गिद्धौर/जमुई (Gidhaur/Jamui), 8 अगस्त 2026, शनिवार : ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए प्रसिद्ध गिद्धौर शनिवार की संध्या भक्ति और आस्था के रंग में रंगा नजर आया। नागी, नकटी और उलाय नदी के संगम तट पर स्थित ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर में संध्या आरती के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। मंदिर परिसर में देर तक भजन-कीर्तन और मां की आरती की गूंज सुनाई देती रही। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और आसपास के श्रद्धालुओं ने मंदिर पहुंचकर मां दुर्गा के दर्शन किए और आरती में शामिल होकर सुख-समृद्धि की कामना की।
चंदेल राजवंश की ऐतिहासिक धरोहर है दुर्गा मंदिर
गिद्धौर राज रियासत को चंदेल राजवंश की अमिट ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है। चंदेल राजवंशियों द्वारा उलाय नदी के तट पर वर्ष 1566 में ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर की स्थापना कराई गई थी। समय के साथ यह मंदिर गिद्धौर की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है। नागी, नकटी और उलाय नदियों के संगम के समीप स्थित होने के कारण मंदिर का धार्मिक और प्राकृतिक महत्व भी विशेष है।
गणेश वंदना से हुई कार्यक्रम की शुरुआत
शनिवार की संध्या आयोजित धार्मिक कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से हुई। इसके बाद महंत गणेश राय ने एक से बढ़कर एक भजनों की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। उनकी प्रस्तुति से मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण में डूब गया। भजनों की मधुर धुन पर श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए।
महंत गणेश राय की प्रस्तुति “तेरी मतलब की दुनिया से, मैं हिम्मत हार बैठा हूं... जमाने को भुलाकर के, तेरे दरबार बैठा हूं...” और “तेरे डमरू की धुन सुन के, तेरे दरबार आया हूं...” जैसे भजनों ने श्रद्धालुओं के बीच विशेष आध्यात्मिक भाव पैदा किया। पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालु मां की भक्ति में डूबे रहे।
आरती और प्रसाद वितरण के साथ हुआ समापन
भजन-कीर्तन के बाद विधिवत संध्या आरती की गई। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से मां दुर्गा की आरती में भाग लिया। आरती के बाद भक्तों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। कार्यक्रम के समापन तक मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की उपस्थिति बनी रही।
मां महादुर्गा आरती कमेटी के सदस्यों ने पूरे कार्यक्रम को भक्तिभाव और अनुशासन के साथ संपन्न कराने में सक्रिय भूमिका निभाई। कमेटी के सदस्यों ने श्रद्धालुओं की सुविधा और कार्यक्रम की व्यवस्था को लेकर भी सहयोग किया। ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर में आयोजित इस धार्मिक आयोजन ने एक बार फिर गिद्धौर की समृद्ध धार्मिक परंपरा और चंदेलकालीन विरासत को जीवंत कर दिया।







