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रविवार, 24 जून 2018

संपादकीय : आसान नहीं दिग्विजय होना

सम्पादकीय (विशेष संस्मरण) : दोपहर का ही समय रहा होगा. यही कोई 3-4 बजे के आसपास. गिद्धौर के कुमार सुरेन्द्र सिंह स्टेडियम में किसी खेल का आयोजन चल रहा था. अब यह राज्यस्तरीय था या राष्ट्रस्तरीय यह ढंग से मुझे याद नहीं. शायद वर्ष 2004 या 2005 की यह बात है. हर दिन की तरह उस दिन भी मैं वहां होने वाली स्पर्धाओं को देखने जा पहुंचा था. छोटा होने की वजह से भीड़ में मुंडी घुसाने या भीड़ को चीरकर आगे आने की मशक्कत करना मुझे अच्छा नहीं लगता था. इसलिए स्टेडियम पहुँचते ही सीधा मंच पर जाकर वहीं से खड़े-खड़े इसका आनंद लेता था. इसके लिए अपने पसंद की एक जगह को मैंने चुन रखा था जहाँ से बिना किसी अवरोध के पुरे स्टेडियम को देखा जा सकता था.

हर दिन की तरह उस दिन भी स्टेडियम पहुँचते ही मंच की ओर बढ़ चला. मंच की सीढ़ियाँ चढ़ते ही थोडा ठिठका, क्यूंकि खेल के आयोजन का कुछ उस दिन कुछ विशेष स्पर्धा था, लेकिन समापन का दिन नहीं था ये अच्छे से याद है मुझे. इसलिए वहां तत्कालीन बांका सांसद दिग्विजय सिंह मौजूद थे. यूँ तो उद्घाटन भी उन्होंने ही किया था लेकिन उस दिन मैं नहीं जा सका था.

अब जबकि वहां पहुँच चूका था तो ऐसे ही वापस लौट जाने की इच्छा नहीं हुई और हिम्मत कर के मंच पर अपनी रोजाना वाली जगह पर जा पहुंचा. मंच के आगे वाली सीढ़ी दो तरफ से है, पूर्व और पश्चिम जो कि दोनों एक प्लेटफ़ॉर्म पर आकर मिलती है. मंच को घेरने के लिए प्लास्टर ऑफ़ पेरिस के छोटे-छोटे खम्भों के बाड़ जैसे लगे हैं. आगे की सीढ़ी से चढ़कर पश्चिम की ओर उसी बाड़े के पास मैं जा खड़ा हुआ और मैदान में चल रहे खेल का आनंद लेने लगा.

काफी देर होने के बाद पीछे से आवाज आई, "बैठ जाओ न." पलटने पर देखा दामोदर काकू आवाज दे रहे थे. दामोदर काकू यानि कि दामोदर रावत उस समय झाझा विधानसभा के एमएलए थे. चूँकि बंगाल में चाचा को काकू कहते हैं और गिद्धौर से निकट होने की वजह से बंगाल की संस्कृति व भाषा का काफी प्रभाव यहाँ की लोकसंस्कृति व बोलचाल में है, इसलिए और घर के भाई-बहन पापा-चाचा के दोस्तों को काकू ही कहा करते आए हैं, इसलिए वैसे लोगों को मैं भी काकू ही कहता हूँ.

मैंने उनसे कहा, "हम ठीक हैं." इस बीच दिग्विजय सिंह हाथ मोड़े मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. दामोदर काकू ने फिर कहा, "पैर दुखने लगेगा, बैठ के देखो." बैठने के लिए मैं मंच पर पीछे लगी कुर्सियों में जगह देखने गया. जगह नहीं मिलने और ऐसी जगह मिलने, जहाँ से मैदान में हो रही गतिविधियों को देख पाना संभव नहीं था, मैं वापस से दामोदर काकू के पास जाकर बोला कि जगह ही नहीं है. तभी दिग्विजय सिंह बोले, "पीछे से देखोगे कैसे? यहाँ बैठ जाओ." वो अपने बाएँ ओर की कुर्सी की तरफ इशारा कर बैठने बोले. उनकी दाहिनी ओर दामोदर काकू और उनके ठीक बगल में बड़े पापा बैठे थे. उनके पीछे राजो काकू (राजेन्द्र रावत), जो कि तब दामोदर काकू के पर्सनल सेक्रेटरी थे, वो बैठे थे.

