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कवि कथा - ४ : मैं वर्ग का मॉनिटर हो गया, यह साहस देने का काम कवि ने ही किया

विशेष : जमुई जिलान्तर्गत मांगोबंदर के निवासी 72 वर्षीय अवनींद्र नाथ मिश्र का 26 अगस्त 2020 को तड़के पटना के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. स्व. मिश्र बिहार विधान सभा के पूर्व प्रशासी पदाधिकारी रह चुके थे एवं वर्तमान पर्यटन मंत्री के आप्त सचिव थे. स्व. मिश्र विधान सभा के विधायी कार्यो के विशेषज्ञ माने जाते थे. इस कारण किसी भी दल के मंत्री उन्हें अपने आप्त सचिव के रूप में रखना चाहते थे.

अवनींद्र नाथ मिश्र जी के निधन के बाद उनके भाई एवं गिधौरिया बोली के कवि व हिंदी साहित्य के उच्चस्तरीय लेखक श्री ज्योतिन्द्र मिश्र अपने संस्मरणों को साझा कर रहे हैं. स्व. अवनींद्र नाथ मिश्र का पुकारू नाम 'कवि' था. ज्योतिन्द्र मिश्र जी ने इन संस्मरणों को 'कवि कथा' का नाम दिया है. इन्हें हम धारावाहिक तौर पर gidhaur.com के अपने पाठकों के पढने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. यह अक्षरशः श्री ज्योतिन्द्र मिश्र जी के लिखे शब्दों में ही है. हमने अपनी ओर से इसमें कोई भी संपादन नहीं किया है. पढ़िए यहाँ...

कवि- कथा (४)

सातवीं क्लास के रिजल्ट का क्रम इस प्रकार था:-
1.उदय कांत चौधरी
2. विनय कुमार
3. नन्दकिशोर झा
4. मिश्री साह
5.अवनींद्र नाथ मिश्र
6.ज्योतीन्द्र नाथ मिश्र
हम दोनों भाइयों को सीधे छठे क्लास में दाखिल किया गया था। अगले वर्ष 1959 में हमें 8 वीं क्लास की पढ़ाई के लिए किसी हाई स्कूल में जाना था।यानि स्वर्ग से विदाई का वक्त करीब था। मेधा सूची में अनुज ने मुझे पछाड़ दिया था इस पराभव का प्रभाव मुझ पर नहीं था।
निर्णय बड़े बाऊजी पर था कि हमें कहाँ भेजेंगे। उन्होंने कोई पत्र हमारे छोटे नाना जी ( मधुबनी) को लिखा था जिसका वे इन्तज़ार कर रहे थे ।जनवरी 1959 के दूसरे दिन ही चिट्ठी आई और तैयारी शुरू हो गयी।तय हुआ कि पहले मेरी माँ छः महीने के लिये मायके में हमारे साथ रहेगी । गर्मी छुट्टी के बाद बड़ी माँ जायेगी। दोनों का मायके तो एक ही था। हम तो सोच में पड़ गये । मधुबनी में नानी का होना तो आकर्षण का विषय था लेकिन छोटे नाना तो कड़क थे । जिस स्कूल में हमें जाना था उसके वे अंग्रेजी के टीचर रह चुके थे। मधुबनी में दो ही स्कूल का नाम था। वाटसन स्कूल और गोकुल मथुरा सूरी स्कूल ।
तब मोकामा पूल नहीं बना था । कोयले वाली इंजन की रेलगाड़ी , पानी में चलने वाला जहाज और मधुबनी स्टेशन से तांगे की सवारी ।नानी घर जाने का मजा तो कई बार ले चुके थे । इस बार का मजा तो सज़ा था।
वैसे जमुई में भी हाई स्कूल था लेकिन बड़े बाबूजी मिथिला को ही ज्ञानार्जन का केंद्र मानते थे ।अस्तु, हमने फिर गंगा पार किया और स्वच्छ , शान्त , और रमणीक वातावरण के अहसास को भूलते हुए जननी जनभूमिश्च स्वर्गादपि चिर गरीयसी में पहुँच गये। (जन्म स्थली का चित्र संलग्न) यहीं मेरा जन्म भी हुआ था जबकि कवि का जन्म अपने पैतृक वास चक वैद्योलिया में हुआ था। बड़े बाबूजी भी साथ में थे । छोटे नाना जी ने स्वयं तांगा किया और स्कूल में जाकर 8 वी क्लास के सेक्सन बी में नाम लिखा दिया ।जाने वक्त नानी हमें देखकर निहाल थी । उसने हम दोनों भाई को एक एक इकन्नी दी थी ।सेक्सन बी के क्लास टीचर थे नन्द लाल पूर्वे । प्रिंसिपल एस एन दास ने पूर्वे जी को अपना स्टूडेंट पहचान लेने को कहा ।अगले दिन हमें स्कूल भेजा गया । हमें प्रतिदिन कर्सिव राइटिंग का टास्क दिया गया ।दो दिन स्कूल जाने के बाद पूर्वे जी ने सभी स्टूडेंट से कहा कि तुममें से कोई अंग्रेजी लेखन की कॉपी को उसका नाम पढ़कर बांट सकता है,?
एक ने हिम्मत की लेकिन लड़कों का नाम ठीक से नही पढ़ सका ।मुझे भाई ने उकसाया और खड़े हो गये।
क्लास टीचर की अनुमति लेकर हमने सभी कापियाँ सम्बन्धित छात्रों को दे दी। पूर्वे जी ने उसी वक्त हमें डस्टर और खल्ली थमा दी ।इसका अर्थ यह था कि उस दिन से मैं वर्ग का मॉनिटर हो गया ।यह साहस देने का काम कवि ने ही किया।।

