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धनबाद : IIT ISM में 'खजुराहो का शिल्पी' का हुआ मंचन, नाटक से बताया ऐतिहासिक महत्व


धनबाद/पटना (सुशान्त साईं सुन्दरम) : बीते शनिवार आईआईटी आईएसएम धनबाद के गोल्डन जुबिली लेक्चर थिएटर (जी.जे.एल.टी.) में अभय ड्रामेटिक्स क्लब द्वारा नाटक 'खजुराहो का शिल्पी' नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया. यह नाटक मोह के क्षण के पार के अध्यात्म और मोक्ष के दर्शन को परिभाषित करता है. इस नाटक के सभी पात्र ऐतिहासिक होते हुए भी सामान्य मनुष्य की प्रवृत्तियों के प्रतीक बनकर समाने आते हैं.


नाटक में पात्र अल्का का यह कथन भोग से योग के कथ्य को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है, ‘यह संसार तो कमजोर लोगों का है. यहां भूख लगती है, शरीर तपता है. इसलिए शिल्पी, अध्यात्म छूटते देर नही लगती.’ नाटक का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक संदर्भ की व्याख्या करते हुए उसका आधुनिकता के साथ संपर्क स्थापित करना है. डॉ. शंकर शेष लिखित इस नाटक का निर्देशन श्रेयांस जैन एवं मयंक बाजपेयी ने किया, जबकि उनके सहयोगी के तौर पर सह-निर्देशक के रूप में प्रियांशु श्रीवास्तव एवं आदर्श कुमार नंदा ने अपना योगदान दिया. ऐतिहासिक आधार पर लिखे गये इस नाटक में ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से शाश्वत सत्य को उद्घाटित किया गया है.


आत्मा के धरातल पर संघर्ष
नाटक में दिखाया गया कि राजवंश की अधिष्ठात्री देवी हेमवती खजुराहो में बाह्य और अंतर्जगत के स्वरूप से युक्त मंदिर का निर्माण की प्रेरक बनती है. शिल्पी की ओर आकर्षित अल्का, शिल्पी को देह की दुनिया में खींच ले जाने की कोशिश करती है.

शिल्पी आत्मा के धरातल पर संघर्ष करता है. अंतत: उसकी साधना की विजय होती है. यह साक्षात मोह के क्षण (अल्का) को अस्वीकार कर देता है. जीवन की परिपूर्णता, सिंगार और भोग के बाद ही अध्यात्म में है. अगर इसका स्वाद लिए बिना ही तटस्थता से अध्यात्म की ओर जाने का प्रयास हुआ तो जीवन से पलायन हो जाता है.


शिल्पी के संवाद इसी तथ्य की पुष्टि करते है, ‘‘महाराज, ये प्रतिमाए सांसरिक आकर्षण की चरम सीमाएं बनकर मनुष्य के सामने ‘मोह का क्षण’ प्रस्तुत करती हैं. यदि वह इस क्षण से ग्रसित हुआ तो वह पुन: संसार में लौट जाएगा. और कहीं उसने इसे जीत लिया तो यही क्षण अध्यात्म के राजपथ का प्रस्थान-बिन्दु बनेगा.’’


इस नाटक के सभी पात्र ऐतिहासिक होते हुए भी सामान्य मनुष्य की प्रवृत्तियों के प्रतीक बनकर सामने आते है. अल्का और महारानी पुष्पा के व्यक्तित्व समर्पित स्त्री जीवन के चित्र है. अल्का युग युग का सत्य है. महाराज यशोवर्मन ऐतिहासिक व्यक्तित्व और आदर्श पिता के रूप को दर्शाते है.

शिल्पी आत्मा के धरातल पर संघर्ष करता है. अंततः उसकी साधना की विजय होती है. वह साक्षात मोह यानी अलका को अस्वीकार कर देता है. जीवन की परिपूर्णता श्रृंगार और मोह के बाद ही आध्यात्म में है. अगर इसका स्वाद लिए बिना ही तटस्थता से आध्यात्म की ओर जाने का प्रयास हुआ तो जीवन से पलायन हो जाता है. मंदिर की प्रतिमाए सांसारिक आर्कषण की चरम सीमा बनकर मनुष्य के सामने मोह का क्षण प्रस्तुत करती है.

नाटक में विभिन्न घटनाक्रमों और संवादों से यह बात स्थापित करने की चेष्टा की गई है कि क्या कला कभी अश्लील हो सकती है. क्या संसार में ऐसा कोई प्राणी है, जो मोह के क्षण में पड़ा हो और क्या मोह के क्षण पर विजय प्राप्त की जा सकती है. नाटक में कुल मिलाकर यह कहने की कोशिश की गई है, कि खजुराहो के मंदिरों का वास्तुशिल्प अश्लील नहीं है, यह तो भारतीय शिल्प कला का चरम बिंदु है. मंदिरों में इन प्रतिमाओं को अंकित करने के पीछे एक बड़ी फिलासोफी रही है. मंदिर में प्रवेश से पहले इन मूर्तियों को इसलिए स्थापित किया गया था ताकि मंदिर स्वच्छ मन वाला ही पहुंच सके. मंदिर में प्रवेश से पहले ये मूर्तियां व्यक्ति के सामने मोह का क्षण प्रस्तुत करती हैं, यदि व्यक्ति इनमें खो जाता है, तो वह प्रभु के चरणों तक नहीं पहुंच पाता है, और यदि वह इन्हें बिना देखे स्थितप्रज्ञ भाव से आगे बढ़ जाता है, वही प्रभु के सच्चे दर्शन करता है.

बेहतर रहा मंचन
नाटक में करेक्टर के हिसाब से पात्रों के कॉस्ट्यूम तय किए गए. पूरे नाटक में एक भी दृश्य ऐसा नहीं था जो मंच पर अश्लील लगे.

नाटक में मंच पर
आईआईटी आईएसएम धनबाद के छात्र-छात्राओं ने इस नाटक में अभिनय कर सबका मन मोह लिया. महाराज यशोवर्मन के रूप में थर्ड इयर के अनुराग कुमार, महारानी पुष्पा के रूप में थर्ड इयर की ऐश्वर्या बरनवाल, कवी माधव के रूप में फाइनल इयर के सुमित क्षत्रिय, राज शिल्पी चंडवर्मा के रूप में थर्ड इयर के पराग सैनी, राजकुमारी अलका के रूप में थर्ड इयर की वर्षा, शिल्पी मेघराज आनंद के रूप में फाइनल इयर के अथर्व कुमावत, द्वारपाल के रूप में सुपर फाइनल इयर के रौशन आनंद, धर्मगुरु के रूप में थर्ड इयर के अंकुर गुप्ता, तांत्रिक के रूप में थर्ड इयर के समीर पाण्डेय के अलावा अन्य सहयोगी कलाकार रहे. सभी ने अपने अभिनय कला से दर्शकों को बांधे रखा.


इस अवसर पर प्रो. राजीव शेखर, उनकी पत्नी श्रीमति विधु शेखर सहित आईआईटी आईएसएम धनबाद के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे. डिजाईन की क्राफ्टिंग आर्टफ्रिक्स द्वारा की गई थी जिनसे दर्शकों पर विशेष प्रभाव छोड़ा. कार्यक्रम की शुरुआत अपने निर्धारित समय 6 बजे से हुई, जिसकी समाप्ति रात 8:30 बजे हुई. इस नाट्य मंचन में मिश्रित भावनाएं शामिल थीं. जिसने दर्शकों को हर दृश्य में रोमांचित किया.