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नमस्तुभ्यं! न्यूज़ 18 की एंकर ज़ीनत, जीवन में उतार-चढ़ाव के बाद हासिल किया मुकाम

 मनुस्मृति (3/56) में वर्णित है :

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।

अर्थात :
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, देवता वहाँ निवास करते हैं.
और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नहीं होता है, वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च के उपलक्ष्य में gidhaur.com आपको रूबरू करवाएगा ऐसी नारी शक्तियों से, जिन्होनें सामाजिक तानेबानों से ऊपर उठकर परिवर्तन के साथ विभिन्न क्षेत्रों में नए मिसाल कायम किये. 8 फ़रवरी से 8 मार्च तक आप प्रतिदिन gidhaur.com के माध्यम से अपने आसपास की ऐसी नारी शक्तियों के बारे में जान पाएंगे जिनकी उपलब्धियों पर आपको गर्व महसूस होगा. इस दौरान आप gidhaur.com के एडिटर-इन-चीफ सुशान्त साईं सुन्दरम के द्वारा लिखे गए 28 नारी शक्तियों के बारे में पढ़ेंगे. हमें पूरी उम्मीद है कि आपको हमारी यह पहल पसंद आयेगी. इस विशेष पहल का नाम नमस्तुभ्यं! रखा गया है, जो कि समस्त नारी शक्ति को समर्पित है. नमस्तुभ्यं का अर्थ है - नमस्कार. और हम इन नारी शक्तियों को उनकी उपलब्धियों और योगदान के लिए नमस्कार करते हैं.

अगर आपके आसपास भी कोई ऐसी प्रेरक महिला हैं, जिनके बारे में लिखा जाना चाहिए तो आप ई-मेल के माध्यम से editor@gidhaur.com पर संपर्क कर सकते हैं. इसके साथ आपके सुझाव भी सहर्ष आमंत्रित हैं.

9  फरवरी 2021 | नमस्तुभ्यं!
सुशान्त साईं सुन्दरम
Editor-in-Chief, gidhaur.com
आज आप जानेंगे एक ऐसी न्यूज़ एंकर के बारे में जो अपनी भाषा शैली, लय और बेबाक स्वभाव के कारण पहचानी जाती हैं. ज़ीनत सिद्दीकी वर्तमान में न्यूज़ 18 यूपी-उत्तराखंड की न्यूज़ रिपोर्टर हैं. मूल रूप से बिहार के दरभंगा की रहने वाली ज़ीनत ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. उनका कहना है कि वे न तो खुद को मुस्लिम समझती हैं, न हिन्दू समझती हैं, वे खुद को एक इंसान समझती हैं. उनका मानना है ह्यूमैनिटी ही जन्नत है. पढ़िए gidhaur.com के एडिटर-इन-चीफ सुशान्त साईं सुन्दरम के साथ हुई उनकी बातचीत के कुछ अंश.
सुशान्त: जर्नलिज्म में आने का शौक कैसे हुआ? कैसे लगा कि आना चाहिए इसमें?
ज़ीनत :
हम बिहार से हैं और हमने गरीबी भी देखी है. सोसाइटी में मैं डिस्क्रिमिनेशन बहुत देखती थी. थोड़े से संपन्न लोग कमजोर लोगों को कैसे दबाते थे. चाहे पानी का टैंकर आये, वहां पर पानी भरने में, बाजार जाने में, या सड़कों पर चलने में, या गली-मुहल्लों के आगे बड़ा सा चबूतरा बना लेने में. ये छोटी-छोटी चीजें हैं. और मुझे लगता था कि ये नहीं होना चाहिए. कहीं पर भी कुछ हो रहा है तो मुझे लगता था कि मुझे तो नहीं झेलना. और जैसे फीमेल्स को तो ये नहीं करना, वो नहीं करना, वो नहीं करना. तो व्हाई रूल्स? या तो सबके लिए नियम हो, या तो किसी के लिए नहीं हो. और क्यूंकि मैं मदरसे भी पढने जाती थी तो वहां पर भी हमें यही सिखाया जाता था. कुरान शरीफ में जो है उसी हिसाब से. तो मुझे लगता था बाकि लोग क्यूँ ऐसा बोलते हैं? क्यूँ ऐसा करते हैं? गलत करते हैं. सिर्फ दूसरों को दबाने के लिए. सो आई थॉट. मुझे लगता है कि डॉक्टर? नहीं, मुझे नहीं बनना. लॉयर? नहीं मुझे नहीं बनना. टीचर? नो. नो. नो. मेरा उस टाइम पे 2008 में मेरा 87 परसेंट था और बेस्ट पोर्शन 90 परसेंट कुछ जा रहा था तो मेरा जेबीटी में भी हो गया था. लेकिन मुझे लगा कि मुझे नहीं करना. फिर मेरा इटैलियन लैंग्वेज में हो गया था यूनिवर्सिटी से. लेकिन मेरा था कि नहीं करना, वो बाद में भी सीख लुंगी. बाद में मेरा जर्नलिज्म में हुआ तो मुझे लगा यार मुझे यही करना है. ये ही एक ऐसी जॉब है जिसमें मैं सबकुछ कर सकती हूँ. तो इसलिए फिर ऐसे आना हुआ.
