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संपादकीय : अस्तित्व खोती जा रही गिद्धौर की उलाई नदी!

संपादकीय | सुशान्त साईं सुन्दरम : वर्तमान समय में अस्तित्व खोती जा रही नदियों की व्यथा मानवीय हवस और संवेदनहीनता की क्रूर कथा है. नदियों समेत अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर मौजूदा खतरा शहरीकरण की उपज है. गांव-कस्बों में विकास की बयार जबसे पहुंची और शहरीकरण की रफ्तार तेज हुई तब से ईंट, बालू और गिट्टी की मांग भी आसमान छूने लगी. गांव के खपड़ैल मकान की जगह अब पक्के मकान बनने थे तो निर्माण की सारी चीजें आवश्यक थीं. मिट्टी के लिए जमीन, बालू के लिए नदी और गिट्टी के लिए पहाड़, इन तीनों संसाधनों का अंधाधुंध दोहन मानवों द्वारा शुरू हो गया.
बालू के लिए नदियों को खोद डाला गया. ऐसे में बिना रेत के अस्तित्व खो रही नदियों ने पर्यावरण संकट को बढ़ा दिया है. गिद्धौर राजमहल के पीछे बहने वाली नदी में तीन नदियों का संगम है, नागी, नकटी एवं उलाई. सुनते हैं कि गिद्धौर (Gidhaur) महाराज का जब दरभंगा (Darbhanga) महाराज से शास्त्रार्थ हुआ तो गिद्धौर महाराज ने अपने एक जवाब से सबको निरुत्तर कर दिया. दरभंगा महाराज ने गिद्धौर महाराज से प्रश्न किया था कि आपकी राजशाही कितनी है? इस पर गिद्धौर महाराज ने कहा था कि मैं प्रतिदिन कुआँ खोदकर माँ दुर्गा को जल चढ़ाता हूँ. इसपर विस्मित होकर जब सबने जानना चाहा तो गिद्धौर महाराज ने कहा कि मैं प्रतिदिन नदी में चुआं या चुइयाँ खोदकर स्वच्छ जल देवी को अर्पित करता हूँ.
(सुशान्त साईं सुन्दरम, एडिटर-इन-चीफ़, gidhaur.com)
लेकिन वर्तमान को देखें तो वही गिद्धौर अब नदी को तरसने लगा है. इस नदी में स्नान कर शारदीय नवरात्र के समय में नदी किनारे अवस्थित अतिप्राचीन माँ दुर्गा के मंदिर में लोग दंडवत देते हैं. वहीं चैत्र एवं कार्तिक मास के छठ में पूरा गिद्धौर इसी नदी में एकत्रित होता है. लेकिन संगम होने वाली नागी, नकटी एवं उलाई नदियां अब सिमट गयी है. दिनोंदिन नदी में फेंके जा रहा कूड़ों का अंबार से परेशानी बढ़ती जा रही है. सबसे गंभीर स्थिति बालू उठाव को लेकर है. यूँ तो सरकार ने अवैध बालू उठाव पर पाबंदी लगा दी है, लेकिन चोरी-छिपे बालू उठाने का काम बदस्तूर जारी है. इस वजह से उलाई नदी दिनोंदिन गहरी होती जा रही है. नदी समतल होने से उपर झाड़-पात उग रहा है. ऐसे में आम लोगों के जनजीवन पर खतरा मंडराने लगा है. दरअसल, नदी पर्यावरण को लेकर शासन-प्रशासन भी उदासीन है. नदी को सुरक्षित रखने की पहल शासन-प्रशासन की ओर से नहीं हो रही है. उलाई नदी का अस्तित्व समाप्त होने से सिंचाई व पेयजल की समस्या उत्पन्न हो रही है. इससे किसानों में भी रोष है.
पतसंडा (Patsanda) पंचायत अंतर्गत उलाई (Ulai) नदी किनारे बसे गुडियापर गांव के रहने वाले कैलू जी कहते हैं कि पहले नदी के पानी से ही खेत का पटवन हो जाता था. लेकिन अब नदी, नदी न होकर धार रह गई है. न तो इसमें पर्याप्त पानी है और न ही वेग. जिस नदी के पानी से कभी गुडियापर गांव में खेती होती थी उस गांव की मिट्टी तक अब इसका पानी पहुंच भी नहीं पाता. अत्यधिक बालू उठाव के कारण उलाई नदी अपनी मूल रुप को खोती जा रही है. नदी की धारा छोटी और सिकुड़ती जा रही है. अगर, नदियों के साथ इसी तरह छेड़छाड़ जारी रहा तो नदी मैदान का रुप ले लेगा. इससे काफी परेशानी होगी.
नदी में रेत की कमी की वजह से बरसात के दिनों में आने वाली पानी कीचड़मय हो जाती है. केवल मिट्टी और कंकड़ ही नदी में मिलते हैं. रेत न होने की वजह से पानी ठहरती भी नहीं. गिद्धौर में नदी के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए शासन-प्रशासन को नदी पर्यावरण को शुद्ध रखने की जिम्मेदारी लेनी होगी. वहीं गिद्धौरवासियों को भी मिलकर साथ आना होगा. तभी नदी का जल स्वच्छ व पर्यावरण शुद्ध रहेगा.
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(ये लेखक के निजी विचार हैं. सुशान्त साईं सुन्दरम gidhaur.com के एडिटर-इन-चीफ़ हैं.)

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