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2019 में भुखमरी के किस पायदान पर खड़ा है भारत ? जानने का समय आ गया है


10 अक्तूबर 2019 : ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2019 के जारी होने का समय आ गया है. इसकी रैंकिंग के आँकड़ों से पता चलेगा कि भुखमरी में हिन्दुस्तान का विश्व में कौन सा स्थान है. प्रत्येक वर्ष अक्तूबर माह में यह आँकड़ा जारी होता है. सप्ताह भर के भीतर ग्लोबल हंगर इंडेक्स द्वारा भुखमरी से मरने वालों की संख्या के अनुसार दुनिया भर के देशों की वर्ष 2019 के लिये रैंकिंग जारी कर दी जायेगी.

इस रैंकिंग में जो जितना ऊपर (टॉप रैंक पर) होता है, ऐसा समझा जाता है कि वह देश भुखमरी से उतनी अधिक मुस्तैदी से लड़ रहा है और उस देश में भुखमरी से मरने वालों की संख्या कम है. साथ ही, जो देश रैंकिंग में जितना नीचे (पीछे) होता है, ऐसा समझा जाता है कि उस देश में भुखमरी से मरने वालों की संख्या उतनी ही ज़्यादा है, और वह देश भुखमरी से लड़ने में कम मुस्तैद है. 

वर्तमान प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार में हिन्दुस्तान ग्लोबल हंगर इंडेक्स में लगातार पिछड़ता रहा है. इस मामले में साल 2014 में हिन्दुस्तान 99वें स्थान पर था. वहीं साल 2015 में थोड़े सुधार के साथ हिन्दुस्तान 80वें स्थान पर जा पहुंचा. इसके बाद साल 2016 में 97वें और साल 2017 में 100वें पायदान पर पहुंच गया. वर्ष 2018 में हिन्दुस्तान कुल 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर रहा था.



भुखमरी के मामले में हिन्दुस्तान की स्थिति नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से भी खराब चल रही है. इस मामले में चीन भारत से काफी आगे है. 2018 में चीन 25वें नंबर पर था. वहीं बांग्लादेश 86वें, नेपाल 72वें, श्रीलंका 67वें और म्यामांर 68वें स्थान पर था. सिर्फ़ पाकिस्तान भारत से पीछे था. उसे 106वां स्थान मिला था.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) वैश्विक, क्षेत्रीय, और राष्ट्रीय स्तर पर भुखमरी का आंकलन करता है. भूख से लड़ने में हुई प्रगति और समस्याओं को लेकर हर साल इसकी गणना की जाती है. जीएचआई को भूख के खिलाफ संघर्ष की जागरूकता और समझ को बढ़ाने, देशों के बीच भूख के स्तर की तुलना करने के लिए एक तरीका प्रदान करने और उस जगह पर लोगों का ध्यान खींचना जहां पर भारी भुखमरी है, के लिए डिजाइन किया गया है.



ग्लोबल हंगर इंडेक्स में ये देखा जाता है कि देश की कितनी जनसंख्या को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल रहा है. यानि देश के कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं. इसमें ये भी देखा जाता है कि पांच साल के नीचे के कितने बच्चों की लंबाई और वजन उनके उम्र के हिसाब से कम है. इसके साथ ही इसमें बाल मृत्यु दर की गणना को भी शामिल किया जाता है.


(यह आलेख पत्रकार धनंजय कुमार सिन्हा के द्वारा लिखा गया है)