सुशान्त : टीनएज ग्रुप के और यूथ्स हैं जो जर्नलिज्म में आना चाहते हैं, उनके लिए कोई टिप्स? ये ऐसा फील्ड है जिसमें बहुत कुछ झेलना पड़ता है, बहुत कुछ सुनना पड़ता है और निष्पक्षता भी बनाये रखनी पड़ती है. तो बताएं.
ज़ीनत :
मैं ये समझती हूँ कि प्रोफेशन कोई भी हो, आपका ज़मीर ज़िन्दा रहना बहुत जरुरी है. हम प्रतिभा बेचते हैं, ज़मीर थोड़े ही. तो ये डिसाइड कर लीजिये कि आपको क्या करना है. और दूसरी बात ये कि खूब पढ़िए. दो किताबें पढ़ के उलटी करना तो कोई नॉलेज नहीं है. खूब पढ़ना. और अगर आपके अन्दर संवेदनशीलता है, तो उसे जिन्दा रखिये. तो मुझे लगता है कि आप बहुत पढ़िए, बहुत लिखिए, खुलकर लिखिए, संवेदनशील रहिये. और यही आपको आगे... हाँ हार्ड वर्क से पीछे नहीं हटना है, क्यूंकि देयर'ज़ नो शोर्टकट. क्यूंकि जो सीढ़ियाँ आपको ऊपर ले जाएँगी न जम्प कर के, वो आपको नीचे भी ले आयेंगी. और सीढ़ियों पर जम्प नहीं की जाती.नहीं करनी चाहिए. तो ये मेंटेन करना पड़ेगा थोड़ा सा.
सुशान्त : आप जर्नलिस्ट हैं, एक पब्लिक फिगर हैं, तो धीरे-धीरे आपने इस स्टेज को हैबिचुएट कर लिया कि लोग कई तरह की बातें बोलते हैं. लेकिन शुरुआत में जब लोग इस तरह की बातें बोलते थे, जैसे आपके सोशल अकाउंट के बहुत सारे पुराने पोस्ट्स मैनें देखे हैं जिनमें वल्गर कमेंट्स और रिलीजियस बेस पर, तो उस टाइम में आप कैसे टैकल करती थीं?
