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बिहार की संस्कृति में रचा-बसा है चौरचन/चौठचंदा/चकचंदा, सोलहवीं शताब्दी से मनाया जा रहा ये लोक पर्व

गिद्धौर/जमुई (सुशान्त सिन्हा) : भादो महीने की चतुर्थी को उदय होने वाले चाँद का दर्शन दोषयुक्त माना जाता है, लेकिन आदिकाल से ही मिथिला क्षेत्र में इस दिन चन्द्रमा की विधि-विधान सहित पूजा करने की विशेष परंपरा रही है. सोलहवीं शताब्दी से ही मिथिला में ये लोक पर्व मनाया जा रहा है. कहा जाता है कि मिथिला नरेश महाराजा हेमांगद ठाकुर के कलंक मुक्त होने के अवसर पर महारानी हेमलता ने कलंकित चांद को पूजने की परंपरा शुरु की, जो बाद में मिथिला का लोकपर्व बन गया.

धार्मिक मान्यतानुसार छठ पर्व की तरह ही हर जाति, हर वर्ग के लोग इस पर्व को उल्लासपूर्वक मनाते हैं. एक ओर जहाँ हम छठ में सूर्यदेव की आराधना करते हैं, वहीं भादो महीने की चतुर्थी के दिन हम चन्द्रमा की पूजा करते हैं. कहा जाता है कि इस दिन चन्द्रमा का दर्शन खाली हाथ नहीं करना चाहिए. यथासंभव हाथ में फल, नैवेद्य मिष्टान आदि लेकर चन्द्र दर्शन करने से मनुष्य का जीवन दोषमुक्त व कलंकमुक्त हो जाता है. भादो महीने की चतुर्थी को चंद्र आराधना के इस पर्व को चौरचन या चकचंदा या चौठचंदा भी कहा जाता है.
लोक त्यौहार चौरचन/चौठचंदा/चकचंदा के शुरुआत के पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है. मुगल बादशाह अकबर ने तिरहुत की नेतृत्वहीनता और अराजकता को खत्म करने के लिए 1556 में महेश ठाकुर को मिथिला का राज सौंपा. बडे भाई गोपाल ठाकुर के निधन के बाद 1568 में हेमांगद ठाकुर मिथिला के राजा बने, लेकिन उन्हें राजकाज में कोई रुचि नहीं थी.

उनके राजा बनने के बाद लगान वसूली में अनियमितता को लेकर दिल्ली तक शिकायत पहुंची. राजा हेमांगद ठाकुर को दिल्ली तलब किया गया. दिल्ली का सुल्तान यह मानने को तैयार नहीं था कि कोई राजा पूरे दिन पूजा और अध्य‍यन में रमा रहेगा और लगान वसूली के लिए उसे समय ही नहीं मिलेगा. लगान छुपाने का इल्जाम लगते हुए हेमानंद को जेल में डाल दिया गया.
जेल में बंद हेमांगद पूरे दिन जमीन पर गणना करते रहते थे. पहरी पूछता था तो वो चंद्रमा की चाल समझने की बात कहते थे. धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि हेमांगद ठाकुर की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और इन्हें इलाज की जरुरत है. यह सूचना पाकर बादशाह खुद हेमांगद को देखने कारावास पहुंचे. जमीन पर अंकों और ग्रहों के चित्र देख पूछा कि आप पूरे दिन यह क्या लिखते रहते हैं? हेमांगद ने कहा कि यहां दूसरा कोई काम था नहीं सो ग्रहों की चाल गिन रहा हूं. आनेवाले करीब 500 वर्षों तक लगनेवाले ग्रहणों की गणना पूरी हो चुकी है. बादशाह अकबर ने तत्काल हेमांगद को ताम्रपत्र और कलम उपलब्ध कराने का आदेश दिया और कहा कि अगर आपकी भविष्यवाणी सही निकली, तो आपकी सजा माफ़ कर दी जाएगी.

हेमांगद ने बादशाह को माह, तारीख और समय बताया. उन्होंने चंद्रग्रहण की भविष्यवाणी की थी. उनके गणना के अनुसार चंद्रग्रहण लगा और बादशाह ने उनकी सजा माफ़ कर दी. जेल से रिहा होने के बाद हेमांगद ठाकुर जब मिथिला आये तो महारानी हेमलता ने कहा कि आज चांद कलंकमुक्त हो गये हैं, हम उनका दर्शन और पूजा करेंगे. इसी मत के साथ मिथिला के लोगों ने भी अपना राज्य और अपने राजा की वापसी की ख़ुशी में चतुर्थी चन्द्र की पूजा प्रारम्भ की.

वर्तमान में यह त्यौहार मिथिला क्षेत्र के बाहर भी मनाया जाता है और अब यह एक लोक पर्व का रूप ले चुका है. व्रती पूरे दिन का उपवास रखते हैं. शाम को अपने सुविधानुसार घर के आँगन या छत पर चिकनी मिट्टी या गाय के गोबर से नीप कर पीठार से अरिपन/अर्पण दिया जाता है. पूरी-पकवान, फल, मिठाई, दही इत्यादि को अरिपन/अर्पण पर सजाया जाता है और हाथ में उठाकर चंद्रमा का दर्शन कर उन्हें भोग लगाया जाता है.

चौरचन/चकचंदा को याद करते हुए मैथिली साहित्यकार शेफालिका वर्मा कहती है “उगः चाँद लपकः पूरी” आज भी उत्सा्ह से भर देता है. हमारा गांव कोसी की मार झेलता गरीबों का गांव था फिर भी चौरचन के दिन सबों के घर में उत्साह रहता. ज़ितने मर्द उतने ही कलश, उतने ही दही के खोर, उतनी ही फूलों पत्तों की डलिया, खाजा, टिकरी, बालूशाही, खजूर, पिडकिया, दालपुरी, खीर, पूड़ी, पकवान आदि पूरे आँगन में सजा के रखा जाता, उतने ही पत्तल भी केला के लगे होते, चाँद उगने के साथ ही घर की सबसे बड़ी मलकिनी काकी माँ पंडित के मन्त्र के साथ-साथ एक-एक सामग्री चाँद को दिखा रखती जाती थी, अंत में सारे मर्द पत्तों में खाते यानी ‘मडर भान्गते’. माँ सारे गांव को प्रसाद बांटती. प्रसाद लेने वालों की लाइन लगी रहती थी.
वैसे मिथिला के अलावा पूरे भारत में इस दिन चांद देखना निषेद माना गया है. वेद-शास्त्रों के अनुसार इस दिन चंद्र दर्शन अशुभ माना जाता है. श्री कृष्णा को स्मयंतक मणि चोरी करने का कलंक लगा था, यह मणि प्रसेन ने चुराई थी. एक सिंह ने प्रसेन को मार दिया था. फिर जामवंत ने उस सिंह का वध कर वह मणि हासिल किया था. इसके बाद श्री कृष्णा ने जामवंत को युद्ध में पराजित कर दिया, जिसके बाद वो इस मणि को हासिल कर कलंकमुक्त हुए थे.