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एक समीक्षा : बाढ़ विधानसभा से विभिन्न पार्टियों में टिकट पाने की होड़

 

पटना | अनूप नारायण : - सबसे पुराने अनुमंडलों में से एक और पूरे बिहार का चित्तौड़गढ़ का है जाने वाला बाढ़ विधानसभा इस बार सुबह बिहार में सबसे चर्चित हो चुका है। विधानसभा चुनाव सर पर है और विभिन्न पार्टियों समय टिकट के लिए होड़ मची हुई है। विश्लेषण शुरू करने से पहले आइए इस विधानसभा के इतिहास के बारे में कुछ जान लें। बाढ़ विधानसभा को चित्तौड़गढ़ इसलिए कहा जाता है कि यहां से अधिकांश बार राजपूत जाति के ही विधायक चुने गए हैं। लेकिन शुरुआत करते हैं हम लोग 1985 से जब बाढ़ विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर स्वर्गीय भुवनेश्वर सिंह उर्फ पप्पू बाबू विधायक बने। हालांकि तत्कालीन राजनीतिज्ञ परिपेक्ष्य में पूर्व सांसद विजय कृष्ण उनसे पहले से सक्रिय थे और बख्तियारपुर से विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके थे लेकिन पहले विधायक बनने का सौभाग्य स्वर्गीय पप्पू बाबू को मिला। लेकिन 1990 और 1995 के हुए विधानसभा चुनाव में पूर्व सांसद विजय कृष्ण , पप्पू बाबू को मात देकर विधानसभा पहुंचे। लेकिन 2000 में हुए विधानसभा चुनाव में पप्पू  बाबू ने जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ कर विजय कृष्ण जी को पराजित कर दिया और दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। यानी कि 1985 से लेकर 2005 तक में हुए विधानसभा चुनाव में स्वर्गीय पप्पू बाबू और विजय कृष्ण जी की प्रतिद्वंदिता बाढ़ में छाई रही। 2004 में विजय कृष्ण जी बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद के रूप में चुने गए और उन्होंने वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हराया था। कहा जाता है कि पूर्व विधायक स्वर्गीय पप्पू बाबू ने भी अंतिम समय में विजय कृष्ण को सपोर्ट कर दिया था और उनकी जीत में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि उसमें पप्पू बाबू को उम्मीद थी कि आगामी विधानसभा चुनाव में राजद से उनको टिकट दिलवाने में विजय कृष्ण मदद करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और विजय कृष्ण मैं पप्पू बाबू से किए गए वादे को नहीं निभाया। 2005 में होने वाले विधानसभा चुनाव में बाढ़ विधानसभा की स्थिति बदल गई। दो पुराने प्रतिद्वंदी इस बार आमने सामने नहीं थे। विजय कृष्ण सांसद थे और पप्पू बाबू  को आश्वासन के बाद भी टिकट नहीं दिया गया। जदयू से लवली आनंद ने चुनाव लड़ा और राजद के एक कमजोर कैंडिडेट को बड़े अंतर से हराया। लेकिन वह सरकार नहीं चली और पुनः चुनाव हुए। इस बार जदयू ने अपने वफादार सिपाही ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू पर दांव चला और ज्ञानू जी विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे। उनकी इस जीत में तत्कालीन जद यू सांसद प्रभुनाथ सिंह की भूमिका अहम मानी जाती है। लोग कहते हैं कि प्रभुनाथ सिंह ने लगभग सप्ताह दिन रह कर बाढ़ विधानसभा में ज्ञानू जी के लिए प्रचार किया था और राजपूतों की वोट को इनके पक्ष में मोड़ा था। इसी बीच में बाढ़ की राजनीति में एक अहम बदलाव आया और 2009 के लोकसभा चुनाव में परिसीमन में बाढ़ लोकसभा क्षेत्र विलुप्त हो गया। विजय कृष्ण ने मौके की नजाकत को भांपते हुए राजद से त्यागपत्र दिया और अपने कॉलेज के जमाने के मित्र नीतीश कुमार का दामन थाम लिया। लेकिन होनी को कुछ और मंजूर थी। विजय कृष्ण अपने रिश्तेदार स्वर्गीय सत्येंद्र सिंह के मर्डर के केस में फंस गए। उधर पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह ने जदयू को छोड़कर लालू प्रसाद यादव का दामन थाम लिया। प्रभुनाथ सिंह को बीच में लाना इसलिए जरूरी हो जाता है की बाढ़ विधानसभा के टिकट बंटवारे में हर एक पार्टी में उनका अहम रोल रहा। विजय कृष्ण जमानत से छूटने के बाद प्रभुनाथ सिंह से मुलाकात की और प्रभुनाथ सिंह की मध्यस्थता से राजद में विजय कृष्ण की वापसी हो गई। इस वापसी के बाद 2010 में बाढ़ विधानसभा के चुनाव में ज्ञानू के खिलाफ विजय कृष्ण ने चुनाव लड़ा। लेकिन हत्या के आरोपी होने के कारण और स्वर्गीय सतेंद्र सिंह की पत्नी लक्ष्मी सिंह ने घर-घर घूमकर उनके खिलाफ प्रचार किया और नतीजा यह रहा कि वह चुनाव हार गए। यानी कि यदि उसे ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू दूसरी बार विधायक चुने गए। 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में जदयू और राजद का गठबंधन हो गया था। ज्ञानू जी  का तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मतभेद हो गया और उन्होंने जदयू छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था। बीजेपी ने दो बार के विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू पर भरोसा जताया और उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया। बाल विधानसभा जदयू के खाते में गई और नीतीश कुमार ने अपने विश्वासी पूर्व जिला पार्षद मनोज कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया जो कि कुर्मी जाति से आते थे। एंटी इनकंबेंसी रहने के बावजूद बाढ़ विधानसभा में चित्तौड़गढ़ बचाओ का नारा लगा और तीसरी बार ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे।


