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शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

वैवाहिक कार्यक्रमों में निखार लाता है अत्यंत प्राचीन कोहबर कला

Gidhaur.com (कला) : वैवाहिक कार्यक्रमों में पारंपरिक कोहबर कला निखर उठती है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कोहबर कला से सजे दीवार देखकर ही पता चल जाता है कि इस घर में वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित हुआ है। विवाह कार्यक्रम के शुरू होते ही घर की दीवारों को कोहबर कला से सजाने का काम शुरू हो जाता है। यह कार्य महिलाओं के जिम्मे होती है, जो इसे बखूबी निभाती हैं। इस कला में विविध रंगों का प्रयोग किया जाता है। घर की दीवारों के साथ दुल्हन के शयन कक्ष में भी कोहबर कला की विशेष आकृति बनाई जाती है। जिसकी विधिवत पूजा अर्चना की जाती है। महिलाएं बताती हैं, कि कोहबर कला के मंगल चिन्ह निर्विघ्न वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न होने की कामना को लेकर बनाया जाता है। यह एक रस्म है, जो वैवाहिक कार्यक्रमों में आवश्यक रूप से निभाया जाता है।
कोहबर कला एक पारंपरिक कला है। जिसमें पारंपरिक आकृति बनाई जाती है। इस कला में पशु पक्षी, जल जीव, फल-फूल व वनस्पतियों को मुख्य रूप से स्थान दिया जाता है। इसके अलावा स्वास्तिक, कलश आदि को भी चित्र में उकेरा जाता है। पुरातात्विक विशेषज्ञ उदय कुमार का कहना है कि कोहबर कला अत्यंत प्राचीन कला है। इस कला की शुरुआत गुफा और कंदराओं में रहने वाले जनजातियों के द्वारा की गई है। गुफा का ही दूसरा नाम कोहबर माना जाता है। जनजातीय महिलाएं गुफओं में ऐसे चित्र बनाया करती थी, जो आज भी किसी न किसी रूप में जीवित है।

(अनूप नारायण)
Gidhaur.com     |    14/10/2017, शनिवार

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