ज़ीनत :
उसमें मैं बताती हूँ. जब बुरी चीजें आपके पास आती हैं, बुरे कमेंट्स आते हैं, ये किसी भी रूप में, किसी भी वे. तो आप सारे पॉजिटिव चीजें अपने पास फील करना शुरू कीजिये. उसमें पॉजिटिव एक्स्पेक्ट्स ढूंढिए. तो सेम. मान लो कि हिन्दू-मुस्लिम बहुत चलता है आजकल. फैशन हो गया है. गाली देना फैशन हो गया है, रिलिजियन के बेस पे. तो अगर कोई कमेन्ट कर देता है, जिसे मेरे नाम से मेरे ओनेस्टी पर डाउट आ जाता है. तो मैं अपने उन फ्रेंड्स को याद करती हूँ, जो मेरे वर्स्ट टाइम में भी मेरे साथ थे, या जो रमजान में भी मेरे लिए इफ्तारी लाये या जो मेरी तबियत ख़राब होने पर खड़े रहते हैं. और वे मुस्लिम नहीं हैं. तो मैं उनके लिए हूँ न. मैं ये नहीं बोल रही मुस्लिम या गैर मुस्लिम. लेकिन जो मेरे साथ ख़राब है, तो मैं उनके चक्कर में उन्हें कैसे इग्नोर कर दूँ जो अच्छे हैं!और ये दुनिया अच्छे लोगों से चल रही है, बुरे लोगों का खात्मा हो जाता है. आज नहीं तो कल. आज आप देखिये, इस महामारी ने हमें यही तो सिखाया है आपने नेचर को एग्झौस्ट किया, नेचर ने आपको. सबकुछ बैक फायर हुआ. सेम कोई अमीर, कोई गरीब, ऐसा कुछ महसूस हो रहा है क्या! आज देखो न हर किसी के लिए ये बीमारी जानलेवा ही है. हर कोई अब बराबर हो गया. मैं एक ही चीज में भरोसा करती हूँ कि अगर कोई आपको बहुत, बहुत, बहुत तकलीफ देता है न तो, कुरान भी यही कहता है, और महाभारत में वो है न पार्ट, शिशुपाल के पाप गिनते हैं कृष्ण भगवान. एक, दो, तीन, चार.... है न! और सौ होते ही उसका सर कलम हो जाता है. तो ऐसा ही होता है हमारे आसपास में लोगों के साथ भी और नेगेटिविटी के साथ भी. गाली देने वाले, या क्रिटीसाइज़ करने वाले करते रह गए, लेकिन काम कर रहे थे हम, पॉजिटिव एटीट्यूड के साथ, तो काम करते-करते आज आप लोग जानते हो. कल अल्लाह ने चाहा तो और लोग जानेंगे, परसों ऐसा भी होगा कि हम थोडा सा कुछ लिखें तो लोग उसे फॉलो करें या अपनी जिन्दगी में अप्लाई करें, उसको मानें, उसकी कद्र करें, एग्जाम्पल सेट करें. जैसे हमारे लोकेलिटी में, जहाँ मेरे मम्मी-पापा रहते हैं, वहां पर जो मुस्लिम फैमिलीज़ हैं, उनके लिए तो एग्जाम्पल हैं. जीनत के जैसे पढना-लिखना है. जीनत को देखो. तो उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ाना-लिखाना शुरू किया. स्कूल भेजा. तो रोल मॉडल बनाया. तो ऐसी मैं कम से कम पचास फैमिलीज़ को जानती हूँ. बस अल्लाह इसी तरह से मजबूत इरादों का रखे और मुझे क्या है कि शायद जो भी आगे बढ़ते हैं, पता नहीं सबका नहीं कह सकती, लालच ही नहीं है. जैसे ऐसा नहीं होना की बहुत एक्स्पेक्टेशन वाला, कि मुझे ये, ये, ये चाहिए, नहीं! जरुरत का जितना है उतना इज्जत से मिल जाये. बाकी जो भी एक्स्ट्रा आता है, वो आप इस सृष्टि को दे के चले जाओ. सिम्पल! लाइफ बहुत सिम्पल है. और इस कोरोना ने ये भी समझा दिया. जिन्दा रहने के लिए रोटी, सब्जी, चावल, दाल, हमको सबको मिल रहा. जो लग्जीरियस चीजें थी न, उसके न होने से हम परेशान हैं. क्या फर्क पड़ता है दो महीने पिज़्ज़ा नहीं खाया तो? मर थोड़े ही गए! क्या फर्क पड़ता है? मैं ईद पर अपने घर नहीं गई. मैं अकेली थी. फ्रेंड्स भी नहीं थे, कोरोना की वजह से और फैमिली का कंसर्न ले के. क्यूंकि मेरी सोसाइटी में एक पोजिटिव