अब आइए चर्चा करते हैं 2020 में होने वाले विधानसभा चुनाव की।




बाढ़ विधानसभा में इस बार भी मुख्य मुकाबला एनडीए के उम्मीदवार और महागठबंधन के उम्मीदवार के बीच होना तय है। पहले एनडीए के उम्मीदवारों की सूची पर गौर कर लें। वर्तमान विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू सबसे प्रबल दावेदार हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि पार्टी पुनः उन पर भरोसा जतायेगी और वह चौथी बार विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहेंगे। लेकिन पार्टी के अंदर से ही उन्हें जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के जिला अध्यक्ष डॉक्टर सियाराम सिंह और पार्टी के जिला उपाध्यक्ष राजेश सिंह राजू दोनों ताल ठोक रहे हैं और टिकट मिलने का दावा कर रहे हैं। भाजपा के ही बाढ़ जिला बनाओ संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष राणा सुधीर सिंह भी ताल ठोक रहे हैं और टिकट न मिलने की स्थिति में निर्दलीय लड़ने का दावा कर रहे है। यह तो एनडीए में बीजेपी के पक्ष की कहानी है। लेकिन दूसरी तरफ जदयू के दावेदारों की भी कमी नहीं है। जिसमें सबसे आगे चल रहे हैं पूर्व प्रत्याशी मनोज कुमार। उन्हें पूरा विश्वास है कि बाढ़ सीट जदयू के खेमे में जाएगी और वही उम्मीदवार बनेंगे। लेकिन वहां भी दावेदारों की कमी नहीं है। मुख्य रूप से बिहारी बीघा पंचायत के मुखिया पंकज सिंह और अगवानपुर पंचायत के मुखिया मुन्ना कुमार सिंह भी विधायक बनने का हसरत पाले हुए हैं। साथ  ही बिहारी बीघा निवासी जदयू के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह की भी दबी इच्छा है । कुछ लोग यह भी बताते हैं कि जदयू के प्रवक्ता संजय सिंह की भी निगाहें बाढ़ विधानसभा पर है।जन अधिकार पार्टी ने भी हर एक विधानसभा चुनाव में अपना कैंडिडेट यहां उतारा है और इस बार संभवतः श्याम देव सिंह चौहान उम्मीदवार होंगे।लेकिन इनका व्यक्तित्व और पार्टी के स्थिति देखते हुए इनकी उपस्थिति नगण्य ही मानी जाएगी।


