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क्रिप्टो करेंसी एक छलावा है, इससे अधिकतम लोगों को आर्थिक नुकसान पहुंचेगा : धनंजय

पटना (Patna), 19 नवंबर : क्रिप्टो करेंसी एक छलावा है। इसे आप "काल्पनिक करेंसी" भी कह सकते हैं। इससे अधिकतम लोगों को आर्थिक नुकसान पहुंचेगा। देश की गिरी हुई अर्थव्यवस्था को यह और अधिक धडाम से गिरा देगा। जैसे गढ्ढा करके ऊपर-ऊपर घास बिछाकर जानवरों को फंसाने की साजिश रची जाती है, वैसे ही देश के अधिकतम युवाओं को गड्ढे में फंसाने जैसी साजिश का नाम है "क्रिप्टो करेंसी"।

इसे आप एक "काल्पनिक शेयर" जैसी चीज समझ सकते हैं। साधारणतः आपने जिस किसी भी कंपनी का शेयर खरीद रखा होता है, वह कंपनी जितना लाभ में जाती है, उतना आपके शेयर का वैल्यू बढ़ता है, मतलब आपको उतना आर्थिक लाभ होता है और यदि उस कंपनी को नुकसान होता है तो आपके शेयर की कीमत भी गिरती है, मतलब आपको भी आर्थिक नुकसान होता है।

लेकिन यदि आप "क्रिप्टो करेंसी" खरीदते हैं तो इसके रेट के बढ़ने और घटने की गतिविधि किसी कंपनी के लाभ और नुकसान पर आधारित नहीं रहती है बल्कि इस बात पर आधारित रहती है कि कौन और कितने व्यक्ति आपकी ही तरह गलतफहमी में पड़कर इस काल्पनिक करेंसी को आपसे भी ज्यादा रेट में खरीदने को तैयार हो जाते हैं। 

आपने जिस रेट में क्रिप्टो करेंसी खरीदी है, अगर आपके बाद कोई दूसरा व्यक्ति उस करेंसी का उससे ज्यादा रेट देने को तैयार हो जाए तो आप लाभ में चले जायेंगे।

यह एक जुए जैसी चीज है, और सब तरफ इसकी धूम मची हुई है। हमारे देश के सबसे बड़े उद्योगपति ने "प्लान वे" में मीडिया के द्वारा अपना बयान लीक होने का हवाला दिलवाकर क्रिप्टो करेंसी का प्रचार और प्रोत्साहन किया ताकि ज्यादा से ज्यादा देशवासी जल्द से जल्द अमीर बनने की चाहत में गलतफहमी में आकर इसे खरीदने लगें, और यह जुआ चल पड़े। कुछ हद तक उनका दांव सफल भी हो रहा है। युवा जल्द से जल्द अमीर बनने के चक्कर में क्रिप्टो करेंसी खरीद रहे हैं। 

देश के अनेक शुभचिंतक एवं अर्थविद इससे चिंचित हैं, और निश्चित ही वे सरकार को आगाह भी कर रहे होंगे, पर क्या सरकार अपने सबसे करीबी उद्योगपति की ख्वाहिशों और लाभ पर ताला लगाने का जुर्रत कर सकेगी ?

आपने ट्रेन पर "तीनतशिया" खेल के बारे में सुना होगा। कुछ ठगों की टीम आपस में ही अनजान यात्री जैसा बनकर ताश से जुए खेलने लगते हैं। एक ऑर्गेनाइजर की भूमिका निभा रहा होता है, और उसके अन्य साथी अनजान यात्री की भूमिका करते हुए जुए में बार-बार जीतने लगते हैं। यह सब देखकर कुछ असली यात्रियों का भी मन तुरंत भर में लाभ कमाने के लिए मचल उठता है, और जैसे ही वे खेलने में रूचि दिखाते हैं तो बस असली ठगी का खेल शुरू हो जाता है। असली यात्रियों को एक-दो बार जिताकर चार-पांच बार हरा दिया जाता है और इस प्रकार उस बेचारे के सारे पैसे ऐंठ लिए जाते हैं। लुट जाने के बाद वह असली यात्री न कुछ कहने लायक रह जाता है और न कुछ करने के लायक। लोग बोलते हैं कि तुम्हें किसने कहा था उस खेल को खेलने के लिए। खुद ही गए थे तो खुद ही भुगतो। 

