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गिद्धौर रियासत की राजनीतिक विरासत बचाने की चुनौती श्रेयसी के कंधों पर

गिद्धौर/जमुई | सुशान्त साईं सुन्दरम :

महोबा (Mahoba) से आये चंदेल राजवंशों की सत्ता को देखने वाले गिद्धौर (Gidhaur) की भूमि राजनीतिक मामलों में भी उर्वरा रही है. लगभग छह सौ से अधिक समय तक चंदेल शासकों ने गिद्धौर (Giddhaur) पर राज किया था. 'जमुई का इतिहास और पुरातत्व' (Jamui Ka Itihas Aur Puratatva) नामक शोध पुस्तक में डॉ. श्यामानंद प्रसाद (Dr. Shyamanand Prasad) लिखते हैं कि राजतंत्र के समय में गिद्धौर (Gidhour) का मतलब सम्पूर्ण गिद्धौर (Giddhour) रियासत से था, न कि वर्तमान में केवल एक गिद्धौर (Giddour) नामक नगर से. सम्पूर्ण गिद्धौर रियासत की राजधानी पतसंडा (Patsanda) में विद्यमान थी. जो कि अब गिद्धौर के नाम से ही जाना जाता है और वर्तमान में जमुई (Jamui) जिलांतर्गत एक प्रखंड मुख्यालय है.

राजतंत्र खत्म होने और राष्ट्र में प्रजातंत्र स्थापित होने के बाद देश की राजनीति में कई राजे-रजवाड़े और जमींदार सक्रीय हुए. जनता के बीच आये जरुर लेकिन अधिकांश की किस्मत ने साथ नहीं दिया. फ़िलहाल चुनिंदा ही रियासती राज घराने राजनीति में सक्रीय हैं. इनमें से एक गिद्धौर राज रियासत भी है. इस बारे में हम आपको अधिक बताएं उसके पहले थोडा अतीत की ओर ले चलते हैं.

(गिद्धौर स्थित लॉर्ड मिंटो टावर. इसका निर्माण वर्ष 1906-07 में गिद्धौर रियासत द्वारा तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिंटो के गिद्धौर आगमन के स्मारक के रूप में करवाया गया था. यह अब बिहार सरकार के अधीन हो चुका है.)

गिद्धौर राज रियासत के अंतर्गत महुलिगढ़ (Mahuligarh) से सम्बन्ध रखने वाले चंदेल वंशी कुमार कालिका प्रसाद सिंह उर्फ़ हीरा जी (Kumar Kalika Prasad Singh 'Heera Ji) बिहार (Bihar) के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी (Freedom Fighter) हुए. एक समय जब पूरा गिद्धौर राज रियासत अंग्रेजों (British) का हुक्मरान बनकर रह गया था, तब इसी चंदेल वंश में कुमार कालिका सिंह ने विद्रोह का सूत्रपात किया. वे महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) से प्रभावित थे और देश की आजादी में योगदान देने के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया था. यहाँ तक कि महुलिगढ़ के कुमार कालिका सिंह का दाना-पानी भी गिद्धौर रियासत ने बंद कर दिया. ऐसे में वे महुलिगढ़ का त्याग कर आम जनता के बीच गिद्धौर के ही बंझुलिया (Banjhuliya) ग्राम में रहे थे.

कुमार कालिका प्रसाद सिंह ने कालांतर में जमुई विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया था. वे जमुई से विधायक निर्वाचित हुए. लेकिन वर्ष 1952 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी दुर्गा मंडल ने उन्हें हरा दिया था.

उनके अलावा गिद्धौर रियासत के 27वें राजा महाराजा बहादुर प्रताप सिंह (Maharaja Bahadur Pratap Singh) वर्ष 1989 और 1994 में दो बार बांका (Banka) लोकसभा से जनता दल (Janata Dal) से सांसद निर्वाचित हुए.

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(दिग्विजय सिंह वर्ष 2009 में बांका लोकसभा से चुनाव लड़े और जीते भी. इस चुनाव में उनका चुनाव चिन्ह नगाड़ा छाप था.)
गिद्धौर राज रियासत से ताल्लुक रखने वाले दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) बांका से वर्ष 1999 में पहली बार सांसद चुने गए. इसके बाद वर्ष 2009 में वे पुनः बांका से ही निर्दलीय सांसद बने. वे अपने जीवनकाल में केन्द्रीय मंत्री भी बने और जनहित के कई विकास कार्य भी किये. दिग्विजय सिंह के निधन के बाद वर्ष 2010 में हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी पुतुल कुमारी (Putul Kumari) बांका से सांसद चुनी गईं. पुनः वे वर्ष 2014 के चुनाव में बांका से भाजपा (BJP) की उम्मीदवार बनाई गईं लेकिन मोदी लहर होने के बावजूद भी हार गईं. इसके बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में बांका सीट एनडीए (NDA) गठबंधन के तहत जदयू (JDU) के खाते में चली गई. ऐसे में पुतुल कुमारी ने निर्दलीय ही चुनाव लड़ा लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपने पति दिग्विजय सिंह का करिश्मा न दिखा सकीं और हार गईं. इस चुनाव में गठबंधन के विरूद्ध जाकर चुनाव लड़ने की वजह से भाजपा ने उन्हें पार्टी से छह साल के लिए निष्काषित कर दिया. हालाँकि वे अब भी राजनीति में सक्रीय हैं.
(पुतुल कुमारी एवं श्रेयसी सिंह)

दिग्विजय सिंह एवं पुतुल कुमारी की पुत्री श्रेयसी सिंह (Shreyasi Singh) ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत (India) का प्रतिनिधित्व किया है. वे निशानेबाज (Shooter) हैं और राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) में भारत को स्वर्ण दिला चुकी हैं. श्रेयसी को राष्ट्रपति द्वारा अर्जुन अवार्ड (Arjun Award) से भी सम्मानित किया जा चुका है. वर्ष 2020 में हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) में श्रेयसी जमुई विधानसभा से भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं. श्रेयसी पर गिद्धौर रियासत की राजनीतिक विरासत बचाने की बड़ी चुनौती है.

(श्रेयसी सिंह की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान है. वे राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को निशानेबाजी में स्वर्ण दिला चुकी हैं. उन्हें राष्ट्रपति द्वारा अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया है. श्रेयसी गोल्डन गर्ल के नाम से मशहूर हैं.) 

बता दें कि इस वर्ष के चुनाव में गिद्धौर रियासत की श्रेयसी सिंह ही एकमात्र उम्मीदवार हैं जो राजे-रजवाड़ों के परिवार से संबंध रखती हैं. श्रेयसी के लिए जमुई का रण जीतना भी चुनौती से कम नहीं है. पहले चरण में ही 28 अक्टूबर को जमुई विधानसभा के लिए वोट डाले जा चुके हैं. अब इंतजार सभी को 10 नवंबर के मतगणना की है. देखना दिलचस्प होगा की राजनीति में  श्रेयसी किस प्रकार पैर जमाती हैं और राज परिवार के सियासत को कैसे आगे बढ़ा पाती हैं.

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