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मंगलवार, 8 सितंबर 2020

अलीगंज : आस्था का प्रतीक है औलिया बाबा का मजार

 


 



News (चन्द्र शेखर आज़ाद):-


जिले के अलीगंज प्रखंड के कोदवरिया पंचायत के भलुआना गाव के समीप दक्षिण पहाड़ पर सबसे उंची चोटी पर औलिया बाबा का मजार है, जो हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए कई वर्षों से आस्था व विश्वास का केन्द्र बना हुआ है। यह पहाड़ के पश्चिम गिरीडीह और कौआकोल से सटा हुआ है, तो पूरब जमुई-खैरा सीमा को छू रखा है। जो नक्सलियों और अपराधियों के लिए सेफ जोन भी माना जाता है। यह पहाड़ कई जिलों की सीमाओं को छूता है। औलिया बाबा का मजार भक्तजनों का असीम विश्वास व भक्ति का केन्द्र बिंदु बना हुआ है। मजार के बारे में कई पुराने लोग बताते हैं कि लगभग 250 वर्षो से पूजा-अर्चना की जा रही है। वहीं,बाबा का मजार चारों तरफ जंगल से घिरा हुआ है । पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर उनका मजार स्थित है। पुरानी गाथा है कि कुछ लकड़हारे लकड़ी लाने के लिए जंगल जाया करते थे, जिन्होंने देखा कि एक सफेद पैजामा-कुर्ता और उजले घोड़े की सवारी कर जंगलों का भ्रमण करते थे, और उसकी जंगली जानवरों से रक्षा करते थे।


 कुछ लोगों का दुख-दर्द भी सुनते थे। कई लोगों की मन्नतें भी पूरी हुई और स्वप्न देकर पहाड़ की सब से ऊंची चोटी पर ही रूक गए और वहीं समाधि ले लिये। तब से भक्त यहां पूजा-अर्चना कर अपनी मन्नतें मागते हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि सच्चे दिल से बाबा के दरबार मन्नतें मांगने वालों की मुरादें पूरी होती है। बाबा का मजार लगभग 200 फीट ऊंची पहाड़ पर है, जो पहाड़ के बीचोबीच हरे-भरे पेड़ पौधों की लहराते वृक्षों की नीचे टेढ़ी-मेढ़ी नुकीले पथरों की बीच जाने का रास्ता है। पहले जुम्मे और जुम्मेरात शुक्रवार व गुरूवार को रात में बड़ी संख्या में महिला व पुरूष बाबा का दर्शन करने के लिए पहाड़ पर ठहरते थे। बाबा के प्रसाद का रूप में मिठाई, बतासा, पेड़ा व सिरनी चदरा हरा कपड़ा चढ़ाया जाता है और खस्सी की बली दी जाती है। बाबा का पूजा भादो महीना छोड़ कर सभी महीनों की जाती है। सप्ताह के सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार को भारी संख्या में भक्तगण व श्रद्धालु अपनी इच्छा कामना पूर्ण होने पुजा -अर्चना और खससी की बलि दी जाती है। बता दें, बड़ी संख्या में तीनों दिन लोग बाबा के दरबार में पहुंचते हैं। जंगल की मनोरम व हरे -भरे पेड पौधे बाबा के मजार स्थल को और शोभा बढ़ाकर चार चांद लगा देती है।



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