केस आया, वो भी एक मीडिया पर्सन थे, तो हमारी सोसाइटी सील हो गई. तो मैं अनफोर्चुनेटली अकेली थी. थोडा सा मूड ऑफ हुआ, फिर मुझे लगा कि अच्छा है न मैं नहीं गई तो फॅमिली की सेफ्टी है. तो हर दिन फेस्टिवल है. मैं एक साल के एक फेस्टिवल पर क्यूँ डिपेंड हो जाऊं? मैं जिस दिन घर जाउंगी, मेरी अम्मी पूछेंगी कि क्या खाना है? मेरे पापा पूछेंगे कि कुछ नॉन-वेज खाने का मूड है. तो मैं कहूँगी, अम्मी आप बिरयानी बहुत अच्छी बनाती हो, बना लो. और मेरी सिस्टर्स, उन्हें पता है मैं बहुत चाय के लिए एडिक्ट हूँ. तो वो चाय बनायेंगी. मस्त! और हम पार्टी करेंगे. मेरा छोटा वाला भाई बहुत चालू है. तो वो बोलेगा यार जीनत कुछ पार्टी तो दे दे! यार जीनत. ऐसे ही मेरी ज़ेब खाली करेगा. और हम शाम को मस्त पार्टी करेंगे. तो वही ईद है न, जो परिवार के साथ है. माँ-पापा के साथ है. मैं किसी फेस्टिवल पे डिपेंड नहीं हो सकती. या मैं बुरा कुछ नेगेटिव ले के नहीं चल सकती. मैं उसमें चारों तरफ से अच्छी चीजें ढूंढ लेती हूँ.
सुशान्त : जब कोई न्यूज़ ऐसा होता है जैसे कोई घटनाक्रम होते रहती है देश में तो अब न्यूज़ रिपोर्टर भी हैं तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ रिपोर्टिंग ही करनी है. वो भी इन्सान हैं और उनके दिमाग में भी कुछ न कुछ तो आता ही होगा किसी मामले को ले के उसका नेगेटिव फेज या पॉजिटिव फेज. तो उसमें निष्पक्षता कैसे बनाये रखी जा सकती है? जैसे आप इंटरनली किसी दुसरे आइडियोलॉजी वाले पार्टी या परसन को सपोर्ट कर रहे हैं तो कैसे निष्पक्षता बनी रह सकती है?
ज़ीनत :
मान लो पोलिटिकली मेरी आइडियोलॉजी कुछ और है, और पोलिटिकल जैसे मुझे किसी और के फेवर में न्यूज़ पढनी है. तो इन दिनों ऐसा हो रहा है कि मीडिया पर बहुत सरे सवाल उठ रहे हैं.मैं बताती हूँ कि जैसे मेरे साथ है, मैं न तो खुद को मुस्लिम समझती हूँ, न हिन्दू समझती हूँ. मैं एक इन्सान हूँ. मुझे कोई लालच नहीं है. लोग बोलते हैं न जन्नत! जन्नत! अरे मुझको नहीं चाहिए भैया! मैं यहीं पर अच्छा काम कर लूँ, मेरे लिए बहुत है. ह्यूमैनिटी ही जन्नत है. ठीक है. तो इसी तरह किसी भी जर्नलिस्ट का कोई भी पार्टी या आइडियोलॉजी होना नहीं चाहिए. और मैं ये दावे से कह सकती हूँ कि मेरे साथ तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है. हाँ! दूसरी बात ये जिनका है, एक्चुअली वे ऐसे ही थे, उन्हें चांस मिल गया. उनको माइक मिल गया, एंड दे आर फ्री. वो छुपा हुआ था और वे इंतजार कर रहे थे. सेकेंड पॉइंट सम पीपल आर अपोर्चुनिस्ट. जैसे उदाहरण के तौर पर कुछ लोग, जैसे आप जहाँ से हैं, हर सरकार में मंत्री. तो भाग्य! और कुछ लोग बड़े फ्लेक्सिबल होते हैं, जैसे वे किसी भी पार्टी या आइडियोलॉजी से एडजस्ट कर लेती हैं. क्यूंकि वे लोग खुद पर ही केन्द्रित होते हैं. वे अपना नुकसान नहीं झेल सकते, या उनको लाइमलाइट में रहना होता है तो ये भी कारण होते हैं. तो फिर भी मैं किसी पर कोई भी टिप्पणी नहीं करुँगी क्यूंकि मेरा कोई कद नहीं है. और हो भी जाए तो क्यूँ करुँ? क्यूंकि सबकी अपनी विचारधारा है, अपने अधिकार हैं. लेकिन जर्नलिस्ट अगर ऐसा है तो उसे नहीं होना चाहिए. और मुझे लगता है कि नहीं ही होंगे ऐसे. (मुस्कुराते हुए) मैं थोडा डिप्लोमेटिक हो रही हूँ यहाँ पर.

