- मां त्रिपुर सुंदरी तालाब में हुआ प्रतिमा विसर्जन
- पुतुल कुमारी ने साझा कीं गिद्धौर की दुर्गापूजा से जुड़ी यादें
- बोलीं - समय के साथ भव्यता बढ़ी, लेकिन मां के प्रति लोगों का भाव नहीं बदला
गिद्धौर/जमुई (Gidhaur/Jamui), 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार : ऐतिहासिक गिद्धौर में शारदीय दुर्गापूजा के समापन पर बुधवार को मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन मां त्रिपुर सुंदरी तालाब में किया गया। इस दौरान श्रद्धा, भक्ति और भावुकता का माहौल देखने को मिला। विसर्जन से पूर्व तालाब किनारे पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय दिग्विजय सिंह की पत्नी, बिहार सरकार में मंत्री श्रेयसी सिंह की मां और बांका की पूर्व सांसद पुतुल कुमारी ने मां दुर्गा की आरती उतारी और उन्हें भावपूर्ण विदाई दी।
मां की विदाई के इस अवसर पर गिद्धौर की दुर्गापूजा से जुड़ी पुरानी यादें भी एक बार फिर जीवंत हो उठीं। पुतुल कुमारी ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए गिद्धौर की ऐतिहासिक दुर्गापूजा, श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और विसर्जन के दिन महसूस होने वाले भावनात्मक खालीपन का उल्लेख किया। उनके शब्दों में गिद्धौर की दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोगों की स्मृतियों, परंपराओं और भावनाओं से जुड़ा उत्सव है।
गिद्धौर की दुर्गापूजा के प्रति लोगों में रही है विशेष आस्था
पुतुल कुमारी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि गिद्धौर की दुर्गापूजा हमेशा से प्रसिद्ध रही है। यहां के लोगों की मां दुर्गा के प्रति आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छुट्टी नहीं मिलने पर भी लोग काम छोड़कर अपने घर लौट आते थे, ताकि दुर्गापूजा में शामिल हो सकें। उन्होंने बताया कि यहां लगभग हर व्यक्ति के घर में दुर्गापूजा के अवसर पर पाठ होता है या कलश स्थापित किया जाता है।
उन्होंने गिद्धौर की दुर्गापूजा से जुड़ी पुरानी परंपराओं का स्मरण करते हुए बताया कि लोगों के बीच यह चर्चा रही है कि पहले रेलवे की ओर से विशेष रैक की व्यवस्था की जाती थी, ताकि लोग कलकत्ता जा सकें। उस दौर में प्रचलित नारा 'काली है कलकत्ते की, दुर्गा है परसंडा की' गिद्धौर की धार्मिक पहचान और मां परसंडा के प्रति लोगों की श्रद्धा को अभिव्यक्त करता था।
समय के साथ बढ़ी भव्यता, लेकिन नहीं बदला आस्था का भाव
पूर्व सांसद ने अपनी पोस्ट में कहा कि समय के साथ गिद्धौर की दुर्गापूजा का स्वरूप और भव्यता बढ़ती गई। भव्य पंडाल बनने लगे और लोगों के जीवन में आई सुख-समृद्धि का प्रभाव भी आयोजन में दिखाई देने लगा। इसके बावजूद मां दुर्गा के प्रति लोगों की भावनाएं पहले जैसी ही बनी रहीं।
उन्होंने लिखा कि हर वर्ष मां की सवारी विभिन्न रूपों में आती है, लेकिन विसर्जन के दिन ऐसा महसूस होता है, मानो घर की बेटी की विदाई हो रही हो। यह भाव गिद्धौर की दुर्गापूजा को विशिष्ट बनाता है, जहां धार्मिक अनुष्ठान के साथ देवी को परिवार की बेटी के रूप में देखने की लोकभावना भी गहराई से जुड़ी हुई है।
'छोड़ के हमारे नगरिया कहां जाइब हो माई' गीत से भावुक हुए श्रद्धालु
पुतुल कुमारी ने विसर्जन के दिन के भावुक माहौल का जिक्र करते हुए लिखा कि सुबह से ही वातावरण में मां की विदाई से जुड़े गीत गूंजने लगते हैं। विशेष रूप से 'छोड़ के हमारे नगरिया कहां जाइब हो माई' जैसे गीत सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि सभी जानते हैं कि देवी प्रकृति स्वरूपा हैं और कण-कण में व्याप्त हैं। मां सदैव श्रद्धालुओं के हृदय में निवास करती हैं, फिर भी विसर्जन के समय एक सूनापन महसूस होता है और अनायास ही आंखें भर आती हैं। यह भाव मां दुर्गा के प्रति गहरे आत्मीय संबंध और सदियों से चली आ रही भक्ति परंपरा को दर्शाता है।
सुख, शांति और समृद्धि की कामना के साथ दी विजयादशमी की शुभकामनाएं
अपनी भावपूर्ण पोस्ट के अंत में पुतुल कुमारी ने मां दुर्गा से सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना की। उन्होंने लोगों से धर्म के मार्ग पर चलने की कामना करते हुए सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं दीं।
गिद्धौर में मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन धार्मिक अनुष्ठानों के समापन के साथ ही लोगों के मन में अगले वर्ष मां के पुनः आगमन की प्रतीक्षा भी छोड़ गया। मां की विदाई के साथ श्रद्धालुओं ने सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। पुतुल कुमारी के शब्दों में व्यक्त भावनाएं गिद्धौर की उस सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित करती हैं, जिसमें समय बदलता है, आयोजन की भव्यता बढ़ती है, लेकिन मां के प्रति श्रद्धा और आत्मीयता का भाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रहता है।