तो देश में अभी "क्रिप्टो करेंसी" का "तीनतशिया" खेल शुरू हो गया है। निश्चित ही इसे संचालित करने वालों में कुछ बड़े उद्योगपतियों का ही हाथ होगा। एक बड़े उद्योगपति ने इसके प्रचार का प्रयास किया तो उनका चेहरा सामने आ गया, बाकी इसके पीछे कितने उद्योगपति और कितने राजनीतिज्ञ हैं, यह तो वक्त ही बताएगा।

गोवा एवं कुछ अन्य बड़े शहरों में कैसिनो में जुआ खेलने जैसी बातें आपने सुनी होगी। कई फिल्मों में भी कैसिनो में जुए में बेइमानी के तौर-तरीकों को दिखाया गया है। यह क्रिप्टो करेंसी उन सबका ही मॉडर्न और डिजिटल फॉर्मेट है। 

क्रिप्टो करेंसी के दुष्प्रभाव को अच्छी तरह से समझने के लिए मनुष्य एवं समाज के आपसी आर्थिक संतुलनों की बारीकियों को समझना भी जरूरी है। 

प्रकृति ने हमें ऐसी परिस्थितियां दी हैं कि हर मनुष्य को जीविकोपार्जन के लिए श्रम करना पड़ता है। श्रम से धन (अन्न) प्राप्त होता है। तब जाकर वह अपना पेट भर पाता है। साथ ही, शरीर भी स्वस्थ रहता है।

अब यहां आप प्रकृति का भी एक समीकरण समझ लीजिए। आप पैसा कमाने के उद्देश्य से श्रम करें या शरीर को स्वस्थ रखने के उद्देश्य से, अगर श्रम एक खास दिशा में की जाए तो दोनों ही साध्य (उद्देश्य) प्राप्त होते हैं, भले ही आपका उद्देश्य सिर्फ एक को पाना रहा हो, पर प्राप्त दोनों ही होता है - पैसा और स्वास्थ्य।

आजकल ज्यादातर लोग सिर्फ पैसे कमाने के उद्देश्य से ही श्रम कर रहे हैं। पैसे कमाने को लेकर उनकी भावना ऐसी रहती है कि जैसे अगर पैसे कमाने की जरूरत नहीं होती, मतलब अगर पहले से ही पर्याप्त पैसे होते तो वे श्रम ही न करते। आलसी बन जाते। वे सोचते हैं कि जल्दी-जल्दी ज्यादा से ज्यादा पैसे कमा लिए जाएं ताकि फिर आराम किया जा सके।

पर हकीकत यह है कि वे कुछ लोग जिनके पास पहले से ही पर्याप्त पैसे हैं, जिन्हें पैसे के लिए कमाने की जरूरत नहीं है। वे अपना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए कार्य (श्रम) कर रहे हैं। वे जानते हैं कि स्वस्थ शरीर के लिए श्रम जरूरी है, और अगर खुद को इंगेज रखने के लिए जिम के अतिरिक्त किसी संस्था या कम्पनी में कार्य ज्वाइन कर लिया जाए तो स्वास्थ्य की प्राप्ति के साथ-साथ आपको आर्थिक लाभ भी मिलता है।

और यहीं पर एक सामाजिक समीकरण भी प्रभाव में आ जाता है, और वह यह है कि अगर आप लोगों की मदद के उद्देश्य से कोई ऑर्गेनाइज्ड काम करते हैं तो आपको आर्थिक लाभ भी पहुंचता रहता है, और अगर आप सिर्फ अपने आर्थिक लाभ के उद्देश्य से काम करते हैं तो भी समाज के कई लोगों को मदद एवं लाभ प्राप्त होता रहता है।

