संपादकीय : चुनावी चश्में से देखिए चुनावी स्वयंवर की वरमाला


gidhaur.com | शुभम मिश्र】:-

बिहार में छः चरणों का मतदान संपन्न हो चुका है। अब अंतिम चरण के चुनाव की तैयारी चल रही है। चुनावी महासमर में गांडीव अब भी गनगना रहे हैं। युद्धभूमि मत की प्यासी है।कुशल सेनापति अग्रिम मोर्चे पर अंतिम हुंकार भर रहे हैं। गदा प्रहार जारी है। जुबानी गोले एक दूसरे पर फेंके जा रहे हैं। मंच के भीतर लठमारी मची हुई है। आखिरी पर्दा गिरने में कुछ देर है और दर्शक वोट देने वाली ऊंगली थामे दम साधे बैठे हैं। सबकी अपनी-अपनी अयोध्या है,और सब अपने विरोधियों को दशानन बता रहे हैं। 


निर्वाचन क्षेत्रों की अयोध्याओं में स्वागत के शामियाने तने हुए हैं। चुनावी स्वयंवर में कोयलें आदेश पर मंगल गीत गा रही हैं। कुछ कागे बेशुरा गा रहे हैं। मगर ये सब जिसके लिए हो रहा है वही लापता है। कुछ गोले गलती से जागरूक मतदाताओं पर भी गिर पड़े हैं, पर वे इस बात का तनिक भी बुरा नहीं मान रहे हैं। यहां तक कि उनका पूरा शरीर घोषणा-पत्र और संकल्प पत्रों से बिंध चुका है। चुनावी रथी मतदाताओं का इस तरह ख़याल रख रहे हैं कि जैसे ही वह दुःखी होना चाहता है,उसी समय उस पर आश्वासनों की बौछार कर देते हैं। उसके चेहरे पर एक अदद हंसी लाने के लिए दुनिया के सारे वादे संकल्प कुर्बान किये जा रहे हैं। कुछ ही दिनों के बाद ये राजनीतिक कैदी इंतजार की जेलें तोड़कर फरार हो जायेंगे। जीत जाने के बाद पांच सालों तक फरार हो जाने का रिवाज़ तो है ही।
कुछ जागरूक मतदाताओं की आंखें भी, इन्हें अपने परिवार के सत्ता-सुख के लिए संघर्ष करते देखते हुए छलछला उठती हैं। इससे उन्हें खुद के परिवार को दो जून की रोटी खिला पाने का हौसला मिलता है।
बता दें कि चुनाव के पश्चात मतदाताओं के जीवन में एक अजीब सा सन्नाटा छा जायेगा।कल का कानफाड़ू शोर नदारद रहेगा। कुछ लोगों की मानें तो चुनाव प्रचार जितना घटिया होता है,उतना ही लोकप्रिय भी। आसमान से उतरे सियासी एवं फ़िल्मी सितारे फिर से ईद का चांद बन जायेंगे। यही क्या कम है..? कि एक बार दर्शन दे दिए। ग़रीबी हटाने,भ्रष्टाचार मिटाने,किसानों के कर्ज माफ करने जैसे वादे दोहराते हुए धूप-गर्मी झेलकर,करोड़ों के स्वामी सतत वातानुकूलन के आदी,तपती लू और जलती भट्ठी जैसे सूरज की तपिश में कितना त्याग कर रहे हैं। कभी निर्धन बच्चों को सांस रोककर दुलारते हैं, तो कभी गरीब वृद्धों के पैर पड़ते हैं। जब जनसेवा को मिशन माना है तो सेवा धर्म निभाना ही होगा। जैसे धंधे में कोई सुख-चैन भूले,वैसे ही यह जन कल्याण में शारीरिक कष्ट और असुविधा भूल जाते हैं। इस दरम्यान कितनों का तो वजन कम गया है। भीड़ उमड़ती है,जब वो अपनी रथनुमा सवारी से कार के "वाइपर" के  समान हाथ हिलाते हैं।किसी को क्या ख़बर कि उनके हाथ हिलाते- हिलाते दुखने लगते हैं जिससे जुबान अर्थहीन बकबास करने लगता है। वह तो कुर्सी प्रेम के कारण स्वस्थ हैं वरना कब के बिस्तर पकड़ लिये होते...।
भीड़ देखकर उन्हें विटामिन "वी" यानि वोटर के पावर का आभास होता है,जिस कारण चेहरा चमकता है।
जानकारों का आकलन है कि भीड़ का वोट में तब्दील होना कोई निश्चित नहीं है। भीड़ में कुछ लोग नेता को देखने की उत्सुकता से आते हैं तो अधिकतर पैसे-पुड़ी के प्रलोभन के कारण।जनता जानती है कि आदर्श उसूल बस दिखाने वाले हाथी के दांत हैं,भाषणों की शोभा हैं,स्वार्थ के खाने-चबाने के दांत और हैं। सबका सीमित और इकलौता लक्ष्य 'सत्ता' है। चुनावी दर्शक 23 मई को होने वाले स्वयंवर की बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं कि चुनावी स्वयंवर की वरमाला किसके गले में पड़ेगी ।
               आइये देखते हैं .......
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