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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

उपेक्षा की मार झेल रहा गिद्धौर का ऐतिहासिक त्रिपुर सुंदरी मंदिर और तालाब, धरोहर बचाने की उठी मांग

गिद्धौर/जमुई (Gidhaur/Jamui), 17 अप्रैल 2026, शुक्रवार : बिहार के ऐतिहासिक गिद्धौर राजवंश की पहचान सदियों से साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए रही है, लेकिन आज उसी विरासत का एक महत्वपूर्ण प्रतीक, मां त्रिपुर सुंदरी मंदिर और तड़ाग, उपेक्षा का शिकार होकर धीरे-धीरे अस्तित्व संकट की ओर बढ़ रहा है।

गिद्धौर राजवंश के प्रसिद्ध शासक महाराजा रावणेश्वर प्रसाद सिंह, जिनका जन्म वर्ष 1886 में हुआ था, ने अपने शासनकाल में क्षेत्र के समग्र विकास हेतु कई उल्लेखनीय कार्य किए। उन्होंने सड़कों का निर्माण और सुधार, अस्पताल की स्थापना, मिंटो टावर का निर्माण तथा त्रिपुर सुंदरी तड़ाग और उसके तट पर भव्य मां त्रिपुर सुंदरी मंदिर का निर्माण कराया। यह निर्माण कार्य वैशाख सुदी 11, संवत 1926 (फसली 1326) में संपन्न हुआ था, जो उस समय की उत्कृष्ट वास्तुकला और धार्मिक आस्था का अद्भुत उदाहरण है।

हालांकि, वर्तमान समय में यह ऐतिहासिक मंदिर और रमणिक तड़ाग उपेक्षा के कारण जर्जर अवस्था में पहुंच चुके हैं। मंदिर परिसर के आसपास ग्रामीणों द्वारा अवैध रूप से मिट्टी कटाई किए जाने से इसकी नींव कमजोर होती जा रही है, वहीं मंदिर की दीवारों पर उग आए वृक्ष इसकी संरचना के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। कभी अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध यह धरोहर अब संरक्षण के अभाव में खंडहर बनने की कगार पर है।
इतिहासकार और गिद्धौर राज रियासत के जानकार सुशांत साईं सुंदरम के अनुसार, मां त्रिपुर सुंदरी मंदिर न केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, बल्कि यह अपार आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र भी है। यह मंदिर देवी त्रिपुर सुंदरी को समर्पित है, जो मां दुर्गा के दस महाविद्याओं में से एक हैं और जिन्हें ललिता एवं राजराजेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से भक्तों को सुख, समृद्धि, आकर्षण और वैवाहिक जीवन में शांति की प्राप्ति होती है।

यह मंदिर क्षेत्र के लोगों की कुलदेवी के रूप में भी अत्यंत पूजनीय है और यहां श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं। इसके बावजूद, इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए न तो जिला प्रशासन और न ही पुरातत्व विभाग की ओर से कोई ठोस पहल की जा रही है।
मां त्रिपुर सुंदरी तड़ाग, जो कभी अपनी स्वच्छता और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध था, आज बदहाली का शिकार हो चुका है। तालाब में साफ-सफाई का घोर अभाव देखने को मिलता है, जिससे इसका जल प्रदूषित होता जा रहा है। तट के किनारे अब तक समुचित घाट का निर्माण नहीं हो सका है, जिससे श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहीं, बनी हुई सीढ़ियां धीरे-धीरे टूटती और जर्जर होती जा रही हैं, जो कभी भी हादसे का कारण बन सकती हैं। इसके अलावा, तालाब में लगातार गंदगी और अवशेष फेंके जाने से इसकी पवित्रता और अस्तित्व दोनों पर खतरा मंडरा रहा है।

स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि यदि शीघ्र ही संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो गिद्धौर की यह अमूल्य सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर हमेशा के लिए नष्ट हो सकती है।

गिद्धौर का त्रिपुर सुंदरी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और कला का जीवंत प्रतीक है। इसके संरक्षण के लिए प्रशासनिक संवेदनशीलता और त्वरित कार्रवाई समय की मांग बन चुकी है।

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