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सुशान्त : कुछ बहुत ही दुखद घटना हुई है और आपको न्यूज़ पढना है उस  बारे, में तो आप उसे कैसे फेस करती हैं? क्यूंकि इंटर्नली तो ये बहुत हर्ट होता होगा न उस टाइम में जब आप पढ़ते हैं.
ज़ीनत :
आपका सवाल जो है एक्सीडेंटल न्यूज़ का, तो देखिये आप एक इंसान हैं, अगर आप सेंसिबल हो, आप पेन फील करते हो तो नेचुरली कुछ न्यूज़ पढने पर, कई बार मैं खुद बहुत रोती हूँ स्क्रीन पर, रो पड़ी हूँ, और हम न पानी पी पी के. खुद को स्थिर करते हैं कि ये काम है करना है. ऐसा कर रहे होते हैं. मतलब कुछ न्यूज़ तो, मुझे याद है कि एक सेलेब्रिटी की डेथ हुई थी और मुझे सडनली बोला गया था. और उस टाइम कुछ ब्रेक चल रहा था. कहा गया इस न्यूज़ के लिए जाओ जल्दी बैठो. और मेरा था कि मेरे से नहीं होगा. जाओ करो, कौन करेगा? मैं न कर रही हूँ तो ये भी गलत है. न करना भी गलत है. तो हम इमोशन को बेचने वाली इंडस्ट्री है ये, और हमें इमोशनलेस रहना पड़ता है. समझ रहे हैं? ऐसी-ऐसी विसुअल्स आते हैं, ऐसी-ऐसी खबरें आती हैं. एक्सीडेंटल ये वो. तो एकदम से कि मैं विसुअल्स नहीं देखूंगी. तो होता है नहीं विसुअल्स देखो, तुम्हे डिस्क्राइब करना है स्क्रीन पर. और सडनली कोई विसुअल है एक्सीडेंट के और आपको विसुअल्स काट दिए, तो भाई टैग लगाओ फटाफट से, इस पे कमेंट्री करो. और आप बोलोगे देखिये लाशें बिखरी हैं, देखिये बच्चा रो रहा है. देखिये ये, देखिये वो. ये ऐसा है कि कितना कठोर होना पड़ता है. ये बहुत आसन नहीं है, किसी भी न्यूज़ एंकर के लिए. तो हम इमोशंस को बेचते हैं देखिये आंसू, देखिये ये, देखिये वो. और हम अपने आंसू रोक रहे होते हैं. सो यहाँ पर हम बहुत फाइट करते हैं. कई बार ऐसा हुआ है, ऐसी-ऐसी ख़बरें आई हैं कि पुरे दिन खाना नहीं खाया गया है. चाय तक हलक से नीचे नहीं उतरी हैं. ऐसी खबरें आती हैं. और सुबह हम फ्रेश मूड से जाते हैं, और शाम होते-होते जब हम घर आते हैं तो इतनी सारी न्यूज़ लेकर घर पे आते हैं और फिर घरवालों के साथ, ऐसा! ऐसा! ऐसा! ऐसा! तो लगता है, अरे ऑफिस छोड़ के आओ. कई बार! लेकिन अच्छा लगता है. हम काम ऐसा कर रहे हैं जिसमें खुश हैं.
सुशान्त : इतना मोटिवेशन जो आप लाती हैं, जैसे आपके सोशल मीडिया के पोस्ट में भी होते हैं. तो इतने सरे निगेटिविटी के बीच कैसे खुद को पॉजिटिव रखती हैं? रोज कई तरह के न्यूज़ होते हैं और ये होता है न की जब हम रत में सोने जाते हैं तो हमारे माइंड में वो स्टक होते रहता है न कि आज ऐसा हुआ, आज ऐसा हुआ. तो फिर कैसे उस चीज को डाइवर्ट करती हैं और पॉजिटिव कैसे रखती हैं खुद को?
