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बिहार : 'पराली प्रबंधन' कर महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भर


10 JAN 2020

बेतिया/पटना : एक ओर जहां बिहार से लेकर कई राज्यों में पराली (पुआल) जलाने से किसानों के रोकने के लिए सरकार द्वारा कठोर नियम बनाए जा रहे हैं, वहीं बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के कई गांवों की महिलाएं पराली के प्रबंधन के जरिए ना केवल आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि पराली जलाने की समस्या का समाधान भी यहां के किसानों को मिल गया है।

पश्चिम चंपारण जिले के बगहा-2 प्रखंड के कई गांवों में महिलाएं पराली से चटाई और बिठाई (छोटा टेबल, मोढ़ा) जैसी वस्तुएं बनाती हैं। रामपुर गांव की रहने वाली बुजुर्ग महिला सुभावती देवी ने बताया कि पुआल से यहां पहले भी ऐसी वस्तुएं बनाई जाती थीं, लेकिन अब इस काम से कई महिलाएं जुड़ रही हैं।

बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी जल-जीवन-हरियाली यात्रा के क्रम में राज्य के सभी क्षेत्रों में पहुंचकर लोगों को प्रदूषण नियंत्रण करने का संदेश दे रहे हैं। इस क्रम में मुख्यमंत्री लोगों से पराली जलाने से होने वाले नुकसान से भी लोगों को अगाह कर रहे हैं।

नीतीश इस यात्रा के क्रम में वाल्मीकिनगर भी पहुंचे थे और इससे नुकसान को लेकर लोगों को अवगत कराया था। इसके बाद पराली के जलाने से होने वाले नुकसान और पर्यावरण संतुलन को लेकर गांवों में भी जागरूकता आई है।

अब गांव की महिलाओं ने धान की पराली और अन्य फसलों के अवशेष का प्रबंधन करने का ना केवल जुगाड़ कर लिया है, बल्कि अपनी रोजमर्रा की जरूरतें भी पूरी कर रही हैं।

लक्ष्मीपुर गांव की रहने वाली जहीरा खातून ने बताया कि ये लोग पहले से ही चटाई और स्टूल बनाती थीं, लेकिन अब पराली से होने वाले नुकसान से पुरुषों को भी आगाह करने लगी हैं। आज महिलाएं समूह बनाकर यह काम कर रही हैं।

चंपापुर में तो कई महिलाएं अब पराली से बनाई अपनी वस्तुओं को बेचकर आर्थिक लाभ लेने लगी हैं। एक महिला ने कहा कि उन लोगों ने इसका व्यापार तक करना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि वे बेतिया बाजार में एक-दो दुकानदारों को चटाई और बिठाई की बिक्री करती हैं, जहां से लोग इसे खरीद भी रहे हैं।

लक्ष्मीपुर गांव में अधिकांश महिलाएं खाना बनाकर एक जगह इकट्ठा हो जाती हैं और इसे बनाने के काम में जुट जाती हैं। कई घरों में यह काम खूब जोरों से चल रहा है। महिलाएं कहती हैं कि फूस की झोपड़ी बनाने में काम आने वाले खर-खरई का काम भी इस पराली ने अब दूर कर दिया है। फूस की झेापड़ी बनाने में भी अब लोग पराली का ही इस्तेमाल कर रहे हैं।

बगहा के वरिष्ठ पत्रकार गिरेंद्र पांडेय का कहना है कि पुआल से बनी वस्तुएं पूरी तरह इको-फ्रेंडली है। इसमें प्लास्टिक का उपयोग नहीं किया जाता है। कहीं बांधने की जरूरत भी होती है तो पराली से ही बनी रस्सियों का उपयोग किया जाता है।

उन्होंने बताया कि चटाई हर डिजाइन और साइज की बानाई जा रही है। ठंड के दिनों में यह बिस्तर को गरम भी रखती है।

बगहा-2 प्रखंड के कृषि पदाधिकारी पृथ्वीचंद भी महिलाओं के इस गुर के कायल हो गए हैं। उनका कहना है कि पराली जलाने से खेतों को कई तरह से नुकसान पहुंचता है। खेतों की उर्वरा-शक्ति भी क्षीण पड़ जाती है।

उन्होंने कहा कि यहां की महिलाओं ने पराली प्रबंधन का एक रास्ता दिखाया है, जिसे अन्य गांवों और प्रदेशों में भी अपनाया जाना चाहिए।