प्रतिदिन नानी घर के सामने के सरोवर में स्नान करना ।भोजन करना , 4 किलोमीटर पैदल जाना फिर 4 किलोमीटर पैदल आना । सांझ होते ही दरवाजे पर(दरवाजे का चित्र संलग्न) लालटेन लेकर पढ़ने बैठना।
छमाही इम्तिहान तक तो सब कुछ ठीक रहा ।उसके बाद कवि को पेट सम्बन्धी बीमारी लग गयी । लगातार दस्त होने से कमजोर होने लगा । बरसात की एक अंधेरी और कड़कती विजलियों के बीच कवि की हालत बहुत खराब हो गयी। किसी को साहस नहीं हो रहा था कि घर से बाहर निकले । मुझे बड़ेबाबूजी की याद आ गयी ।उन्होंने जाते वक्त कहा था कि तुम बड़े हो इस पर भी ध्यान रखना । मैंने मामा से कहा कि कहाँ जाना होगा ।मामा बोले कोतवाली के पास बंगाली डॉक्टर के यहॉं। रात के दो बजे मैंने छाता, लालटेन और आठ आना पैसा माँ से लिया और वनवास के साहस की याद करके बाहर निकल गया। मुझे देखकर मेरे मामा भी अलग छाता लेकर आये ।उस डरावनी रात में मैं दौड़ा हुआ जा रहा था। गिरे भी उठे भी ।लेकिन बंगाली डॉक्टर के यहां पहुंच गये ।
खूब चिल्लाया । किबाड़ में धक्का मारा। हार कर डॉक्टर उठा। तब तक मामा भी आ गये।उन्हें देखकर वह सहमा ,वरना वह चपत लगा देता।मामा के बताने पर ज्यों ही उसने दवा दी ।मैं दोगुनी गति से घर की ओर भागा।
हांफते हांफते साफ बोल नहीं सकता था ।मैंने कवि के मुँह में दवा डाल दी। 10 मिनट के बाद उसने आंखे खोली तो मुझे चैन मिला । नानी ने मुझे गले से लगा लिया । सुवह तक भाई ठीक हो गया। लेकिन पेट की बीमारी के कारण दिसम्बर में टी सी लेकर चले आये ।जमुई में ही नवीं क्लास में नाम लिखाई गयी और होस्टल में रहने लगे।क्रमशः


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