टिकट के लिए असली संग्राम मचा हुआ है राजद खेमे में। दावेदारों में प्रभुनाथ सिंह की बेटी मधु सिंह, पूर्व सांसद विजय कृष्ण  के परिवार से कोई,नमिता नीरज सिंह, महेश सिंह, रणवीर सिंह और शगुन सिंह का नाम आ रहा है। यह सभी राजपूत जाति से आते हैं। हालांकि यादव जाति के लल्लू मुखिया ने भी प्रयास किया था लेकिन उन्हें साफ मना कर दिया गया राजद के नेतृत्व द्वारा।नेतृत्व का कहना है कि बाढ़ विधानसभा से जब भी टिकट देंगे किसी राजपूत जाति को ही देंगे।


अब आइए एक एक करके इन दावेदारों की मजबूती और कमियों का विश्लेषण करें।


महेश सिंह बुढ़नपुर गांव के निवासी हैं और वर्तमान में बाढ़ जिला राजद के जिला अध्यक्ष हैं। लगातार जदयू से जुड़े रहे और 6 महीने पहले इनको सीधे-सीधे राजद का जिलाध्यक्ष बनाया गया है। पिछले 6 महीनों में यह कोई विशेष पहचान बनाने में कामयाब नहीं रहे। क्षेत्र में कभी भी यह प्रत्याशी के तौर पर भी नहीं घुमे। इनकी छवि भी बाहुबलियों की रही है। इसकी बहुत कम संभावना है कि राजद इन पर भरोसा करेगी। उसके बाद रणवीर सिंह का नाम आता है जो शहरी के रहने वाले हैं। इनकी उपस्थिति बाढ विधानसभा में नजर नहीं आती है अतः इन की दावेदारी भी संभवत खारिज हो जाएगी। पूर्व सांसद विजय कृष्ण अभी जेल में है और उनकी इच्छा है कि उनके परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़े उसमें मुख्यता राजीव कुमार चुन्ना का नाम आता है।लेकिन राजीव कुमार चुनना सिर्फ विजय कृष्ण के नाम के भरोसे रहे और जनता में उनका कोई प्रभाव नहीं  है।


अब एक प्रत्याशी नमिता नीरज सिंह की चर्चा की जाए। नमिता नीरज सिंह के पति का नाम नीरज सिंह है और यह लोग बाढ़ विधानसभा के मलाही का होने का दावा करते हैं। लेकिन विशेष पता करने पर यह मालूम हुआ कि मुख्य रूप से यह लोग समस्तीपुर जिला के निवासी हैं और इनके पिता रामकुमार सिंह बाढ़- बख्तियारपुर में ही ब्लॉक में नौकरी करते थे और इन्होंने मलाही में घर बना लिया। नमिता नीरज सिंह ने 2018 के अंतिम महीनों  में बाढ़ की राजनीति में प्रवेश किया। गौर किया जाए तो मात्र एक महीने के बाद तत्कालीन महिला प्रदेश अध्यक्ष आभा लता ने इन्हें प्रदेश महासचिव बना दिया।बिना कोई राजनीतिक पहचान और मेहनत के एक महीने में ही प्रदेश स्तर की जवाबदेही किस परिस्थिति में दी गई यह तो राजद ही जाने। यह दावा करती हैं कि बहुत सारे प्रकोष्ठ बाढ़ जिला के अध्यक्ष उनके साथ हैं। स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चला कि किसी भी प्रकोष्ठ के किसी भी अध्यक्ष कि कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है और ना ही उन्होंने कभी राजद के लिए काम किया है। मात्र दो-तीन महीना पहले यह सारे पद झोला ढोने वाले टाइप के व्यक्तियों को दिया गया है। तो इनके समर्थन और विरोध से कोई  फर्क नहीं पड़ने वाला है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने कोविड-19 में भी काम किया। लेकिन पता चला कि शुरू से ही यह लोग लक्ष्य निर्धारित करते हैं बहुत बड़ी-बड़ी लेकिन जमीन पर नहीं उतर पाता है।इनके ज्यादातर प्रचार तंत्र में यही लिखा जाता है कि 5000 घरों तक खाना पहुंचाने का लक्ष्य, 500 युवाओं को नौकरी देने का लक्ष्य इत्यादि। बाढ़ की आम जनता कहती है कि उनके सारे कार्यक्रम ढकोसला है और पब्लिक सब जानती है। दूसरी अपनी मजबूती बताती हैं कि उनके पति को वीरता पदक पुरस्कार मिला हुआ है।लेकिन चुकी 2014 में उनके ससुर रामकुमार सिंह निगरानी द्वारा रंगे हाथ घूस लेते पकड़े गए थे। तो इस घटना से और यह न्यूज़ वायरल होने से जो फायदा उनको मिलना था वह जीरो हो गया है। अभी हाल ही में उनके द्वारा अनंत सिंह के गांव लदमा में कार्यक्रम किया गया था ।जिसमें अनंत सिंह के गुर्गे कि वह चरण स्पर्श कर रही थी।यह तस्वीर वायरल हो गई जिसका बहुत ही नकारात्मक प्रभाव राजपूत और यादव जाति के मतदाताओं पर हुआ है। जाने के बाढ़ विधानसभा में अभी इस बात की चर्चा जोरों पर है की चरण पकड़ने के फोटो के कारण अगर टिकट मिल भी जाता है इन्हें तो राजपूत और यादव जाति का वोट नहीं मिलेगा। यानी कि इनके खिलाफ तीन बातें जा रही है