दिग्विजय सिंह के बगल में बैठने में मुझे झिझक हो रही थी. हालाँकि उस वक़्त मैं काफी छोटा था लेकिन बचपन से ही दिग्विजय सिंह के बारे में सुनता आया था. घर में राजनीतिक माहौल होने के कारण उनकी चर्चाएँ होनी आम थीं. बड़े पापा उनके करीबियों में से एक रहे. उस समय मैं सोच रहा था कि उनके बगल में बैठूं या नहीं? तभी दमोदर काकू फिर बोले, "बैठ जाओ वहीं पर."

मेरे बैठने के बाद दामोदर काकू दिग्विजय सिंह से बोले, "चिन्हअ ह एकरा?" (पहचानते हैं इसे?) दिग्विजय सिंह बोले, "देखे तो हैं इसको कई बार." तब दामोदर काकू ने उन्हें बताते हुए कहा, "डॉ. प्रफुल्ल का बेटा है." इसे सुनने के बाद उन्होंने आश्वस्त होते हुए अपना सर हिलाया. जिसके बाद मेरी पढ़ाई और शौक के बारे में उन्होंने मुझसे बातचीत की. उस दिन की स्पर्धा की समाप्ति शाम 5:30 के बाद हुई. पुरस्कार वितरण के दौरान भी दामोदर काकू और दिग्विजय सिंह के साथ खड़े होने का मौका मिला. यह मेरे लिए तब भी और अब भी बहुत बड़ी बात है.

इस बारे में आज भी सोचता हूँ तो लगता है जैसे वो कुर्सी मेरे सौभाग्यवश ही खाली थी.
सुशांत साईं सुन्दरम
इसके बाद गिद्धौर महोत्सव में अल्ताफ रज़ा के कार्यक्रम के दौरान दर्शक दीर्घा में दूसरी पंक्ति में ठीक उनके पीछे बैठने का अवसर मिला. चूँकि अल्ताफ का कार्यक्रम सुबह 4 बजे तक चला था और मैंने उनके पुरे कार्यक्रम का लुत्फ़ उठाया था. तो रात ढलते-ढलते भीड़ खाली होने लगी और वीआईपी दीर्घा से भी लोग उठकर जाने कगे, तो मैं खाली कुर्सियों का मुआयना करने पहुँच गया और जगह देखकर दूसरी दीर्घा में रखी कुर्सी पर बैठ गया. आगे सोफे लगे थे जिनपर दिग्विजय सिंह के साथ और भी कई लोग बैठे थे. पहली बार श्रेयसी सिंह को देखा था. तब वो साधना कट हेयरस्टाइल रखती थीं.

दिग्विजय सिंह गिद्धौर से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता गिद्धौर राजघराने में मेनेजर हुआ करते थे. जमुई लोकसभा बनने से पहले गिद्धौर इलाका बांका लोकसभा में ही हुआ करता था. दिग्विजय सिंह राजनीति के क्षेत्र में इसी लोकसभा का नेतृत्व करते थे. केन्द्रीय मंत्री के रूप में भी उन्होंने भारतीय राजनीति में अपना योगदान दिया.

हालांकि अब नीतीश कुमार बिहार में और नरेंद्र मोदी देश के हर कोने तक बिजली पहुँचाने का तथाकथित दावा कर रहे हैं. लेकिन 10-15 बरस पहले गिद्धौर में जब ज्यादा समय के लिए बिजली आती थी तो सबको अपने आप ही पता चल जाता था कि दिग्विजय सिंह गिद्धौर आये हुए हैं.

