिन पिछले करीब ढाई दशकों में लगातार उपेक्षा के कारण इसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। आज यह तालाब पर्यावरणीय संकट का प्रतीक बन चुका है।
प्रतिदिन फेंका जा रहा बाजार का कचरा
ग्रामीणों का कहना है कि गिद्धौर बाजार से निकलने वाले ठोस कचरे का बड़ा हिस्सा वर्षों से इसी तालाब में लाकर फेंका जा रहा है। परिणामस्वरूप तालाब में प्लास्टिक, सड़े-गले जैविक अपशिष्ट और अन्य कूड़े का ढेर जमा हो गया है। जल पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है तथा आसपास के क्षेत्रों में दुर्गंध फैलने से लोगों का रहना भी मुश्किल होता जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इसी तरह कचरा फेंकने का सिलसिला जारी रहा तो आने वाले समय में तालाब का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है।
घेराबंदी नहीं होने से बढ़ी समस्या
पतसंडा पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि राजीव कुमार साव उर्फ पिंकू ने बताया कि यह तालाब राजमहल की निजी संपत्ति है। राजपरिवार की ओर से इसकी घेराबंदी नहीं कराई गई है, जिसके कारण लोग खुलेआम इसमें कचरा फेंक रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा और संरक्षण के उपाय नहीं किए गए तो यह ऐतिहासिक धरोहर हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है।
अतिक्रमण भी बना बड़ा खतरा
तालाब पर केवल कचरे का ही नहीं, बल्कि अतिक्रमण का भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि तालाब का लगभग आधा हिस्सा पहले ही बेचा जा चुका है, जहां अब निर्माण कार्य हो रहे हैं। वहीं शेष हिस्से के चारों ओर भी धीरे-धीरे अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है, जिससे तालाब का वास्तविक क्षेत्रफल लगातार सिकुड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस पर शीघ्र रोक नहीं लगी तो आने वाले वर्षों में यह जलस्रोत केवल सरकारी अभिलेखों तक ही सीमित रह जाएगा।
सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा है तालाब
यह तालाब केवल जल संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि गिद्धौर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके समीप प्रतिवर्ष गिद्धौर का प्रसिद्ध दुर्गा पूजा मेला आयोजित होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण शामिल होते हैं। ऐसे में इस ऐतिहासिक धरोहर की दुर्दशा स्थानीय लोगों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों के लिए भी चिंता का विषय बनी हुई है।
सरकारी योजनाओं पर उठ रहे सवाल
एक ओर बिहार सरकार जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए 'जल-जीवन-हरियाली' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं का संचालन कर रही है, वहीं दूसरी ओर गिद्धौर का यह ऐतिहासिक तालाब उपेक्षा और अव्यवस्था का शिकार बना हुआ है। तालाब की वर्तमान स्थिति सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े कर रही है।
ग्रामीणों ने की त्वरित कार्रवाई की मांग
ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन एवं संबंधित विभाग से तालाब की तत्काल सफाई, कचरा डंपिंग पर पूर्ण रोक, अतिक्रमण हटाने, चारदीवारी या घेराबंदी कराने तथा इस ऐतिहासिक जलस्रोत के संरक्षण के लिए स्थायी योजना बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो गिद्धौर अपनी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पर्यावरणीय धरोहर हमेशा के लिए खो देगा।
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यह केवल एक तालाब नहीं, बल्कि गिद्धौर की विरासत, संस्कृति और पर्यावरण का अभिन्न हिस्सा है, जिसकी रक्षा करना प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज सभी की साझा जिम्मेदारी है।







