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हिंदी फिल्म समीक्षा : सामाजिक विद्रोह का प्रखर स्वर बना है फ़िल्म 'चौहर'


मनोरंजन [अनूप नारायण] :
फ़िल्म की कथानक ‘दलितों के देवता के रुप में अवतरित ‘ बाबा चौहरमल की लोकगाथा से प्रेरित है इस फ़िल्म की कहानी। बाबा चौहरमल की गाथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने समय में हुआ करती थी। समाज में दलितों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार जिसमें कि ना तो उन्हें बराबरी का दर्ज़ा प्राप्त है और ना ही मानव मात्र से प्रेम करने का अधिकार। बस इसी कथावस्तु को आधार बना कर एक साफ़-सुथरी और सम्पूर्ण रुप से पारिवारिक फ़िल्म बनाई गई है चौहर।


इस फ़िल्म के निर्देषक रघुबीर सिंह जी का कहना है कि इसके माध्यम से वह समाज में एक जागरुकता लाना चाहते हैं जिससे लोगों में आपसी मेल-जोल बढ़े ऊॅंच-नीच का भेदभाव मिटे और सबसे बड़ी बात कि दलितों को उनका मानवीय हक़ मिले। यद्यपि इस फ़िल्म का बजट बहुत बड़ा नहीं है और ना ही इसमें बड़े सितारे हैं फिर भी ये फ़िल्म सभी स्तरों पर एक गहरी छाप छोड़ती है। बात चाहे निर्देsशन की हो या छायांकन की, अभिनय की हो या गीत-संगीत की, हर दृष्टिकोण से फ़िल्म ‘चौहर बड़े बजट वाले फ़िल्मों के इस दौर में अपना एक मुकाम हासिल करने में सक्षम है।
फ़िल्म के लेखक रुपक शरर का कहना है कि जहा दलितों के दर्द की दास्तान है चौहर...वहीं सामाजिक समरसता की ज़ुबान है चौहर । रुपक की मानें तो ऐसी फ़िल्मों का भविष्य दूसरे सप्ताह से तय होता है जब दरशकों के माध्यम से लोगों तक इसका संदेश पहुचता है।
कलाकारों में चैहर बने अमित कश्यप रिचा दीक्षित विवेकानन्द झा अमर ज्योति रतन लाल और विजय सिंह पाल इन सबने बेहतरीन अभिनय का नमूना पेश किया है। इनके अभिनय से फ़िल्म में कहीं से भी बड़े सितारों की कमी नहीं खलती है। डाॅ. अश्विनी कुमार ने कर्णप्रिय संगीत तैयार किया है जिसे अपनी सुमधुर आवाजें दी हैं- सुरेष वाडेकर साधना सरगम और ऐष्वर्य निगम ने। गीत के बोल लिखे हैं- प्रफुल्ल मिश्रा सुधीर-सरबजीत और स्व. राजेश जौहरी ने।

अपनी रेटिंग- चार स्टार