गिद्धौर रेलवे स्टेशन पर पुल का निर्माण होना भी उस समय चर्चा का विषय था. रेल राज्य मंत्री रहते हुए उन्होंने गिद्धौर रेलवे स्टेशन से यात्रा करने वालों को यह तोहफा दिया था.

अपनी माँ की स्मृति में उन्होंने सोना देवी मेमोरियल चैरिटेबल हॉस्पिटल का निर्माण कराया. जिसका उद्घाटन करने तत्कालीन उप राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत पहुंचे थे. पहली बार हेलिकोप्टर को करीब से देखने पापा की उँगलियाँ पकड़े बम कोठी के पास के मैदान गया था. बड़े पंखे और खुले दरवाजे से सीट देख विस्मृत था. स्काई ब्लू एक्वा रंग का हेलिकोप्टर था वो.

निजामी बंधू, अनूप जलोटा, पंकज उधास, नलिनी-कमलिनी, रविन्द्र जैन, विश्वमोहन भट्ट सरीखे बड़े सितारों को दिग्विजय सिंह ने गिद्धौर सांस्कृतिक महोत्सव के बहाने यहाँ की धरती पर उतार दिया था. उस आबोहवा में जहाँ की मिट्टी में सौंधी सी खुशबु और वातावरण में प्रकृति की मिठास घुली हैं.

दिग्विजय सिंह की शख्सियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जब उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने उन्हें वर्ष 2009 में लोकसभा का टिकट नहीं दिया था तो उन्होंने बगावत करते हुए निर्दलीय ही बांका से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.

उनसे आखिरी मुलाकात गिद्धौर के एक स्कूल के उद्घाटन के अवसर पर 20 फ़रवरी 2010 को हुई थी जहाँ उन्होंने पुचकारते हुए मेरी खैरियत पूछी थी.

और फिर उसी वर्ष (2010) 28 जून की अहले सुबह प्रकृति भी गमगीन थी. फुहार वाली बारिश हो रही थी मानों आसमान भी सिसककर रो रहा हो. दिग्विजय सिंह अब दिवंगत हो चुके थे. 24 जून को लन्दन में ब्रेन हेमरेज की वजह से उनकी मृत्यु हो गई थी. वे वहां कामनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति की बैठक में हिस्सा लेने गए हुए थे. 28 जून को उनके पार्थिव शरीर को गिद्धौर लाया गया था. तब जाकर लोगों को उनके स्वर्गीय हो जाने पर भरोसा हुआ था. आम लोगों के अंतिम दर्शन के लिए ताबूत कुमार सुरेन्द्र सिंह स्टेडियम के मंच पर रखा गया.

और ये वही मंच था जहाँ कुछ वर्ष पहले ही उनके बगल में मैं बैठा था. पंक्ति से जाकर मैनें भी उनके अंतिम दर्शन किये. उनके बाएं ओर ही. मैं था, दिग्विजय सिंह थे, लेकिन वो अब कुछ बोल नहीं रहे थे. बेजान से ताबूत में पड़े उनका चेहरा भभस गया था. सर के अगल-बगल रुई की मोटी तह रखी थी जिसमें खून के अंश नजर आ रहे थे. मेरी ऑंखें नम हो गईं थीं.

कुछ घंटों बाद ही उन्हें ले जाया गया. पूरा गाँव रोया था. किसीने ढंग से खाना नहीं खाया था उन हफ़्तों में. दिग्विजय सिंह पंचतत्व में विलीन हो गए. नश्वर हो गए. लेकिन उनसे जुड़े कई किस्से आज भी चर्चित हैं.  नीतीश कुमार, लालू यादव, रामविलास पासवान सबने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की थी. दिग्विजय सिंह अब भी हमारे बीच हैं. उनके विचारों, सिद्धांतों, आदर्शों एवं समाज के प्रति उनके समर्पण में.

आज आठवीं पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि.

सुशांत साईं सुन्दरम
एडिटर इन-चीफ, गिद्धौर डॉट कॉम gidhaur.com
गिद्धौर      |       24/06/2018, रविवार
mail@gidhaur.com
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