ज़ीनत :
मैं इसको बड़ा ओपेनली बोलती हूँ कि मैनें अपनी पर्सनल लाइफ में बहुत वर्स्ट देखा है, बहुत वर्स्ट. गरीबी होना, या आपके पास कम कपडे होना, आपका दुसरे लोगों को नए कपडे देखना, पहनना. मैं कह सकती हूँ, जब हम स्कूल में थे छोटे. और हम चार बहने हैं, और दो भाई. छह भाई-बहन हैं. और मैं बड़ी हूँ. मेरे पापा बिलकुल पढ़े-लिखे नहीं, और मम्मी भी नहीं. तो एक मजदूर आदमी घर चलाता है, तो कैसे चलाता है, मैं समझ सकती हूँ. तो उसमें हमलोग जब त्यौहार आता था, तो हम स्कूल के यूनिफार्म प्रेस कर के पहन लेते थे. नए कपडे नहीं होते थे, और आज अगर मैं पांच साल भी कपडे नहीं खरीदूं न तो भी मेरे कपडे पुराने नहीं  होंगे. मेरे एक कपडे का नंबर शायद छह महीने बाद आयेगा. तो उसमें क्या होता है न, आई एम वैरी थैंकफुल, अल्लाह पाक सबको ऐसे रखे, भगवान सबको ऐसे रखे. तो मैनें पर्सनल लाइफ में बहुत वर्स्ट देखा है. लेकिन टाइम टू टाइम बहुत से ऐसे लोग मिले हैं जिन्होंने बहुत हेल्प किया है. मेरे पास कॉलेज के फीस नहीं थे, मम्मी ने उधार ली. मेरे पास कंप्यूटर नहीं था, मेरे सर ने मुझे पैसे दिए. जब मैं न्यूज़ एंकर बनी तो मेरे पास कपडे नहीं थे तो मेरे सर ने मुझे हेल्प की. और उन्होंने बोला, ओके, जाओ ब्लेजर बनाओ. तो मैनें दो साल तक एक ब्लैक ब्लेजर में एंकरिंग की. क्यूंकि मुझे उस टाइम में बहुत पैसे नहीं मिलते थे. क्यूंकि मैं उस टाइम इंटर्न थी और मेरे पास मेरे घर से किराया लेना बहुत बड़ी बात होती थी. तो मैं ब्लेजर कहाँ से बनवाऊँगी! तो ये भी था. और हाँ! लोगों ने बहुत इमोशंस के साथ इतना ज्यादा किया तो मुझे लगा कि मुझे न सोसाइटी को दे के जाना है. मुझे लोगों ने इतना अच्छा दिया है. वर्स्ट टाइम पे. तो नेगेटिव होने का मुझे न हक नहीं है. क्यूंकि बहुत से लोग मुझे देखकर इंस्पायर हो रहे हैं. सो मुझे उनके लिए तो अपने आप को पॉजिटिव रखना ही रखना है. आज ठीक है. आज मैं शायद उस प्लेटफ़ॉर्म पे नहीं हूँ जहाँ मैं अपनी बातें बताऊँ तो उस लेवल पे सुनी जाएँ जिस लेवल पे इनको होना चाहिए. शायद प्लेटफ़ॉर्म छोटा हो सकता है. लेकिन मुझे पता है वो दिन भी आएगा जब मैं यही सारी बातें बताउंगी और इंशाल्लाह पेरेंट्स भी सामने होंगे, वो स्ट्रगल भी सामने होगा और यकीनन वो लोग भी होंगे, जिन्होंने बहुत सारे धोखे किये, या बहुत डीमोरलाईज किया, निगेटिविटी भरी. लेकिन मैं खुश हूँ. क्यूंकि अगर मुझे देख के कोई एक इन्सान भी खुश है न, आई एम सक्सेसफुल. मेरे लाइफ का मोटिव पूरा हुआ. क्यूंकि दुनिया में हम सभी आये हैं. बड़े होते हैं, शादी होती है, बच्चे होते हैं, फिर उनकी शादी होती है, बच्चे होते हैं, हम बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं. तो ऐसे तो बहुत सारे लोग आये और चले जायेंगे. तो हम कैसे स्पेशल हैं? तो अगर आप स्पेशल बनना चाहते हैं, तो आपको कुछ बहुत स्पेशल करना होगा. कुछ बहुत एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी आपको करना होगा.
