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कवि कथा - २ : मास्साब पसीने से तरबतर हो लेट जाते तो कवि उनके तोंद पर स्लेट रख के टास्क बनाता था

विशेष : जमुई जिलान्तर्गत मांगोबंदर के निवासी 72 वर्षीय अवनींद्र नाथ मिश्र का 26 अगस्त 2020 को तड़के पटना के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. स्व. मिश्र बिहार विधान सभा के पूर्व प्रशासी पदाधिकारी रह चुके थे एवं वर्तमान पर्यटन मंत्री के आप्त सचिव थे. स्व. मिश्र विधान सभा के विधायी कार्यो के विशेषज्ञ माने जाते थे. इस कारण किसी भी दल के मंत्री उन्हें अपने आप्त सचिव के रूप में रखना चाहते थे.

अवनींद्र नाथ मिश्र जी के निधन के बाद उनके भाई एवं गिधौरिया बोली के कवि व हिंदी साहित्य के उच्चस्तरीय लेखक श्री ज्योतिन्द्र मिश्र अपने संस्मरणों को साझा कर रहे हैं. स्व. अवनींद्र नाथ मिश्र का पुकारू नाम 'कवि' था. ज्योतिन्द्र मिश्र जी ने इन संस्मरणों को 'कवि कथा' का नाम दिया है. इन्हें हम धारावाहिक तौर पर gidhaur.com के अपने पाठकों के पढने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. यह अक्षरशः श्री ज्योतिन्द्र मिश्र जी के लिखे शब्दों में ही है. हमने अपनी ओर से इसमें कोई भी संपादन नहीं किया है. पढ़िए यहाँ...

कवि -कथा (२)
1957 ई में , जब मैं (१०) और मेरे अनुज कवि (९ ) वर्ष के थे हमारा नाम छठे क्लास में दिग्घी मिडिल स्कूल में लिखाया गया ।जून के महीना था। उस वर्ष छह महीने का ही कोर्स तय हुआ था ।बड़े बाबूजी कहते थे कि हम दोनों भाई कठिन परिश्रम कर छठ का कोर्स उत्तीर्ण हो जाये।
हमारा निवास भी स्कूल परिसर में बने मिट्टी के मकान का दो कमरा डिस्पेंसरी के लिये दिया गया था।
इधर सामने विशाल आम्रवन था ।टपकते हुए आम ।अहा कितने स्वादिष्ट थे । हम कितने स्वच्छंद हो गये थे ।
उफ्फ , यह पढ़ाई का मामला कहाँ से चला आया।
अस्तु , तय हुआ कि अंग्रेजी हिन्दी तो बड़े बाउजी पढा देंगे बाकी हिसाब के लिये तो गुरुजी चाहिये। उसी स्कूल के एक गणितज्ञ को ज़िम्मा दिया गया कि हमें हिसाब समझा दें। सो विन्देश्वरी झा यानी बीनो मास्साब को इस कार्य को सौंपा गया । स्कूल के विशाल परिसर में मुचकन्द का पेड़ आज भी हमारे दादा परदादा की तरह खड़ा है जो हमारी शरारतों, हमारे भोलेपन का गवाह है।

मेरे बड़े बाबूजी की दृष्टि में हम दोनों भाई की पढ़ाई के लिये कोई भेद भाव नहीं था । जब वे हिन्दी अंग्रेजी या और कोई विषय पढ़ाते तो अनुज कवि के साथ मेरी श्रेष्ठता बनी रहती थी । इस लिहाज से बाबूजी खूब खुश रहते थे ।लेकिन बिनो मास्साब के हिसाब का मेरे पास कोई जबाब नहीं था । पलास की छोटी छड़ी मेरे लिये ही मंगाया जाता ।लेकिन कवि मुझे हिसाब में परास्त कर देते थे।
बीच बीच में बिनो मास्साब पसीने से तरबतर होकर लेट जाते तो कवि उनके तोंद निकले पेट पर स्लेट रख के उनका टास्क बनाता था ।लेकिन मास्टर साहब ने कभी नहीं टोका या हटाया।
लेकिन यह फैसिलिटी मुझे ग्रांटेड नहीं थी।मैने कभी प्रयास भी नहीं किया था। जब मैंने यह बात अपनी माँ को बताई तो बोली कि कवि तुसे छोटा है । उसे करने दो।मैंने उसे दो पैसे में खरीदा है ।
मैं अवाक था । बाद में समझ आया कि वह मेरी माँ के क्रेत पुत्र है । कितना विशाल होता है माँ का आँचल।
तब से मुझे उलार किया जाना अच्छा लगने लगा।

क्रमशः


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