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हमारा तंत्र, हम और कोरोना! क्या बच पाएगी जिंदगी?



पटना | अनूप नारायण :
कोरोना वायरस के वैश्विक महामारी के संकट से अपना देश भी गुजर रहा है।सोशल मीडिया के अलावे सरकारों ने भी बचाव, सुरक्षा के लिए पूरी जानकारी लोगों तक पहुंचा दी है।सरकारों ने प्रयास भी तेज कर दिए हैं।इस संकट से निकलने के लिए देशवासियों (लगभग) ने भी सकारात्मक सहयोग दिया है और पर्याप्त प्रयास कर रहे हैं कि सामाजिक दूरी बनी रहे। स्टेशनों-बस अड्डों पर, बाजारों में फैला सन्नाटा इसके गवाह हैं।

हम सबको पता है कि स्टेज थ्री में करोना इंडियन टू इंडियन फैलेगा सो स्थिति भयावह होगी। यद्यपि कनिका कपूर जैसी सेलेब्रिटी अपने आर्थिक पक्ष के लिए देश को स्टेज थ्री में ढकेल चुकीं हैं। मोदी विरोधी एक नेता का यह बयान भी कि मैं सबको गले लगाऊंगा, बचकाना, बेवकूफाना और अवैज्ञानिक और इस हालात में गैरकानूनी बयान से ज्यादा कुछ भी नहीं।

खैर! लोकतांत्रिक देश में अटेंशन के लिए टटपूजिँए नेता ऐसा करते हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि  देश में करोना वायरस के स्टेज थ्री में जाने की आशंका से ही देश की सरकारी मशीनरी ने जितनी फुर्ती दिखाई और जितना चाक-चौबंद किया वह हैरत करने वाला है। आनन-फानन में बैठकें, ताबडतोड फैसले, एडवाईजरी, गाइडलाइन, प्रशिक्षण ने सुरक्षा की मजबूत दीवार खडी कर दी। समय रहते जनता कर्फ्यु की घोषणा ने अब तक वह कर दिखाया है जो स्पेन, इटली, फ्रांस जैसे देश नहीं कर पाए और लापरवाही का नतीजा भुगत रहे हैं।

इतना तय है कि सरकारी स्तर पर जो संसाधन हैं वो तैयार हैं और भारतीय जनमानस भी इक्के-दुक्के मूरखों, लोभियों को छोड़कर बचाव की मुद्रा में है।

देश के लगभग सवा लाख सरकारी अस्पतालों में लगभग साढे तीन लाख डॉक्टर काम पर हैं और सतर हजार के आसपास आईसीयू हैं। कुल मिलाकर इस महामारी के खिलाफ सरकारी मशीनरी ही आगे खडी है हमारे लिए।
निजीकरण के फैसलों से खजाना भरने वाली कम्पनियों की चुप्पी यह बताती है कि अंततः हमारे लिए सरकार ही खडी है। हम चाहे लाख सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, परिवहन प्रणाली, सुरक्षा प्रणाली, न्यायिक व्यवस्था  को कोस लें लेकिन आज तो इस घडी़ सरकारी अस्पताल ही आशा के केंद्र हैं ।मैक्स, वेदांता, अपोलो जैसे अस्पतालों की चुप्पी, उनके डाक्टरों का मुद्वे से आईसोलेशन यह बताने को काफी है कि ये उनका ही ईलाज करेंगे जो 'पे'कर सकते हैं। इनका इस हालात में कोई राष्ट्र धर्म नहीं है।

तब तो हमारे सरकारी डाक्टरों पर ही बात टिकती है। चाहे जो भी संसाधन हों अस्पताल में हमारे लिए तो वही खडे हैं। चाहे एम्स हों, चाहे रिम्स हों, चाहे मेडिकल कालेज हों, चाहे जिला अस्पताल। आम जनता के लिए तो यही डॉक्टर कमर कसे दिखते हैं।पी.जी.आई. चंडीगढ़ के दो डाक्टर इलाज करते-करते खुद एक्सपोज होकर आईसीयू में चले गए। आखिर 8घंटे तक PPE (Private Protection Equipment) पहनकर बिना खाए-पिए मरीजों का आईसीयू में ध्यान करना कितना असहनीय होता होगा जरा कल्पना करके देखिए। सब कुछ बंद। नौकरी से आजादी वेतन सहित। ऐसे में यह सरकारी डाक्टरों-नर्सों का ही महकमा है जो 24 घंटे सातों दिन काम पर है, खुद के एक्सपोजर हो जाने के खतरे के बावजूद।

फिर क्यों न हम सराहें अपने डॉक्टर को, अपनी सरकारों को, अपने प्रशासनिक तंत्र को, जो लाख संसाधनविहीन है मगर है तो खडी।दूसरी ओर चुप हैं रिलायंस, अडानी, गोदरेज, यूनीलीवर, टाटा, आयशर, हीरो, महिन्द्रा यहां तक की पतंजलि।
और हाँ, अगर कोई ऐसी-वैसी बात हुई तो जनसहयोग के लिए कूदेंगे सरकारी शिक्षक ही। सिंधिया, दून, ग्लोबल, डी.पी.एस आदि स्कूलों के शिक्षक सिर्फ तमाशा देखेंगे। ऐसे में विश्वास रखिए सरकार पर, सरकारी तंत्र पर।अपना योगदान दीजिए, सराहना कीजिए। उपहास तो हम करते ही रहते हैं।वक्त है समझने का।

अब आईए करोना की थोडी बात कर लें। करोना वायरस RNA वायरस है।यह अपना प्रोटीन बारह घंटे में बदल लेता है। ऐसे में कोई मेडिसिन रिसर्चर उसके जिस प्रोटीन की पहचान कर दवा/वैक्सीन खोज पाता है तब तक यह वायरस अपना नया प्रोटीन बना लेता है। ऐसे में पहले वाली दवा/वैक्सीन बेकार। फिर वायरस के नये प्रोटीन की पहचान और उसकी दवा की खोज शुरू। दवा आते-आते उधर फिर नया प्रोटीन। आपकी सारी कवायद इसी लुकाछिपी में बरबाद। तभी तो करोना खतरनाक है।

दूसरी, सर्दी-खाँसी, जुकाम-बुखार बडी बात नहीं है। बात है आईसीयू का उतना न होना। करोना वायरस से आप आईसीयू में ही मुक्त हो सकते हैं। ऐसे में भारी संख्या में अचानक संक्रमित मरीजों का इलाज भला कैसे संभव है? तब संक्रमण से बचाव ही इलाज है और यही बचाव करना है।

फिर भी, कोई बात नहीं। हमारा व्यवहार, हमारा जीवन कौशल, हमारा सरकारी तंत्र इस वायरस पर भारी पडेगा।