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कवि कथा - ७ : मेरे अंदर का कवि जागृत हो गया था, मैं एकांत ढूंढता रहता था

विशेष : जमुई जिलान्तर्गत मांगोबंदर के निवासी 72 वर्षीय अवनींद्र नाथ मिश्र का 26 अगस्त 2020 को तड़के पटना के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. स्व. मिश्र बिहार विधान सभा के पूर्व प्रशासी पदाधिकारी रह चुके थे एवं वर्तमान पर्यटन मंत्री के आप्त सचिव थे. स्व. मिश्र विधान सभा के विधायी कार्यो के विशेषज्ञ माने जाते थे. इस कारण किसी भी दल के मंत्री उन्हें अपने आप्त सचिव के रूप में रखना चाहते थे.

अवनींद्र नाथ मिश्र जी के निधन के बाद उनके भाई एवं गिधौरिया बोली के कवि व हिंदी साहित्य के उच्चस्तरीय लेखक श्री ज्योतिन्द्र मिश्र अपने संस्मरणों को साझा कर रहे हैं. स्व. अवनींद्र नाथ मिश्र का पुकारू नाम 'कवि' था. ज्योतिन्द्र मिश्र जी ने इन संस्मरणों को 'कवि कथा' का नाम दिया है. इन्हें हम धारावाहिक तौर पर gidhaur.com के अपने पाठकों के पढने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. यह अक्षरशः श्री ज्योतिन्द्र मिश्र जी के लिखे शब्दों में ही है. हमने अपनी ओर से इसमें कोई भी संपादन नहीं किया है. पढ़िए यहाँ...

कवि -कथा (७)
1963 की गर्मी की छुट्टियों में जब हम दोनों भाई पूरे छह महीने बाद छमाही इम्तिहान देकर दिघी पहुँचे तो हमारी आवाजें फ़टी फ़टी निकल रही थी । कवि के चेहरे पर ठुढ़ि के नीचे बाल उग आये थे ।मेरे चेहरे की कनपटी के नीचे बाल उग आये।
आवाज फटने के बावत जब मां से पूछा तो बोली कि - कंठ फूट रहा है । कंठ भी कुछ साइज में बड़ा हो गया था । बाबा कहते थे कि कंठ फूटने पर ही षडज का स्वर लग सकता है ।मालकोष राग में इसकी जरूरत होती है । बार बार आईने के सामने जाते तो छोटी बहनें मजाक उड़ाती । कवि तो हर वक्त किताब लिये रहता था भले पढ़े न पढ़े ।लेकिन मैं एक पन्ना कागज और कलम जरूर अपनी जेब में रखता था ।मेरे अंदर का कवि जागृत हो गया था ,आगामी तुलसी जयंती के लिए कविता लिखने की चुप चुप कोशिश कर रहा था।कुछ न कुछ पंक्तियाँ छंदवद्ध कर ही लेता । लेकिन कविताओं के सारे भाव किसी अनाम नायिका के नाम ही सम्बोधित होते थे। मैं एकांत ढूंढता रहता था । कवि ने बड़े बाऊजी से शिकायत के लहजे में जाकर कहा कि ई तो हरदम कविता लिखते रहता है । लेकिन बड़े बाऊजी खिसियाये नहीं। उन्हें पता था कि उनसे दिखाकर एक कविता बन्धु में छपने के लिये भेजी जो छप गयी थी। पूरे आठ दिनों की माथा पच्ची के बाद कविता तो तैयार हुई लेकिन पुरस्कार पा जाने की लालसा ने मुझे बड़े बाबूजी से संशोधन के लिये ढिठाई दिखानी पड़ी। उन्होंने संशोधन किया तो मुझे लगा कि कुछ न कुछ पुरस्कार तो मुझे मिल ही जायेगा।अब हम स्कूल जाने को बेचैन हो गये।
स्कूल खुलने पर तुलसी जयंती के लिये चंदा जमा करना था। लेकिन यह अपनी इच्छा पर निर्भर था । जब पाठक सर ने कवि का नाम पुकारा तो उसने दो रुपए लिखाया और दे भी दिया । तीन चार लड़के के नाम के बाद मेरा नाम आया तो पाठक सर ने मुझसे कहा -- यू मैन । वे लड़कों को यू मैन ही कहा करते थे । मैंने एक रुपया लिखाया। बोले - एक भाई दो रुपया लिखाया है ।तुम एक रुपया ?? मैं गुम हो गया ।फिर पाठक सर ने पूछा कि तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं ? कवि ने उत्तर दिया - डॉक्टर हैं। फिर मुझसे पूछा तो मैंने बताया कि वैद्य हैं।
उस दिन दुभयबा का भेद खुल गया ।मुझसे एक रुपया ही लिया गया । जब तुलसी जयंती का दिन आया तो मुझे उसी कविता पर प्रथम पुरस्कार स्व गोपाल सिंह नेपाली जी ने प्रदान किया ।पीठ ठोंकी । उस दिन हम दोनों भाई बहुत खुश थे । मेरा प्रशस्ति पत्र उसी के हाथ में था। कवि और बालकवि एक साथ उस दिन महराजगंज चौक पर समोसा रसगुल्ला खाकर ही होस्टल पहुंचे थे ।क्रमशः



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