सुशान्त : फील्ड वर्क भी किया है आपने जर्नलिज्म में?
ज़ीनत :
बहुत ज्यादा. बहुत ज्यादा. शुरुआत में भी और काफी किया है. मैंने 2017 तक किया है. उसके बाद फिर स्टूडियो में किया. पहले लोकल, रिजनल्स, अख़बारों में, इधर-उधर, बहुत धक्के खाए हैं मैंने. बहुत धक्के खाए हैं! मुझे याद है, एक बार मैं डिप्रेशन में थी. मेरा जे.एन.यू.का एंट्रेंस क्लियर नहीं हुआ था. मास्टर्स का. और जे.एन.यू. के बाहर बैठकर मैं कितना रोई थी. और उसके बाद फिर मैनें जामिया का ट्राई किया, और मेरा जामिया का भी क्लियर नहीं  हुआ. और वहां पर भी उसके बाहर भी बैठकर मैं बहुत रोई थी. तो पता नहीं कहाँ, कुछ पॉइंट्स में या कैसे रह जाया करता था, वो मुझे समझ नहीं आया. और फिर मुझे लगा कि ये एग्ज़ाम्स मेरे डेस्टिनी तो नहीं तय कर सकते. और मैं बड़ी हूँ, मेरे भाई-बहन हैं, मुझे अर्ण भी करना है. मुझे जल्द से जल्द करना है. लेकिन अल्लाह पाक आपकी नियत देखते हैं न. तो हो गया.
सुशान्त : न्यूज़ 18 में कब से हैं?
ज़ीनत :
4 जून 2021 को छह साल हो जायेंगे अब. जब मैं ज्वाइन की तो ये ईटीवी नेटवर्क था. लेकिन बाद में ये 2018 में हुआ है. हालाँकि इनकी डील पहले हो चुकी थी. लेकिन 2017 में ये हरियाणा-पंजाब चेंज हुआ. 2018 में ये पूरा नेटवर्क चेंज हुआ था. तो ओवरऑल मुझे छह साल हो जायेंगे इस नेटवर्क में. 
सुशान्त : फैमिली सपोर्ट कैसे मिला? आपने बताया कि आप एक पिछड़े फैमिली से आप बीलोंग कीं, फिर होता है कि पेरेंट्स अवेयर नहीं होते. कहते हैं पढ़े-लिखे माँ-बाप हों तो वो बच्चों को भी और ज्यादा अच्छी तालीम देना चाहते हैं. लेकिन आपके साथ ये मोटिवेशन था कि आपने इस चीज को फेस किया तो आपको वो इंस्पिरेशन मिला, लेकिन आपकी फैमिली ने कैसे सपोर्ट किया?
