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गिद्धौर : सरकारी राशि का बड़ा झोल, निर्धारित मेन्यू से नहीं दिया जा रहा मिड डे मील

गिद्धौर/जमुई (Gidhaur/Jamui), 23 अप्रैल :
जमुई जिलान्तर्गत गिद्धौर प्रखंड के सरकारी विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन की बेहतर गुणवत्ता का दावा किया जाता है। इसके लिए मध्याह्न भोजन प्रभारी की ओर से नियमित निरीक्षण भी किया जाता है। बावजूद इसके प्रखंड के अधिकांश विद्यालयों में भोजन की गुणवत्ता तय मानक के अनुसार नहीं मिल रही है। साथ ही बच्चों को निर्धारित मेन्यू के मुताबिक भोजन मिल रहा है। 

बीते शुक्रवार को पत्रकारों की टीम ने गिद्धौर प्रखंड के विद्यालयों में मिड डे मील की रियलिटी चेक की तो कई स्कूलों में भोजन की गुणवत्ता मानक के अनुसार नहीं मिली। शुक्रवार को अंडा या उसके जगह पर फल देने का मीनू चार्ट में प्रावधान है, लेकिन प्रभारी की मनमर्जी के कारण बच्चों को भोजन नहीं दिया जाता है।
गिद्धौर प्रखंड अंतर्गत महुली, खड़हुआ एवं कुमरडीह के तीन विद्यालयों के निरीक्षण के दौरान कई गड़बड़ियां सामने आई। प्रखंड के मध्य विद्यालय अनुसूचित जनजाति महुली के निरीक्षण में जो काला सच सामने आया हैं उससे एमडीएम में धांधली के सारे रिकार्ड टूटते नजर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि विद्यालय में 6 टीचर के जगह पर तीन ही उपस्थित थे बच्चे भी कम नजर आ रहे थे लेकिन उपस्थिति पूर्ण था।

वहीं मध्य विद्यालय खड़हुआ में निरीक्षण के दौरान विद्यालय में बच्चों की भौतिक उपस्थिति बहुत कम पाई गई लेकिन एमडीएम में छात्रों को मौजूद दिखाया गया। वहीं विद्यालय प्रभारी नीलम कुमारी से जब पूछा गया कि क्या विद्यालय में शुक्रवार को अंडा या फल दिया जाता है? तो उन्होंने कहा कि यहां के बच्चे अंडा नहीं खाते हैं। मेरे पास पैसा भी नहीं है। पत्रकार साहब आप ही दे दीजिए। नहीं तो हम कल बच्चों को फल दे देंगे। इसमें क्या गलती है। सरकार देखने आते हैं क्या?
वहीं प्राथमिक विद्यालय कुमरडीह के प्रभारी प्रधानाध्यापक द्वारा बच्चों को सब्जी-चावल खिलाया जा रहा था। पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि जैसा खाना बनता है, वैसा खिलाते हैं। लिस्ट के अनुसार खाना देना जरूरी नहीं है। जिसको जो करना है करें।

खैर जो भी हो इन दिनों गिद्धौर प्रखंड के सरकारी विद्यालयों में मिड डे मील योजना में लूट मची हुई है और पदाधिकारी अंजान बने हैं।

बता दें कि बच्चों के मिड डे मील में गड़बड़ी किए जाने और उन्हें मेन्यू के अनुरूप भोजन नहीं दिए जाने से जहां इस योजना के लिए उपलब्ध कराई जा रही सरकारी राशि में गबन की आशंका पैदा हो रही है, वहीं बच्चों में कुपोषण दूर करने की सामाजिक कोशिशों को भी धक्का लग रहा है।