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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35A हटना एबीवीपी की जीत, परिषद के 29 वर्षों के संघर्ष का परिणाम

जमुई [सुशान्त साईं सुन्दरम] :
बुधवार को जमुई स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय में नगर सह मंत्री करण साह की अध्यक्षता में एक सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसमें एबीवीपी के पूर्व कार्यकर्ता एवं भाजपा जमुई के जिलाध्यक्ष भास्कर सिंह ने कहा कि अखिल भारतीय विधार्थी परिषद ने एक ऐसा जन आन्दोलन खड़ा किया जो 29 सालों तक निरंतर चलता रहा। यह आन्दोलन उन परिस्थितियों के खिलाफ था जिनपर तत्कालीन सरकारें भी मौन साधे हुए थी। पक्ष-विपक्ष सभी राजनीति में लिप्त थे। ऐसे माहौल में पूरे भारत में एक नारा गुंज उठा "कश्मीर हो या गुवाहटी, अपना देश अपनी माटी"। इस आंदोलन की कमान विश्व के सबसे ओजस्वी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के हाथों में थी।

श्री भास्कर सिंह ने कहा कि 1990 का ये वो दौर था जब भारत का एक हिस्सा पुरी तरह आतंकवाद के गिरफ्त में था। जहाँ एक ओर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर पूरे भारत में तिरंगे का सम्मान किया जाता था, वहीं कश्मीर की घाटी में कुछ मनचढ़ो के द्वारा तिरंगे की अस्मिता को ठेस पहुँचाया जाता था। हर वर्ष आतंकवादियों की इन हरकतों पर युवा पीढी का खून खौल उठता, लेकिन सरकार की निष्क्रियता के कारण लोग क्रोध पीकर रह जाते थे। जरूरत थी एक ऐसे शक्ति की जो जनता के इस क्रोध को राष्ट्रवादी विचार-धारा के संग व्यापक आन्दोलन की नींव डालें।
इस अवसर पर उपस्थित मुंगेर विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य सह एबीवीपी विभाग संयोजक शैलेश भारद्वाज ने कहा कि कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला अनुच्छेद-370 और अनुच्छेद 35-A ही उस राज्य के दोहन का कारण बनने लगा। तब देश को अखंड रखने के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया। 1953 में डॉ. मुखर्जी ने देश की आजादी के बाद जम्मू-कश्मीर के अंदर दो विधान, दो प्रधान और दो निशान देश में नहीं चलेंगे की आवाज बुलंद की। इस नारे के साथ जिस लड़ाई में डॉ. मुक्जरजी बलिदान हुए, उसे हम सभी एबीवीपी कार्यकर्ता व्यर्थ नहीं होने देंगे।
शैलेश ने आगे कहा कि 15 अगस्त 1990 के दिन कश्मीर के लाल चौक पर आतंकवादियों ने तिरंगे का अपमान करते हुए ऐलान कर दिया की घाटी में तिरंगे के लिए कोई स्थान नहीं है। एक संघर्ष शुरू करने के लिये यह घटना पर्याप्त था। इस ऐलान को परिषद ने चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुये हुंकार भरी। इस घटना के पश्चात सभी लोग सरकार के प्रतिक्रिया पर आस लगाए हुए थे, परंतु उनकी चुप्पी नहीं टूटी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उस वक्त अपने 10,000 छात्र-छात्राओं के साथ "चलो कश्मीर" रैली का आयोजन किया। सरकार द्वारा कश्मीर जानें की अनुमति न मिलने के बावजूद, "जहाँ हुआ तिरंगे का अपमान, वहीं करेंगे तिरंगे का सम्मान" नारा के साथ परिषद कार्यकर्ता बढ़ते गये। संघर्ष के दौरान परिषद के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया परंतु तरूणाई की आग बुझी नहीं थी। जहाँ हुये बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है, जैसे उत्साही नारों के साथ परिषद कार्यकर्ता अपने सर पर कफन बांधे हुए भेष बदलकर गंतव्य की ओर बढ़ते रहे।
एबीवीपी के जमुई नगर अध्यक्ष शैलेश कुमार ने बताया कि देश के कोने-कोने से निकले 10,000 कार्यकर्ताओं मे से लगभग 2000 कार्यकर्ता 11 सितंबर 1990 को उधमपुर में एकत्रित हुए। अपने हजारों साथियों के गिरफ़्तार होने के बाद भी उनका ध्येय विचलित नहीं हुआ। उधमपुर से लालचौक तक भव्य तिरंगा यात्रा निकाला गया। पूरा वातावरण 'भारत माता की जय' के जयघोष से गुंजायमान हो गया। विद्यार्थी परिषद ने लाल चौक पर तिरंगा फहरा कर देशविरोधी ताकतों के सामने छात्रशक्ति-राष्ट्रशक्ति की मिसाल खड़ी कर दी।

गौरतलब है कि 1990 से चले आ रहें इस आन्दोलन को गत 5 अगस्त को स्थायित्व मिला जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-A समाप्त कर वहां एक नये परिवेश की शुरूआत की गयी। अपने संघर्ष गाथा के 29 वर्षों के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (जमुई) केन्द्र सरकार के इस फैसले का स्वागत करता है और धन्यवाद देता है। मौके पर प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य कुंदन यादव, सत्यम कुमार, आजाद राय, रोशन कुमार, निर्मल सिंह, गौतम कुमार, भानु सिंह, सन्नी कुमार, पप्पू यादव, गुलाब सिंह सहित दर्जनों कार्यकर्ता उपस्थित रहे।