पहले यह कि यह लोग समस्तीपुर के मूल निवासी हैं और बाढ़ के नहीं हैं।


दूसरी यह कि इनके ससुर निगरानी द्वारा रंगे हाथ पकड़े गए हैं।


तीसरी अनंत सिंह के गुर्गे के चरण स्पर्श के कारण वायरल हुई फोटो।


अब प्रभुनाथ सिंह की पुत्री और बाढ़ विधानसभा से दो बार विधायक रहे स्वर्गीय भुवनेश्वर प्रसाद सिंह उर्फ पप्पू बाबू की पौत्रवधू मधु सिंह की चर्चा करते हैं।


मधु सिंह बाढ़ विधानसभा के रामनगर दियारा गांव की रहने वाली हैं। जहां उनके परिवार का घर मकान सब कुछ है। हालांकि वे लोग अब बख्तियारपुर में शिफ्ट हो गए हैं और वहीं रहते हैं।मुख्य उनके गांव रामनगर दियारा की आधी से अधिक आबादी बख्तियारपुर में रहती है लेकिन सभी रामनगर दियारा के वोटर हैं और वही के निवासी हैं।पप्पू बाबू और उनके परिवार का 1985 से लेकर अब तक बाढ़ और बख्तियारपुर विधानसभा की राजनीति में हमेशा मुख्य भूमिका रहा। स्वर्गीय राम लखन सिंह यादव जी, पूर्व सांसद प्रकाशचंद्र हो या वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी हों इन सबों के लोकसभा चुनाव में बाढ़ विधानसभा की जवाबदेही इसी परिवार को रहती थी। कहा जाता है कि मधु सिंह के परिवार का प्रभाव जितना बाढ़ की राजनीति में है उससे कहीं कम बख्तियारपुर के राजनीति में नहीं है।2010 में होने वाले विधानसभा चुनाव में बख्तियारपुर सीट से पूर्व विधायक अनिरुद्ध यादव को जिताने में मधु सिंह के परिवार वालों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कहा जाता है कि उस समय राजद के मात्र 22 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे और उसमें से एक बख्तियारपुर भी था और उसका कारण था धारा के उलट 5 से 7000 राजपूत समाज का वोट इस परिवार ने अनिरुद्ध यादव के तरफ मोड़ दिया था। दुर्भाग्यवश 2015 में अनिरुद्ध यादव का और मधु सिंह के परिवार वालों के बीच कुछ मतभेद हो गया और इस परिवार की निष्क्रियता पूर्व विधायक अनिरुद्ध यादव को काफी भारी पड़ी और जहां हर एक जगह महागठबंधन का पर्चा लहराया वही बख्तियारपुर से यादव बहुल मतदाता होते हुए भी, राजद हार गया। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि अनिरुद्ध यादव निर्दलीय जितेंद्र यादव के कारण चुनाव हार गए लेकिन यह बात गौर करने लायक है कि जितना वोट जितेंद्र यादव ने राजद का काटा था ठीक उतना ही वोट निर्दलीय प्रत्याशी अखिलेश जयसवाल ने बीजेपी का भी काटा था।