उदाहरणस्वरूप, मान लीजिए कि एक आदमी कमाने के उद्देश्य से एक किराना दुकान खोलता है। निश्चित ही, वह प्रयास करेगा कि वह ऐसी जगह दुकान खोले जहां आस पास में अन्य किराना दुकान न हो। इससे आस पास के अधिकतर ग्राहक उसी के दुकान पर आयेंगे और वह ज्यादा कमा सकेगा। दुकानदारी से उस व्यक्ति को लाभ भी मिलता है और इस प्रकार वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाता है। पर साथ ही, उसके कार्यों से अनजाने में एक अन्य भी उद्देश्य की प्राप्ति होती है कि उसके कारण आस-पास के अनेक लोगों को करीब में ही किराना का सामान उपलब्ध हो जाता है, उन्हें इसके लिए अब दूर नहीं जाना पड़ता है।

इसी कार्य को एक अन्य नजरिए से भी देखा जा सकता है कि बाजार से दूर बसा एक मुहल्ला या कॉलोनी है जहां आस पास कोई किराना दुकान नहीं है। वहां के लोगों को सामान खरीदने दूर जाना पड़ता है। इस परिस्थिति को महसूस कर उस मुहल्ले का कोई सज्जन व्यक्ति सेवा के उद्देश्य से मुहल्ले में एक किराना दुकान खोल लेता है ताकि मुहल्लेवासियों की परेशानी कम हो। हालांकि दुकान सेवा के उद्देश्य से खोला गया है, पर सेवा को लगातार जारी रखने के लिए दुकानदार को लाभ लेना ही पड़ेगा ताकि उसका एवं उसके परिवार का भरण-पोषण चलता रहे ताकि वह सेवाएं देता रह पाए। इस सोच के साथ यह जरूर हो सकता है कि वह दुकानदार रेट ऑफ प्रॉफिट कम ले। पर कई बार ऐसा भी हो सकता है कि उसका कुल लाभ पहले वाले ऑप्शन के दुकानदार से ज्यादा भी हो जाए।

खैर, इन दोनों विकल्पों में अलग-अलग उद्देश्य होते हुए भी कार्य एक ही हो रहा है। हालांकि दोनों विकल्पों के व्यक्तियों की भावनाओं के अनुसार उसमें कुछ गुणात्मक अंतर जरूर आ जाते हैं। 

जो व्यक्ति सिर्फ आर्थिक लाभ के उद्देश्य से कार्य कर रहा होता है, उस पर मानसिक दवाब बहुत ज्यादा रहता है। कभी अगर नुकसान हो जाए तो वह परेशान-परेशान हो जाता है। किंतु जो व्यक्ति सेवा के भाव से कार्य करते हुए आर्थिक लाभ पाता रहता है, उस पर मानसिक दवाब न के बराबर रहता है। वह ज्यादा खुश भी रहता है। नुकसान होने की परिस्थिति में भी वह व्यग्र नहीं होता।

कुछ अनुभवी लोगों को इन दोनों ही उद्देश्यों की जानकारी एवं समझ होती है, और वे समस्त कार्यों को करते हुए साक्षी भाव से सबकुछ देखते हुए रह पाते हैं।

इसी तरह मान लीजिए कि कोई व्यक्ति कमाने के उद्देश्य से कोचिंग, स्कूल या कॉलेज खोल ले अथवा समाज की सेवा के उद्देश्य से ऐसा कार्य करे -- दोनों ही परिस्थितियों में एक ही प्रकार के कार्य से दोनों ही साध्यों की प्राप्ति हो रही है - एक तो संस्था चलाने वाले व्यक्ति को आर्थिक लाभ पहुंच रहा है, दूसरा समाज के बच्चे वहां पढ़कर लाभान्वित हो रहे हैं। अगर वहां शिक्षा संस्थान न होता, तो उन बच्चों को कहीं अन्य जगह ये अवसर ढूंढना पड़ता। 

इसी प्रकार मान लीजिए कि कोई व्यक्ति कमाने के उद्देश्य से कंट्रक्टरी का कार्य कर रहा हो या पेट्रोल पम्प चला रहा हो अथवा लोगों को सहूलियतें पहुंचाने के उद्देश्य से ऐसा कर रहा हो - इन दोनों में से किसी भी एक उद्देश्य से कार्य करने से दोनों ही उद्देश्य स्वतः सध जाते हैं। 

