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अलीगंज : रंग बिरंगी रोशनी में गूम हुए मिट्टी के दीये

 





(अलीगंज :- चन्द्र शेखर सिंह)

दीपावली के पर्व पर हजारों- लाखों घरों में रोशनी से जगमग करने वाले कुम्हारों की जिंदगी में आज भी अंधेरा ही अंधेरा है। आधुनिकता की चकाचौंध ने कुम्हारों के सामने जीवन यापन का संकट खड़ा कर दिया है।



हाड़तोड़ मेहनत व अपनी कला के चलते मिट्टी के दिए व दूसरे बर्तन बनाने वाले कुम्हारों को आज दो वक्त की रोटी के लिए परेशान होना पड़ रहा है। दीपावली के समय जो कुम्हार दम भरने की फुर्सत नहीं पाते थे। वही आज मिट्टी के चंद दिये बना आस-पास के बाजार में बेचने के लिए जाते हैं। वहां भी पूरे दिये बिक जाए इस बात की आशंका बनी रहती है।  बाजार में दिये की जगह आधुनिक तरह की तमाम रंग बिरंगी बिजली की झालरों ने ले लिया है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के सामने समस्या ही समस्या मुंह बाए खड़ी है। दीये व दूसरे बर्तन बनाने के लिए गांव के जिन तालाबों से यह कुम्हार मिट्टी निकालते थे। उस पर अब लोगों को आपत्ति है। सरकार से भी किसी तरह की मदद इनको नहीं मुहैया हो पाती है। मिट्टी के बर्तन बनाकर परिवार चलाने वाले कुम्हारों के तमाम परिवार आज भी मिट्टी के टूटे-फूटे घरों में रहने को विवश हैं। इन्हें इस बात का मलाल है कि उन्हें ना तो जनप्रतिनिधि और ना ही शासन से कोई मदद मिल रही है। गोल-गोल घूमते पत्थर के चाक पर मिट्टी के दीये बनाते इन कुम्हारों की अंगुलियों में जो कला है। वह दूसरे लोगों में शायद ही हो घूमते चाक पर मिट्टी के दिये वह दूसरे बर्तन बनाने वाले इन कुम्हारों की याद दीपावली आने से पहले हर शख्स को आ जाती है। तालाबों से मिट्टी लाकर उन्हें सुखाना,सूखी मिट्टी को बारीक कर छनना और उसके बाद गीली कर चाक पर ररव तरह-तरह के बर्तन व दीये बनाना इन कुम्हारों की जिंदगी का अहम काम है। इसी हुनर के चलते कुम्हारों के परिवार का भरण पोषण होता है।

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