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कट्टरता का उभार : हिंदुत्व पर इस्लाम का प्रभाव

विशेष [धनंजय कुमार सिन्हा] :
कट्टरता के मामले में इस्लाम का काफी प्रभाव हिंदू धर्म पर भी हुआ। विगत 5 वर्षों में इस प्रभाव की वृद्धि दर सबसे तेज एवं व्यापक मानी जा सकती है।

बात धर्मों की करें तो हिंदू धर्म को साधारणतः उदार माना जाता है, जबकि इस्लाम को कट्टर। इस समझ के सबसे मुख्य कारणों में एक कारण यह भी माना जाता है कि हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की अवधारणा है, जबकि इस्लाम में पुनर्जन्म जैसी कोई चीज नहीं। हिंदू इस बात को लेकर सतर्क एवं भयभीत रहते हैं कि अगर उन्होंने हिंसा-हत्या, शोषण-प्रताड़ना इत्यादि किया तो उन्हें अगले जन्म में इसका हिसाब चुकता करना पड़ेगा, किन्तु इस्लाम के अनुयायियों के लिए ऐसी कोई बात नहीं है।

इसलिए अनेक इतिहासकार एवं दार्शनिक ऐसा मानते हैं कि हिंदू धर्म में 'पुनर्जन्म' की अवधारणा की वजह से ही उदारता की अधिकता है, एवं इस्लाम में 'पुनर्जन्म' की अवधारणा की अनुपस्थिति की वजह से कट्टरता है।

हालांकि अगर हिंदू धर्म एवं इसके अनेकानेक सम्प्रदायों-शाखाओं के नियम-परंपराओं पर गौर करें तो हम पाते हैं कि हिंदू धर्म में भी क्रूर दंड-विधानों के साथ-साथ पशु-पक्षी बलि से लेकर नरबलि तक के उदाहरण मौजूद हैं। असहाय, निर्बलों, औरतों, बच्चों एवं वृद्धों को प्रताड़ित करने के भी अनेकानेक उदाहरण मौजूद हैं। सतीप्रथा जैसी अमानवीय हृदय-विदारक परम्परा हिंदू धर्म का ही अंश था।

फिर भी हिंदू एवं इस्लाम दोनों ही धर्मों के कट्टर नियम-परंपराओं की तुलना में उदारता के नियम एवं परंपराओं के उदाहरण ज्यादा मात्रा में मौजूद हैं। दया, परोपकार, त्याग, संयम से जुड़े नियम एवं परम्पराओं के उदाहरण दोनों ही धर्मों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।

बावजूद इन सबके जब भी 'कट्टरता' की चर्चा होती है तो इस्लाम धर्म को ज्यादा कट्टर माना जाता है। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदू धर्म के सारे नियमों, कायदे एवं परम्पराओं में संशोधन के विकल्प मौजूद हैं, और आवश्यकतानुसार अनेकों बार हिंदू धर्म के नियमों को संशोधित किया गया, नए नियमों-परम्पराओं को जोड़ा भी गया। हिंदू धर्म में समय के अनुसार परिवर्तन को स्वीकार करने की गुंजाइश रखी गई है, जबकि इस्लाम में ऐसी गुंजाइशों के लिए शून्य स्थान है। इस्लाम ने क़ुरान में परिवर्तन या संशोधन के समस्त दरवाजों को बंद कर रखा है। हालत तो यह है कि कुरान से अलग भी जो मान्यताएं एवं परंपराएं इस्लाम में मौजूद हैं, कुरान के नाम का सहारा लेकर उन्हें भी अजर-अमर घोषित करने का प्रयास किया जाता रहता है।

हिंदू धर्म में 'पुनर्जन्म की धारणा' एवं इसके 'नियमों में संशोधन की गुंजाइश' ने इसे मुख्य रूप से इस्लाम की तुलना में अधिक उदार होने के पायदान पर खड़ा रखा है, जबकि इस्लाम में 'पुनर्जन्म की धारणा की अनुपस्थिति' एवं इसके 'नियमों में संशोधन की सख्त मनाही' ने इसे हिंदू धर्म की तुलना में अधिक कट्टर होने के पायदान पर बरकरार रखा है।

अगर बुद्धिजीवियों के उक्त लकीरों को मानते हुए आगे बढ़ें और वर्तमान भारत में 'जय श्री राम' के उदघोष के साथ हो रही कट्टर-पूर्ण सार्वजनिक हिंसा की लगातार बढ़ती हुई घटनाओं की ओर झांकें, तो सहज ही ऐसा विचार उत्पन्न होगा कि हिंदू धर्म में आए इस कट्टर-पूर्ण परिवर्तन में कहीं-न-कहीं इस्लाम धर्म की कट्टरता का अच्छा-खासा प्रभाव पड़ा है, चाहे यह प्रभाव संगत का प्रभाव माना जाए या प्रतियोगिता का अथवा वर्चस्व का, किन्तु इस प्रभाव को एकदम से नकार जाना कदापि संभव नहीं है।
- धनंजय कुमार सिन्हा, पत्रकार
एवं
संयोजक, अमन समिति
(MA in Ancient Indian History, Culture & Archaeology)
(इस आलेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं, इसे बिना संपादन के प्रसारित किया गया है)