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गुरुवार, 19 मार्च 2026

चैत्र नवरात्र पर 19वीं बार साधना में लीन हुए आनंद कौशल, शिक्षकों के अधिकारों की लड़ाई को बताया संकल्प

गिद्धौर/जमुई (Gidhaur/Jamui), 19 मार्च 2026, गुरुवार : चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर बिहार के लाखों शिक्षकों के अधिकारों की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले आनंद कौशल सिंह ने गुरुवार से एक बार फिर अपनी विशेष साधना और नौ दिवसीय उपवास व्रत का शुभारंभ किया। गिद्धौर स्थित अपने आवास पर शुरू हुई यह साधना लगातार 19वीं बार की जा रही है, जिसे उन्होंने शिक्षकों के मान-सम्मान और अधिकारों से जुड़े अपने संकल्प से जोड़ा है।

बताया जाता है कि वर्ष 2017 में पटना में हुए ऐतिहासिक शिक्षक आंदोलन के दौरान आनंद कौशल सिंह ने माँ जगदंबा के समक्ष यह प्रण लिया था कि जब तक बिहार के सभी शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा और पूर्ण वेतनमान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक वे प्रत्येक नवरात्रि में नौ दिनों का उपवास रखेंगे। उसी संकल्प की निरंतरता में वे हर वर्ष नवरात्र के दौरान यह कठोर साधना करते आ रहे हैं।

नवरात्र के प्रथम दिन अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए आनंद कौशल सिंह ने कहा कि यह उपवास केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह लाखों शिक्षकों के हक और सम्मान की लड़ाई का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि वर्षों के संघर्ष, धैर्य और सामूहिक प्रयासों के परिणामस्वरूप आज शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा प्राप्त हुआ है, जो इस आंदोलन की बड़ी उपलब्धि है।
उन्होंने आगे कहा कि माँ दुर्गा की कृपा और लंबे संघर्ष के फलस्वरूप राज्य में दशकों से चले आ रहे ‘नियोजनवाद’ की व्यवस्था को समाप्त करने में सफलता मिली है। अब शिक्षकों की बहाली सीधे राज्यकर्मी के रूप में हो रही है, जिससे उनके अधिकारों और सम्मान को मजबूती मिली है।

आनंद कौशल सिंह ने माँ शैलपुत्री की आराधना का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी कृपा से यह संभव हो पाया है कि नियोजन व्यवस्था जैसे कलंक को समाप्त किया जा सका। उन्होंने इसे लाखों शिक्षकों के विश्वास, त्याग और धैर्य की जीत बताया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका यह संकल्प और साधना तब तक जारी रहेगा, जब तक राज्य के सभी वर्गों के शिक्षकों को उनका पूर्ण अधिकार नहीं मिल जाता। उनके अनुसार यह संघर्ष केवल वेतन या पद का नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार की लड़ाई है, जिसे अंत तक जारी रखा जाएगा।

गिद्धौर में उनके इस धार्मिक और सामाजिक संकल्प को लेकर शिक्षकों और स्थानीय लोगों में विशेष चर्चा है। बड़ी संख्या में लोग इसे एक अनोखी पहल के रूप में देख रहे हैं, जहां आध्यात्म और सामाजिक संघर्ष का संगम दिखाई देता है।

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