बाढ़ विधानसभा में मधु सिंह के परिवार का दखल तो 1985 के बाद से हर एक विधानसभा चुनाव और राजनीति में रही है।लेकिन मधु सिंह ने अपने राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन की शुरुआत 2017 में की थी। कहा जाता है कि जून या जुलाई 2018 में राजद सुप्रीमो से मुलाकात के बाद और तेजस्वी यादव से संकेत मिलने के बाद मधु सिंह राजद का झंडा लेकर बाढ़ विधानसभा में घूमना शुरू कर दी।बाढ़ के लोग बताते हैं कि पिछले 3 सालों में मधु सिंह उनके हर सुख दुख में शामिल होती आई हैं। रक्तदान हो, रामनगर दियारा में पिछले साल बाढ़ की विभीषिका हो, कोरोनावायरस काल में 10000 मास्क बांटने की बात हो और दो हजार घरों में राशन भेजने की बात हो या गरीबों के घर दुर्घटना होने पर आर्थिक मदद की बात हो, इन सभी सामाजिक कार्यों से मधु सिंह की लोकप्रियता बढ़ती गई। पार्टी की सक्रियता की बात करें तो मधु सिंह का दावा है कि उन्होंने सबसे अधिक 12000 प्राथमिक सदस्य बनाए बाढ़ विधानसभा में। उन्होंने यहां तक कह दिया कि कोई उनके आधे के आसपास भी नहीं पहुंचा। 9 सितंबर 2018 को भारत बंद का धरना प्रदर्शन हुआ जिसमें मधु सिंह ने सुबह 5:00 बजे ही एनएच 31 पर जाम लगा दिया था। उसके बाद सीए एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो, उज्जवला योजना के खिलाफ पुल पर से गंगा जी में सिलेंडर फेंकने की बात हो, अस्पताल और शिक्षा की समस्याओं को उठाने की बात हो, रोजगार यात्रा की बात हो, गरीब अधिकार दिवस की बात हो, पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ साइकिल रैली की बात हो या फिर पटना में जितने भी सम्मेलन हुए राजद नेत्री मधु सिंह की सहभागिता जबरदस्त  और प्रभावी ढंग से रही।कहा जाता है कि अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी के चुनाव प्रचार में भी सबसे ज्यादा सक्रिय पुरे बाढ़ विधानसभा में मधु सिंह ही रही थी जिसका उन्हें स्पष्ट फायदा मिला था।जब मधु सिंह से यह पूछा गया कि आपने राजद में कोई पद क्यों नहीं लिया? मधु सिंह का कहना है कि बहुत बार प्रदेश कार्यालय की तरफ से उन्हें पद सौंपने की बात की गई। लेकिन बाढ़ विधानसभा में उनकी सक्रियता पर इससे असर पड़ता और उन्होंने नेतृत्व से विनम्रता पूर्वक पद किसी और को देने का आग्रह किया।अनंत सिंह के गांव लदमा में नमिता नीरज के कार्यक्रम होने के बाद मधु सिंह ने करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कोई बाहुबली के दरबार में जा रहा है तो मैं जनता के दरबार में जाती हूं। दिनांक 4 सितंबर 2020 को उनकी रैली जबरदस्त रूप से सफल रही। रैली की शुरुआत उन्होंने जानबूझकर अपने पैतृक घर रामनगर दियारा से की और अंत बिहारी बीघा में एक सभा के माध्यम से किया। रैली में अभूतपूर्व भीड़ थी और विधानसभा स्तर पर पूरे गांव से हर एक जाति वर्ग के लोगों का भागीदारी उसमें हुआ। इस रैली में वह  सभी वर्गों को लुभाने में कामयाब रही। खासकर राजपूत और भूमिहार समाज की जबरदस्त भागीदारी थी। भूमिहार समाज की भागीदारी से लोग आश्चर्यचकित है लेकिन उसके पूछे कहा जाता है कि उनके स्वर्गीय दादा पप्पू बाबू का व्यक्तित्व काम आया।निश्चित तौर पर मधु सिंह ने नेतृत्व को अपनी ताकत से एहसास करा दिया उस रैली के माध्यम से। उनका साफ कहना है कि उन्हें टिकट उनके पिछले तीन-चार सालों पर मेहनत पर चाहिए। पिताजी का नाम तो अलग से बोनस है।जनमत का मिजाज, बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया और हमारा आकलन भी यही कहता है कि महागठबंधन के हर एक उम्मीदवारों में मधु सिंह सबसे मजबूत है। मधु सिंह के दावे को मजबूत बनाने के पीछे निम्नलिखित कारण  हैं-


