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गुरुवार, 26 जुलाई 2018

लोकगायिका मैनावती देवी के गीतों से भोजपुरी संस्कृति को मिली पहचान

पटना (अनूप नारायण) : लोकगायिका मैनावती देवी श्रीवास्तव मूल रूप से बिहार के सिवान जिले की पचरूखी की रहने वाली थी। वह गोरखपुर के आर्यनगर में रहती थी। उन्होने लोकगायन की शुरूआत गोरखपुर से सन् 1974 में आकाशवाणी गोरखपुर के साथ की। आकाशवाणी गोरखपुर की शुरूआत मैनावती देवी श्रीवास्तव के गीतों से ही हुई। उनके गीतों के बाद से ही भोजपुरी संस्कृति को एक अलग पहचान मिली।
उन्होंने लोकपरंपरा को गीतों में पिरोने का काम किया। लोकपरंपरा में भारतीय सामाजिक परिवेश में रहन-सहन, जीवन-मरण से लेकर हर परिवेश को उन्होने बड़ी ही कुशलता से अपनी रचनाओं में भी उकेरा है। वह कवियत्री और लेखिका थी। म्यूजिक कंपोजर के रूप में उन्होंने आकाशवाणी में काम किया। साथ ही दूरदर्शन में भी उन्होने अपना अमूल्य योगदान दिया।

प्रमुख रचनाएं
1977 गांव के दो गीत, श्री श्री सरस्वती चालीसा, श्री श्री चित्रगुप्त चालीसा, पपिहा सेवाती, पुरखन के थाती, कचरस, याद करे तेरी मैना, चोर के दाढ़ी में तिनका और बेघरनी घर भूत के डेरा।

सम्मान
सन् 1974 से लोकगायन की शुरूआत करने वाली मैनावती देवी को पहला सम्मान सन् 1981 में लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के 94वें जन्मदिवस के अवसर पर बिहार में “भोजपुरी लोक साधिका” का सम्मान मिला। उसके बाद सन् 1994 में अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद लखनऊ द्वारा “भोजपुरी शिरोमणि” का सम्मान ठुमरी गायिका गिरजा देवी के हाथों प्राप्त किया था। इसके बाद उन्हे अनेकों सम्मान भोजपुरी रत्न सम्मान, भोजपूरी भूषण सम्मान, नवरत्न सम्मान, लोकनायक भिखारी ठाकुर सम्मान, लाइफ टाइम एचिवमेन्ट अवार्ड, और गोरखपुर गौरव जैसे सम्मान से नवाजा गया।

मैनावती देवी के एक बेटा व एक बेटी है। बेटा राकेश श्रीवास्तव भी लोकगायक है और बेटी संगीता भी जयपुर में म्यूजिक टीचर है। राकेश श्रीवास्तव माँ के कदमों से कदम मिलाते हुये लोकगायिका में अपना योगदान दे रहे है। उनकी गिनती पूर्वांचल के लोकप्रिय लोकगायक के रूप में होती है।

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