ज़ीनत : 
एक जो आपने पॉइंट बोला कि पढ़े-लिखे माँ-बाप हों तो ज्यादा सपोर्ट करते हैं, ये एक माइंड सेट है. मुझे लगता है ये बहुत गलत है. तुम्हें पता है, जो माएं पढ़ी-लिखी नहीं होती न, जो बाबूजी पढ़े-लिखे नहीं होते न, वो अपने बच्चों के बस्ते को बड़े प्यार से सजाते हैं. कॉपी-किताबें न बड़े प्यार से लगाते हैं. वो देखते हैं कि बच्चा क्या लिख रहा है? उसे लिखना आ रहा है कि नहीं आ रहा है. और उसे सजा के इतना बड़ा सा काला टिका लगा के, भले ही सरकारी स्कूल में भेज रहे हैं, पर भेजते हैं. तो अगर आपके माँ-बाप आपको बहुत प्यार करते हैं न, तो ये मैटर नहीं करता वो अमीर हैं, गरीब हैं, पढ़े-लिखे हैं या अनपढ़ हैं. वो आपके सपनों में अपने सपने पूरे करते हैं. तो बस आपको भी चाहिए कि जब माँ-बाप भरोसा करें तो आप वैसा परफॉर्म करो. मैं हमेशा प्राइज विनर स्टूडेंट रही. कभी फर्स्ट, सेकेंड, थर्ड! कुछ न कुछ आना. मैं खेल में बहुत अच्छी थी. हमारे स्कूल में सिर्फ एक बच्चा साल में चार स्पोर्ट्स में भाग के सकता था और मैं चारों  में प्राइज जीतती थी. और जब सिचुएशंस ख़राब हुई तो प्राइवेट स्कूल से निकाल के गवर्नमेंट स्कूल  में भी डाला मम्मी-पापा ने. और फिर गवर्नमेंट में ही सारी पढ़ाई हुई फिफ्थ से ट्वेल्थ तक की.और कॉलेज तो चलो अलग मसला है. तो स्कालरशिप मिलना और सारी चीजें. बस ऐसे होता था, अम्मी ये कर लेने दो. अम्मी इसको करने से न ये फायदा होगा. मुझे न ये करना है, ये करना है. तो पापा कई बार राजी नहीं होते थे. फिर अम्मी बेचारी दो-चार दिन से पापा को कन्विंस करने में लगती थी. या इस टाइप से. लेकिन आप जब आउटपुट देते हो न तो माँ बाप का भरोसा खुद आप जीतते हो. हमें पैसों से ज्यादा न मानसिक सपोर्ट बहुत मैटर करता है. जैसे दोस्त बोलता है न कि तू कर लेगा. तेरा दोस्त तेरे साथ है. अरे तू चल न यार. इस टाइप से. तो माँ-बाप इतना भी बोल दें न कि अरे नहीं, नहीं मेरा बच्चा करेगा. तो बच्चा कर लेता है.

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सुशान्त : खाली टाइम में आप क्या करती हैं?
ज़ीनत :
मुझे लगता है कि एक जर्नलिस्ट कभी फ्री हो ही नहीं सकता, क्यूंकि उसका दिमाग कभी सोता ही नहीं. मैं कुछ न कुछ पढ़ते रहना, और नहीं तो मैं बहुत सारे बहाने ढूंढती हूँ, यार मैं थक गई हूँ, मैं खुद ही बोलती हूँ, मैं चाय बना लेती हूँ. तो मैं ऐसे ही यही सब करते रहती हूँ.
सुशान्त : चाय से एक सवाल है, दिनभर में कितनी बार आप चाय पीती हैं?
ज़ीनत : 
मुझे मना किया गया है. क्यूंकि वेट गेन होता है चाय से न. वो एसिड बन जाता है बॉडी में. फिर भी चार बार होता है. और मेरा कप भी इतना बड़ा होता है. (हाथों के इशारे से बताते हुए)
सुशान्त : कॉफ़ी मग में चाय पीती हैं आप?
ज़ीनत :
(सर हिलाते हुए) मेरे से छोटे कप में नहीं पी जाएगी. मुझे गोली मार दो, आई एम अग्री, लेकिन मुझे छोटे कप में चाय नहीं चाहिए. और अगर मुझे किसी ने छोटे कप में चाय... सिचुएशन में ठीक है. जैसे कहीं मैं बाहर हूँ, या किसी ने वैसे दिया तो मैं पी लुंगी, लेकिन मुझे पसंद नहीं आयेगा वो. और अगर मुझे छोटे कप में चाय मिल रही है तो मेरी चाय की फीलिंग मर जाती है. लगता है, ओ माय गॉड ये इन्सल्ट है मुझे नहीं पीनी.
सुशान्त : आगे क्या कुछ करना है?
ज़ीनत :
कहीं पर जीवन में, मैं बहुत बड़े वायदे नहीं करुँगी. क्यूंकि इस्लाम के अनुसार भी है कि अगर आप किसी से वादा कर के आते हो और अगर आप उसे पूरा नहीं करते हो तो सबसे पहले उसका हिसाब होगा. हमारे कुरान शरीफ में है. लेकिन फिर भी इंशाल्लाह कुछ कर पाई तो मैं जरुर करुँगी.

gidhaur.com ज़ीनत सिद्दीकी को ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता है!

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