इस सामाजिक समीकरण को आप व्यक्ति एवं समाज का परस्पर संतुलन भी कह सकते हैं। हालांकि ज्यादातर लोग सिर्फ अपने लाभ के उद्देश्य से ही कोई कार्य या व्यवसाय करते हैं। फिर भी समाज का कार्य स्वतः फलित होता रहता है, और अच्छा है कि ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं है कि उनके कार्य से पड़ोस एवं समाज के अन्य लोगों को भी लाभ मिल रहा है, वरना हमारे समाज में तो ज्यादातर लोगों में ईर्ष्या एवं प्रतिस्पर्धा की भावनाएं बहुत ही बलवती हैं। वे अन्य लोगों को लाभान्वित होने से रोकने के लिए खुद का लाभ कुर्बान भी कर सकते हैं।

सरकारी नौकरी की ही बात करें तो एक व्यक्ति रेलवे में ड्राइवर, गार्ड या इंजीनियर इसलिए बनता है कि वह कमाकर अपना एवं अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके, किंतु साथ ही साथ, अनेक रेल यात्रियों को उसकी सेवा का लाभ मिलता है। यात्री एक जगह से दूसरे जगह तक जा पाते हैं। 
बहुत कम इंजीनियर ऐसे होते हैं जो सेवा के उद्देश्य से यह सोचकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं कि वे सुपर क्लास के इंजीनियर बनकर कुछ ऐसे आविष्कार करेंगे जिससे आम लोगों के जीवन में सहूलियतें पहुंचें।

प्रकृति एवं समाज का यह खेल, मेल और संतुलन लम्बे समय से इसी प्रकार परस्पर जारी है।

किंतु यह क्रिप्टो करेंसी व्यक्ति एवं समाज के परस्पर संतुलन को बिगाड़कर रख देगी। समाज और देश को यह सबसे बड़ा नुकसान होगा।

इस काल्पनिक क्रिप्टो करेंसी में कुछ समय के लिए किसी या कुछ व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से कुछ लाभ होता हुआ जरूर दिख सकता है, पर इसके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से कहीं कोई सामाजिक लाभ या सेवा का कार्य क्रियान्वित नहीं होता रहता है। समाज और देश को यह सबसे बड़ा नुकसान होगा कि इस सिक्के के सिर्फ एक ही पहलू हैं - अपना लाभ। इसका दूसरा पहलू गायब है। इसलिए मैं इसके लिए बार-बार "काल्पनिक" शब्द का प्रयोग कर रहा हूं।

यह काल्पनिक क्रिप्टो करेंसी सामान्य युवाओं को कुछ उसी तरह उलझा लेगी जैसा कि कंप्यूटर के एक गेम "पब जी" (PubG) के बारे में आपलोगों ने सुना होगा। पर अंत में इसका परिणाम Pub G से भी ज्यादा भयावह होगा।

क्रिप्टो करेंसी में आप एक खास मूल्य भुगतान करके डिजीटली कुछ करेंसी खरीदते हैं। आपने जो मूल्य भुगतान किया है, उसका संचालक क्या उपयोग करते हैं, इससे आपको कोई खास लेना-देना नहीं रखना है। आपको असली लेना-देना सिर्फ इस बात से रखना है कि आपकी ही तरह भ्रमित होकर लाभ कमाने के चक्कर में कौन अन्य मुल्ला इस जाल में फंसा, और अब वह उस करेंसी का आपसे भी ज्यादा मूल्य देने को तैयार हो गया। जब तक पागलपन का यह सिलसिला चलता रहेगा तब तक क्रिप्टो करेंसी का मूल्य बढ़ता रहेगा। कुछ बुद्धिमान लोग करेंसी खरीदने के बाद उसका मूल्य बढ़ते ही बढ़ी हुई राशि निकालकर क्रिप्टो करेंसी के खेल से हाथ जोड़ लेंगे और लाभ कमाकर निकल लेंगे, वे तो लाभान्वित हो जाएंगे। पर जो लोग और ज्यादा ... और ज्यादा लाभ के नशे में पड़ जायेंगे, उनका सारा माल आने वाले समय में डूब जायेगा। 

