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धार्मिक परंपराओं द्वारा पर्यावरण के महत्व को दर्शाता मिथिलांचल का लोकपर्व 'सामा चकेवा'

विशेष रिपोर्ट :- शुभम मिश्र (वरीय संपादक)                                    Gidhaur.Com
मिथिलांचल (Mithilanchal) 3 नवम्बर 2022
हमारे देश में शास्त्रीय पर्वों के अतिरिक्त रंग-विरंगे लोकपर्वों की एक लंबी श्रृंखला है। लोक आस्था के कुछ सबसे खूबसूरत त्योहारों में छठ के अलावा बिहार के मिथिला क्षेत्र में हर साल मनाए जाने वाला सामा चकेवा भी है।

 भाई-बहन के कोमल रिश्ते के बहाने प्रकृति और पर्यावरण के महत्व को मासूम अभिव्यक्ति देने वाला यह लोकपर्व समृद्ध मिथिला संस्कृति की पहचान रही है। इसका आठ दिवसीय आयोजन छठ के पारण के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी से शुरू होता है और कार्तिक पूर्णिमा के दिन इसका अवसान होता है। इस पर्व की पृष्ठभूमि में कोई पौराणिक कथा नहीं, परंपरा से चली आ रही एक लोककथा है।
कथा यह है कि श्यामा या सामा कृष्ण की एक पुत्री और साम्ब या चकेवा उनका पुत्र था। भाई-बहनों में असीम स्नेह था। सामा प्रकृति प्रेमी थी। उसका ज्यादा समय वृंदावन में ऋषियों के बीच तपोवन में पक्षियों, वृक्षों और फूल-पत्तों के बीच व्यतीत होता था। कृष्ण के एक मंत्री चुरक उर्फ चुगला ने सामा के वृन्दावन के एक तपस्वी के साथ अवैध संबंध का झूठा आरोप लगाया। 
उसकी बातों में आकर कृष्ण ने अपनी पुत्री को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया। सामा पक्षी बनी और वृंदावन के वन-उपवन में रहने लगी। उसे इस रूप में देख वहां के साधु-संत भी पक्षी बन गए। जब सामा के भाई चकेवा को इस प्रकरण की जानकारी हुई तो उसने कृष्ण को समझाने की कोशिश की।
कृष्ण नहीं माने तो वह तपस्या पर बैठ गया।अंततः कृष्ण ने वचन दिया कि सामा हर साल कार्तिक के महीने में केवल आठ दिनों के लिए उसके पास आएगी और कार्तिक की पूर्णिमा को पुनः लौट जायेगी। कार्तिक मास में सामा और चकेवा का मिलन हुआ। उसी दिन की याद में सामा चकेवा का त्यौहार मनाया जाता है।
इस त्यौहार में सामा और चकेवा की जोड़ी के साथ चुगला,वृन्दावन,वृक्षों,पक्षियों,पनमा(सहेली),ढ़ोलकिया,चूड़ीहर(चूड़ी बेचने वाला),सतभईया,ड्यूहली (नौकरानी)आदि की मिट्टी की छोटी-छोटी मूर्तियां बनायी जाती है और बांस की रंग-विरंगी टोकरियों में सजाकर उनकी अर्चना की जाती है।संध्या समय में महिलाओं की टोली लोकगीत गाती हुईं अपने घरों से निकलती हैं और चुगलखोर चुगला का मुंह जलाने के बाद घर लौट जाती हैं।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन वे अपने भाइयों के साथ खेतों में जाती हैं। चूड़ा, दही, गुड़ और मिठाई से उनका मुंह जूठा कराने के बाद सामा चकेवा का विसर्जन बेटी की बिदाई के जैसा पारंपरिक तरीके से होता है। जाते-जाते चुगलखोर चुगला की मूंछ में आग लगा दी जाती है। भाईयों की लंबी उम्र की प्रार्थना के बाद अगले वर्ष फिर सामा चकेवा के आने की कामना के साथ इस आयोजन का समापन होता है।

वहीं इस आठ दिवसीय त्यौहार का एक पर्यावरणीय महत्व भी है। इसका उद्धेश्य प्राचीन काल से ही मिथिला क्षेत्र में हर साल आने वाले प्रवासी पक्षियों को सुरक्षा और सम्मान देना भी है। बरसात के बाद कार्तिक के महीने से सर्दियों की शुरुआत होती है।
ताल-तलैया से भरे मिथिला के मैदानी इलाकों में दूर-दराज़ के पर्वतीय देशों से रंग-बिरंगे पक्षियों का आगमन शुरू हो जाता है। वे यहां इसलिए आते हैं क्योंकि यहां सर्दी कम पड़ती है और पानी की सुविधाएं यहां भरी पड़ी रहती है। उनके आगमन की शुरुआत सामा चकेवा नामक पक्षी के जोड़े के आने से होती है।

इन पक्षियों को शिकारियों के हाथों से बचाने और मनुष्य तथा पक्षियों के सनातन रिश्ते को मजबूती देने के लिए ही संभवतः हमारे पूर्वजों ने सामा और चकेवा के मिथकीय प्रतीक गढ़े होंगे। चुगला इन मासूम पक्षियों के शिकारियों का प्रतीक है। यह अकारण नहीं कि स्त्रियां गांव के तालाबों की मिट्टी लेकर सामा चकेवा पक्षी बनाने के बाद उन्हें पारंपरिक तरीके से सजाती हैं और उनके स्वागत में गीत गाती हैं।
कार्तिक पूर्णिमा को इस पक्षी जोड़े की बिदाई और चुगला रुपी शिकारी की मूंछे जलाने के साथ इस त्यौहार का अंत इस उम्मीद के साथ किया जाता है कि मेहमान पक्षियों को यहां के लोगों से कोई शिकायत नहीं होगी और अगले वर्ष वे फिर लौटकर यहां के मैदानों, झीलों और ताल-तलैया को अपने मासूम कलरव से भर देंगे।

मिथिला के तालाबों और सरोवरों में सर्दी के आरम्भ के साथ प्रवासी पक्षी अब भी दिख जाते हैं, लेकिन वातावरण में बढ़ते प्रदूषण , मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडियेशन , शोर तथा शिकारियों के आतंक की वज़ह से उनकी तादाद में निरंतर कमी आ रही है।
जीवन के हर क्षेत्र में आधुनिकता के प्रवेश का असर जीवन, प्रकृति और रिश्तों को सम्मान देने वाली हमारी सांस्कृतिक और लोक परम्पराओं पर पड़ा है।

मिथिला संस्कृति का यह प्रतीक पर्व भी अब लोक से सिमट कर कुछ घरों तक सीमित रह गया है। जहां है, वहां भी इसके आयोजन में उत्साह नहीं दिखता। अपनी जड़ों से कटे लोगों के बीच और भागदौड़ से हांफते इस जटिल समय में जब कोई मानवीय मूल्य ही सुरक्षित नहीं है तो लोक आस्थाओं की मासूमियत भला कैसे बची रह सकती है ? मिथिला की आने वाली पीढियां अब किताबों से ही जान पाएगी कि उनकी संस्कृति में कभी भाई-बहन के रिश्तों और पक्षियों के साथ एकात्मकता के ऐसे भोले-भाले उत्सव भी मनाए जाते थे।

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