1. पिछले 3 सालों से 24 घंटे जनता की सेवा में उपलब्ध रहने के कारण उनकी छवि उन्हीं के परिवार के पूर्व विधायक पप्पू बाबू की तरह बन गई है और लोगों में यह विश्वास हो गया कि पप्पू बाबू की पौत्रवधू   हैं तो आगे भी इसी तरह निभाएंगी।


2. रामनगर दियारा का मूल निवासी होना उन्हें दूसरा लाभ पहुंचाता है जिससे बाढ़ विधानसभा के लोग उन्हें अपने घर का मानते हैं।


3. मधु सिंह को टिकट देने से राजद को बाढ़ और बख्तियारपुर दोनों सीटों का फायदा मिलता दिख रहा है। खासकर बख्तियारपुर से राजद कैंडिडेट की जीत पक्की हो जाएगी क्योंकि मधु सिंह का परिवार 8000 से 10000 राजपूतों का वोट दिलवाने में सक्षम है बख्तियारपुर में।


4. सामाजिक जीवन में पहले से सक्रियता और उनके देवर नूनूवती जगदेव सिंह महाविद्यालय के सचिव भी हैं जिसमें बाढ़ विधानसभा के हजारों युवा पढ़ते हैं।


5. बेदाग छवि और प्रतिष्ठित और मजबूत आर्थिक बैकग्राउंड उनको सब से अलग करता है।


6. उनके इस दावे में भी सच्चाई है कि बाढ़ विधानसभा में राजद को मजबूत करने के लिए उन्होंने सबसे ज्यादा काम किया है।


7. प्रभुनाथ सिंह और राजद सुप्रीमो के परिवार के बीच की घनिष्ठता के कारण भी लोग मानते हैं कि टिकट उन्हीं को मिलेगा।


8.मधु सिंह का एक राजपूत चेहरे के रूप में पूरे बिहार में स्थापित होना। जानकारी यह बताते हैं कि मधु सिंह का टिकट काटकर सुबे बिहार में राजपूतों की नाराजगी झेलने की स्थिति में नहीं है।


9. और अंत में सोशल मीडिया की सक्रियता की बात करें तो ट्विटर और फेसबुक पेज पर सबसे ज्यादा फॉलोअर्स पूरे बाढ़ विधानसभा में सक्रिय उम्मीदवारों में मधु सिंह का ही है।तो बाढ़ विधानसभा में अगर ऐसी स्थिति बनती है कि भाजपा से ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू रहते हैं और राजद से मधु सिंह रहती हैं तो जानकारी यह बता रहे हैं कि मधु सिंह का विधानसभा पहुंचना निश्चित है। NDA के लोगों में भी दबी जुबान से यह चर्चा है कि अगर मधु सिंह को टिकट मिल गया तो बाढ़ सीट बचाना लगभग नामुमकिन है। देखना यह है कि अब ऊंट किस करवट बैठता है सब लोग अपनी अपनी दावेदारी कर रहे हैं। लेकिन बाढ़ विधानसभा की अगली विधायिका के रूप में मधु सिंह का नाम बाकी लोगों से काफी आगे हैं।


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