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Thursday, 3 September 2020

कवि कथा - ३ : 'मेरी दृष्टि में दिग्घी स्विट्जरलैंड की बहुश्रुत धरती के टुकड़े से कत्तई कम नहीं था'

विशेष : जमुई जिलान्तर्गत मांगोबंदर के निवासी 72 वर्षीय अवनींद्र नाथ मिश्र का 26 अगस्त 2020 को तड़के पटना के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. स्व. मिश्र बिहार विधान सभा के पूर्व प्रशासी पदाधिकारी रह चुके थे एवं वर्तमान पर्यटन मंत्री के आप्त सचिव थे. स्व. मिश्र विधान सभा के विधायी कार्यो के विशेषज्ञ माने जाते थे. इस कारण किसी भी दल के मंत्री उन्हें अपने आप्त सचिव के रूप में रखना चाहते थे.

अवनींद्र नाथ मिश्र जी के निधन के बाद उनके भाई एवं गिधौरिया बोली के कवि व हिंदी साहित्य के उच्चस्तरीय लेखक श्री ज्योतिन्द्र मिश्र अपने संस्मरणों को साझा कर रहे हैं. स्व. अवनींद्र नाथ मिश्र का पुकारू नाम 'कवि' था. ज्योतिन्द्र मिश्र जी ने इन संस्मरणों को 'कवि कथा' का नाम दिया है. इन्हें हम धारावाहिक तौर पर gidhaur.com के अपने पाठकों के पढने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. यह अक्षरशः श्री ज्योतिन्द्र मिश्र जी के लिखे शब्दों में ही है. हमने अपनी ओर से इसमें कोई भी संपादन नहीं किया है. पढ़िए यहाँ...

कवि- कथा (३)

1957 के छः महीने और 1958 के 12 महीने के वनवास में हम दोनों भाई आचार्य प्रफुल्ल शास्त्री ( बड़े बाबूजी) के सारस्वत साये में उनके छंद की तरह आवद्ध हो गये ।हमारा यह बन्धन दोहे की तरह का था । एक का ठेहुना फूटता तो दूसरा भी कलप जाता। हमने सातवीं क्लास की उत्तीर्णता भी हासिल की ।साथ ही प्रकृति के विराट रूप का दर्शन भी किया। मेरी दृष्टि में दिग्घी स्विट्जरलैंड की बहुश्रुत धरती के टुकड़े से कत्तई कम नहीं था। हमने पलाश के फूलों से होली के लिये रंग बनाना भी सीखा। बरसात में खुले हुए मैदान में आकाश से गिरती हुई चांदी जैसी मछलियॉँ भी चुनना सीखा। दतवन के लिए जंगल से रामलत्ती काट कर लाना भी सीखा। टपकते महुआ के फलों को अंडर वियर से पोछकर खाना भी सीखा। अपने संताली मित्रो के घर जाकर महुआ का लठ्ठा भी खाना सीखा। पाना पत्ती की जड़ और पलाश के कोमल पत्ती को मुँह में रखकर पान खाने की प्रक्रिया भी सीखी। यह विश्वास भी करना सीखा की दिग्घी स्कूल का परिसर जरूर कोई सिद्धाश्रम है जहां गाँव के पढनिहार बच्चे दोपहर में आकर निर्जन एकांत में जो कुछ पढ़ते थे , उन्हें याद हो जाता था।
अब हम स्कूल के कुएं में बाल्टी डाल कर अमृत तुल्य पानी निकालने में सिद्धहस्त हो चुके थे । अब हमें कारे लाल (सेवक) को बुलाने की जरूरत नहीं होती थी ।खुद स्नान कर लेते थे।सूर्य के उदय होते ही स्नान कर लेने का नियम बना हुआ था। माताएँ भी स्नान के बाद ही चूल्हा जोड़ सकती थी । सामने उगता हुआ सूरज । सूरज और हमारे बीच कोई नहीं । लगता था कि बस थोड़ी ही दूर पर तो है।
मेरे पिता श्री उपेंद्र नाथ मिश्र तब मांगोंबन्दर में चिकित्सा कार्य करते थे । उन्हें कुछ अच्छी आमदनी हुई ।
एक दिन दो सायकिल पर छोटे बाबूजी और उनका कम्पाउंडर सूर्या रावत आये । हम दोनों भाई तो उनकी नई बी एस ए और हम्बर साइकिल के पीछे मोहित थे। कभी घण्टी बजा देते कभी गद्देदार सीट छूते। कभी डाइनेमो को पिछले चक्के में सटाकर हेडलाइट जलाते ।
उधर से माँ चिल्लाती । छोड़ दो खराब हो जाएगा। दोनों भाई एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे कि बाबूजी हम दोनों को साइकिल बाहर ले जाने की इजाज़त दे दें। हम हाफ पैडिल पर साइकिल चलाना सीख गये थे। लेकिन मेरे पिताजी परशुराम के अवतार हैं। लेकिन यह यकीन था कि कवि को वे कुछ नहीं कहेंगे। और कवि थे कि उन्हें दुलारू होने का भान ही नहीं था।
बात नहीं बनी। सुवह जब मेरे पिताजी माँगोबन्दर जाने लगे तो हम्बर निकाला और कम्पाउंडर रावत को साफ सुथरा करने को कहा फिर नाश्ता किया। बहुत हिम्मत जुटाकर बड़का बाबू से कह सके कि भैया यह बी एस ए आपके लिये आसनसोल से जाकर लाया है। यह आपके अनुकूल होगा । बड़ेबाबूजी कुछ नहीं बोले ।जाने वक्त आशीर्वाद दिया।

क्रमशः



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