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युद्ध में राजा के पक्ष में नहीं रही प्रजा, विदेशी आक्रमणकारियों से हारते रहे भारतीय रजवाड़े : धनंजय

अनेकों बार मुट्ठीभर विदेशी आक्रमणकारी आए। विशाल भारत के विभिन्न हिस्सों को लूट लिया, कब्जा कर लिया।  

यह कैसे संभव हुआ ?

साहसी एवं पराक्रमी योद्धाओं के इस देश में, विवेकशील एवं कूटनीतिज्ञ पंडितों के इस देश में मुट्ठीभर विदेशी आए और विजयी होते चले गए।

आखिर यह कैसे संभव हुआ ?

क्योंकि विदेशी आक्रमणकारियों को सिर्फ राजाओं और उसकी छोटी-मोटी सेनाओं से लड़ना पड़ता था। प्रजा कभी भी राजाओं के पक्ष में खड़ी नहीं हुई।

उन भारतीयों राजाओं की हार के कई कारणों में सबसे प्रमुख कारण यह था कि उसकी प्रजा उसके पक्ष में नहीं थी। प्रजा हमेशा से राजा और उसके लोगों द्वारा सताई ही जाती रही थी। इसलिए जब आक्रमणकारी आते थे तो जनता कोई विरोध नहीं करती थी, बल्कि खुश ही होती होगी कि आततायियों को मारने कोई तो आया है। जनता को वे आक्रमणकारी ईश्वर के दूत जैसे लगते होंगे।

मुट्ठीभर आक्रमणकारी आते थे, शराब और शबाब के नशे में डूबे राजा और उसकी छोटी-मोटी सेना को हराते चले जाते थे। लूट-पाटकर चल देते थे। 

राजा और उसके लोगों से त्रस्त आम जनता कभी भी युद्ध के समय राजा के पक्ष में खड़ी नहीं हुई, इसलिए राजा हारते रहे।

यह राजाओं का देश था, प्रजा का नहीं। प्रजा तो हमेशा शोषित के रूप में जीती रही, गुलाम की जिंदगी जीती रही। 

राजाओं द्वारा प्रजा को गुलाम की तरह रखने का ही परिणाम था कि उन राजाओं को भी विदेशियों का गुलाम होना पड़ा। जैसा करोगे, वैसा पाना तो पड़ता ही है।

जब प्रजा गुलाम थी तब साहित्यकार राजाओं की जय-जयकार कर रहे थे। जब राजा गुलाम हुए तो इतिहासकारों ने उसे "देश की गुलामी" कहा। 

(अपवाद के कुछ राजा छोड़ दें तो) बहुसंख्यक प्रजा अंग्रेजों के समय भी गुलाम थी, उससे पहले मुस्लिम शासकों के समय भी गुलाम थी, उससे पहले हिंदू राजाओं के समय भी गुलाम थी। 

जब से आर्यन सिंधु नदी के किनारे आकर बसे। उसके बाद से ही भारत भूभाग के बहुसंख्यकों के अधिकारों की कटनी-छटनी शुरू हो गई। फिर यह सिलसिला शोषण और गुलामी की जिंदगी तक गया।

1947 में अंग्रेजों के वापस जाने के बाद जब देश का #संविधान बना, तब बहुसंख्यक प्रजा को बराबरी के कागजी अधिकार मिले। तब से लेकर अब तक बराबरी के उस कागजी अधिकार को असल मायनों में प्राप्त करने के लिए बहुसंख्यक संघर्षरत हैं। 

कुछ बहुसंख्यकों ने बराबरी का अधिकार पा लिया है। कुछ ऐसे भी हैं जो अब बराबरी से ज्यादा भी छीन रहे हैं। अब वे उल्टे शोषक की भूमिका में नजर आ रहे हैं।

पर ज्यादातर बहुसंख्यक अब भी बराबरी का अधिकार नहीं पा सके हैं क्योंकि सदियों की प्रताड़ना की वजह से वे मानसिक तौर पर भी इतने पिछड़ गए हैं कि तमाम प्रयासों के बाद भी वे बराबरी करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। 

अब उन्हें शोषक बन चुके कुछ बहुसंख्यको के शोषण का भी सामना करना पड़ रहा है। वे बड़ी उम्मीद से अपनी ही जातियों के शक्तिशाली धनाढ्य नेताओं के पास जाते हैं, वे धनाढ्य नेता अपनी जाति के दबे-पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने की बजाय पुराने राजाओं की तरह (मॉडर्न दांव-पेंच से) उनका दोहन-शोषण कर रहे हैं।

(इस आलेख को स्वतंत्र पत्रकार एवं समाजसेवी धनंजय कुमार सिन्हा ने लिखा है। वे "प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग" के छात्र भी रहे हैं।)