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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

हिमालय प्रकृति का प्रहरी ही नहीं, जीवन का पहरेदार : डॉ. गौरी शंकर पासवान

हिमालय की रक्षा पूरी मानवता की जिम्मेदारी, अनियंत्रित विकास भविष्य के लिए बन सकता है जोखिम
अलीगंज/जमुई। राजकीय डिग्री महाविद्यालय, इस्लामनगर अलीगंज में बुधवार को हिमालय दिवस के अवसर पर ‘हिमालय का महत्व और उसकी रक्षा’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. गौरी शंकर पासवान ने की। परिचर्चा में महाविद्यालय के शिक्षकों के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिमालय के पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक महत्व पर अपने विचार रखे।

अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्य डॉ. गौरी शंकर पासवान ने कहा कि हिमालय प्रकृति का प्रहरी ही नहीं, बल्कि मानव जीवन का पहरेदार है। यह केवल देश की सीमाओं का प्रहरी नहीं, बल्कि जल और पर्यावरण का भी महत्वपूर्ण संरक्षक है। हिमालय का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसलिए हिमालय की रक्षा किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता का दायित्व है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति के नियमों को नजरअंदाज कर किया गया विकास वास्तविक विकास नहीं, बल्कि भविष्य के लिए जोखिम है। हिमालय को बचाना केवल पहाड़ों को बचाना नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की प्यास, जल स्रोतों, जंगलों, जमीन, जीव-जंतुओं और मानव सभ्यता को सुरक्षित रखना है। उन्होंने कहा कि जहां जंगल मजबूत और घने होते हैं, वहां पर्वत की पारिस्थितिकी भी उतनी ही मजबूत रहती है।

प्राचार्य ने कहा कि हिमालय को जितना अधिक अनियंत्रित ढंग से खोदा जाएगा, उतना ही प्रकृति के संतुलन को चुनौती मिलेगी। अनियंत्रित खनन और निर्माण गतिविधियों से पर्वतीय पारिस्थितिकी पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। हिमालय सुरक्षित रहेगा तभी भारत की जलधाराएं भी सुरक्षित रहेंगी। हिमालय की रक्षा सीधे तौर पर जल सुरक्षा से जुड़ी हुई है। उन्होंने ग्लेशियरों के संरक्षण को समय की सबसे बड़ी जरूरत बताते हुए कहा कि ग्लेशियरों का संरक्षण मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

नेपाल में हाल में पर्वतीय क्षेत्र में आई प्राकृतिक आपदा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं प्रकृति के बदलते स्वरूप की गंभीर चेतावनी हैं। इन घटनाओं को केवल आपदा मानकर भूलने के बजाय इनके पीछे छिपे पर्यावरणीय संकेतों को समझने की आवश्यकता है।

हिंदी के सहायक प्राध्यापक सह बर्सर डॉ. गिरधारी लाल लोधी ने कहा कि हिमालय से भारतवर्ष को व्यापक प्राकृतिक और आर्थिक लाभ मिलता है। ऐसे में हिमालय की सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत का भी महत्वपूर्ण दायित्व है। हिमालय सुरक्षित रहेगा तो मानव जीवन और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहेंगे।
अर्थशास्त्र के सहायक प्राध्यापक श्रेय शेखर एवं कामेश्वर प्रसाद ने कहा कि हिमालय को समझने और बचाने के लिए प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की सोच को बदलना होगा। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही स्थायी समाधान है। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के संकेतों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के संकेत भविष्य के लिए चेतावनी हैं। समय रहते इनके संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम उठाना जरूरी है।

समाजशास्त्र के सहायक प्राध्यापक डॉ. राकेश कुमार ने कहा कि हिमालय में होने वाले संकट और पर्यावरणीय बदलाव का प्रभाव अब मैदानी क्षेत्रों तक भी पहुंचने लगा है। उन्होंने कहा कि ऐसा विकास ही वास्तविक विकास है, जो प्रकृति और पर्वतीय पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़े। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए सतत विकास ही सबसे सुरक्षित और प्रभावी विकास का मार्ग है।

राजनीति विज्ञान की सहायक प्राध्यापक प्रिया कुमारी एवं इतिहास की सहायक प्राध्यापक अंजलि सार्थक ने कहा कि हिमालय दिवस केवल हिमालय की ऊंची चोटियों को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि इस विशाल प्राकृतिक व्यवस्था के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने का भी दिन है। हिमालय भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों के जीवन, जल, कृषि, जैव विविधता और जलवायु को प्रभावित करता है। इसलिए इसकी सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

मिर्जागंज के पूर्व मुखिया सरवन कुमार पासवान एवं रूपेश कुमार ने कहा कि हिमालय को ‘एशिया का वाटर टावर’ कहा जाता है। हिमालय से निकलने वाली नदियां देश के विशाल भूभाग को सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। करोड़ों लोगों का जीवन इन नदियों और जल स्रोतों पर निर्भर है। ऐसे में हिमालय का संरक्षण सीधे तौर पर मानव जीवन और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने एक स्वर में हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण, वनों की सुरक्षा, अनियंत्रित खनन एवं निर्माण पर नियंत्रण तथा ग्लेशियरों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में हिमालय को बचाने के लिए सामूहिक जागरूकता और जिम्मेदार विकास की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।

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