गिद्धौर/जमुई। फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर प्रखंड क्षेत्र में होलिका दहन की पारंपरिक तैयारियां पूरे उत्साह के साथ देखने को मिलीं। बुधवार को बच्चों की टोलियां “हो जजमान तोरा सोने के मकान, दु गो लकड़ी द, दु गो गोयठा द…” जैसे पारंपरिक गीत गाते हुए घर-घर पहुंचीं और होलिका दहन के लिए लकड़ी एवं गोइठा (उपला) संग्रह करती नजर आईं।
ग्रामीण और शहरी मोहल्लों में यह दृश्य लोगों को अपनी पुरानी सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता रहा। हाथों में छोटी-छोटी होलिका की प्रतीकात्मक संरचना लिए बच्चे समूह बनाकर गलियों में घूमते रहे। वे दरवाजे पर पहुंचकर पारंपरिक अंदाज में होलिका गीत गाते और घर के बड़े-बुजुर्गों से लकड़ी या उपले देने का आग्रह करते।
स्थानीय लोगों ने भी इस परंपरा को स्नेहपूर्वक निभाते हुए बच्चों को लकड़ी, गोइठा तथा अन्य सामग्री उपलब्ध कराई। कई घरों में बच्चों को गुड़, चना और मिठाई भी दी गई। इस सामूहिक सहभागिता ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।
ज्ञात हो कि होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के दहन की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। इसी परंपरा के तहत होलिका दहन के लिए पहले से लकड़ी और उपलों का संग्रह किया जाता है, जिसमें बच्चों की सक्रिय भागीदारी रहती है।
गिद्धौर में वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी जीवित है। बुजुर्गों का कहना है कि पहले भी बच्चे इसी तरह टोली बनाकर गीत गाते हुए लकड़ी मांगते थे और पूरा गांव मिलकर होलिका दहन की तैयारी करता था। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि सामाजिक एकता और आपसी सहयोग का भी प्रतीक है।
शाम होते-होते विभिन्न मोहल्लों में एकत्रित की गई लकड़ियों से होलिका सजाई गई। विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अग्नि प्रज्वलित की गई, जहां लोगों ने परिवार की सुख-समृद्धि और समाज में शांति की कामना की।
इस प्रकार गिद्धौर में होलिका दहन की तैयारी के दौरान बच्चों की मधुर पुकार और लोकगीतों की गूंज ने पूरे क्षेत्र को फाल्गुनी रंग में रंग दिया।