कुल मिलाकर, बात इतनी है कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में अगर सरकार इस खेल को जारी रखने की अनुमति देगी तो करोड़ों भोले-भाले देशवासी इस जाल में फंसेंगे। शुरूआत वाले कुछ लोग तो लाभ कमा भी लेंगे, पर जितने लोग लाभ कमाएंगे, उनसे कई गुना ज्यादा लोगों को नुकसान का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि इस खेल में एक व्यक्ति का लाभ अन्य व्यक्तियों के नुकसान की नींव पर खड़ा होगा, किसी कम्पनी या संस्था के लाभ पर नहीं।

हमलोगों को भी कॉलेज लाइफ के दौरान छोटे लेवल पर इससे मिलते-जुलते एक नॉन-डिजीटल खेल से जुड़ने का अवसर मिला, उस खेल का नाम था - भारतीय जीवन धारा। यूपी के देवरिया से शुरू हुए इस खेल में बिहार, झारखंड, बंगाल सहित कई राज्यों के युवा जुड़े। सबको 1000 रूपया देकर इसमें सदस्य बनना पड़ता था। फिर 3 सदस्य जोड़ने पड़ते थे। तब शुरू होता लाभ प्राप्त होने का खेल। पर 1 व्यक्ति और उसके सीनियर्स के लाभ के लिए 3 की कुर्बानियां देनी पड़ती थी, 3 व्यक्तियों के लाभ के 9 की कुर्बानियां और 9 के लाभ के लिए 27 की कुर्बानियां। इसी प्रकार यह क्रम बढ़ता जाता था। 

भारतीय जीवन धारा के उस खेल में 1000 रूपया लगाकर हमें तो काफी लाभ हुआ। हमारे कई सीनियर्स को भी काफी लाभ पहुंचा। पर खेल का सिस्टम ही कुछ ऐसा था कि सीनियर सदस्यों की तुलना में जूनियर सदस्यों की संख्या कई गुना ज्यादा होती थी, एवं जूनियर सदस्यों द्वारा दिए गए पैसे ही सीनियर सदस्यों को लाभ के तौर पर मिलते थे। उसमें से हर बार कुछ हिस्सा संचालक संस्था को भी जाता था। काफी विस्तार के बाद भारतीय जीवन धारा का सैचुरेशन होने लगा, सिस्टम ध्वस्त होने लगा, जुए के उस खेल में भी चोरियां होने लगीं, अधिक विस्तार के बाद सरकार एवं प्रशासन के कान खड़े हो गए थे। सरकार का फैसला हुआ कि बिना किसी प्रोडक्शन के बस यूं ही सिर्फ पैसों के लेन-देन का चेन नहीं चल सकता।

फाइनल रिजल्ट यह था कि हजारों लोगों को लाभ हुआ, और लाखों लोगों को नुकसान हुआ।

क्रिप्टो करेंसी का भी ऐसा ही हाल होगा। चूंकि यह खेल World-wide चलेगा तो पहले इसे पूरी तरह पॉपुलर होने में अभी 3-4 साल और लगेंगे, फिर इसकी पोल खुलने में अगला 4-5 साल और लग जायेंगे। कुल मिलाकर 7 से 9 साल में फाइनल रिजल्ट यह होगा कि लाखों लोगों को लाभ होगा और करोड़ों लोगों को नुकसान। चूंकि जमाना डिजीटल है तो समय का यह अंतराल और कम भी हो सकता है।

इससे करोड़ों लोगों को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ बड़े स्तर पर मानसिक घात भी लगेगा। कुछ सालों तक युवाओं का बड़ा झुंड इसमें उलझ जाने के कारण उनके द्वारा अन्य प्रोडक्शन एवं अन्य सेवाओं की सम्भावनाएं कम जायेगी। इससे समाज और देश के वास्तविक विकास को भी नुकसान पहुंचेगा।

असली लाभ सिर्फ उन संचालक कंपनियों को मिलेगा जो क्रिप्टो करेंसी के खेल में आम लोगों द्वारा लगाए गए पैसों का बिना कोई ब्याज दिए इस्तेमाल करेगी और मुनाफा कमायेगी। सबकुछ ठीक रहा तो गाड़ी सैचुरेशन प्वाइंट तक बढ़ती रहेगी, और अगर जरूरत पड़ी तो सही मौका देखकर क्रिप्टो करेंसी के संचालक अचानक से सरकार द्वारा देश में इस खेल को अवैध घोषित करवाकर सारा पैसा लेकर चंपत हो जायेंगे।

जुए के इस खेल में शुरू में जो लोग कुछ कमाकर निकल लिए, उनके लिए यह व्यक्तिगत रूप से लाभदायक हो सकता है। पर जो लोग इससे देर में या अंत में जुड़ेंगे या फिर जिन्हें इसकी लत लग जायेगी, उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

क्रिप्टो करेंसी एक काल्पनिक करेंसी है, इससे हमारा देश एक बड़ा जुआ घर बन जायेगा। विशेषज्ञों द्वारा इन नुकसानों की जानकारियां दिए जाने के बाद भी ज्यादा संभावना इसी बात की है कि भारत में यह खेल जारी रहेगा, क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री के सबसे करीबी एवं देश के सबसे बड़े उद्योगपति की इसमें रूचि है।

एक खबर मैंने पढ़ा, जिसमें केन्द्र सरकार का पक्ष था कि अगर क्रिप्टो करेंसी का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए न हो सके तो इसे देश में लागू किया जा सकता है। आर्थिक पहलुओं को केवल मात्र आतंकवाद के नजरिए से परखने की सरकार की सोच से साफ जाहिर होता है कि सरकार तमाम विशेषज्ञों की राय को टाल-मटोलकर घूमा-फिराकर दरकिनार कर देगी, और येन-केन-प्रकारेण क्रिप्टो करेंसी के खेल को देश में जारी कर देगी। 

आर्थिक पहलुओं में आतंकवाद को ध्यान रखना अच्छी बात है, पर इसके साथ ही देश, गांव, समाज एवं समस्त देशवासियों के लाभ को भी देखना जरूरी है।

यहां सरकार से दो प्रश्न जायज हैं :

1. अगर सरकार इस बात से संतुष्ट हो जाए कि बैंक चोरी के पैसे का इस्तेमाल आतंकवाद में नहीं हो रहा है तो क्या ऐसी चोरियों की अनुमति दी जा सकती है ? 

2. मैं दावे के साथ सरकार को बता सकता हूं कि रेलवे प्लेटफॉर्म एवं बस स्टैंड इत्यादि में हजार-पांच हजार की पॉकेटमारी करने वाले लोग उन पैसों का इस्तेमाल आतंकवाद में नहीं करते हैं, तो क्या ऐसे कार्यों को सरकार द्वारा जायज ठहराया जा सकता है ?

"आतंकवाद में पैसे का इस्तेमाल नहीं हो रहा है" - केवल इस नाम पर जुए एवं साजिश के एक बड़े खेल को जायज नहीं ठहराया जा सकता है।

कुछ समय पहले टेलीविजन पर एक शो आता था जिसका नाम था - "बकरी बनाया" मतलब 'उल्लू बनाया"। ऐसे शो पहले विदेशों के टेलीविजन में आते थे। फिर अपने देश में भी आए। तो यह क्रिप्टो करेंसी भी बड़े लेवल पर आम लोगों को "बकरी बनाने" की तैयारी है। यह खेल भी पहले विदेशों से शुरू हुआ, और अब यह हमारे देश के सबसे बड़े उद्योगपति को पसंद आ चुका खेल है।



(यह आलेख शिक्षाविद एवं स्वतंत्र पत्रकार धनंजय कुमार सिन्हा द्वारा लिखा गया है। हैं। इसमें व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)




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