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सिमुलतला : कच्चे धागों में बंधा पति के जीवन की डोर, जगह जगह उमडी भीड़

सिमुलतला (गणेश कुमार सिंह) :- वट सावित्री पूजा को लेकर सुहागिनों की जगह जगह भीड़ उमड़ी रही है। सोमवार की सुबह से ही वट पेड़ों के पास सुहागिन महिलाएं समूह में जुटकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। कई जगहों पर पुजारियों ने सुहागिनों को सावित्री -सत्यवान की कथा भी सुनाई।


सबसे ज्यादा भीड़ रमेड़ी के बड़े देव बाबा मंदिर के पास स्थित क्षेत्र के पुराने बरगद के पेड़ों के पास रही। कच्चे सूत को बरगद के वृक्ष में लपेट कर महिलाओं ने अमर सुहाग की प्रार्थना की। भीषण गर्मी में उपवास रखकर महिलाओं ने पति के लंबे उम्र के लिए इस व्रत रखा। निर्जला उपवास कर उत्साह के साथ पर्व को मनाया।दुल्हन की तरह सोलह श्रृंगार कर महिलाएं मंदिर पहुंचीं। विधि विधान के साथ पूजा किया। फिर सावित्री - सत्यावान की कथा सुनीं। स्थानीय ब्राह्मण परमानंद पांडेय ने बताया कि भारतीय संस्कृति में वट सावित्री व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। वट सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है।
क्षेत्र के बरगदों के पेड़ में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ देखने को मिली। श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर मंदिर में जाकर पुजारी से कथा भी सुनी। वहीं नवविवाहिता ने पहली बार अपने पति के लिए उत्साह के साथ बरगद के पेड़ के पास पहुंच कर कच्चे धागे से जीवन की डोर बांधी। पुजारी ने बताया कि परिणय सूत्र में बंधने के एक माह के अंदर वट सावित्री व्रत करने वाली महिलाओं के लिए यह व्रत अखंड सौभाग्य लेकर आया है।

वट सावित्री व्रत का महत्व

इस व्रत में बरगद पेड़ के चारों ओर घूमकर रक्षा सूत्र बांधा और आशीर्वाद मांगा। इस अवसर पर सुहागिनों एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके अलावा पुजारी से सत्यवान और सावित्री की कथा सुनती हैं। नवविवाहिता सुहागिनों में पहली बार वट सावित्री पूजा का अलग ही उत्साह रहता है।
वट सावित्री के व्रत के दिनबरगद पेड़ के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा सुनने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस व्रत में महिलाएं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। वट वृक्ष के नीचे बैठकर ही सावित्री ने अपने पतिव्रत से पति सत्यवान को दोबारा जीवित कर लिया था।
दूसरी कथा के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि को भगवान शिव के वरदान से वट वृक्ष के पत्ते में पैर का अंगूठा चूसते हुए बाल मुकुंद के दर्शन हुए थे, तभी से वट वृक्ष की पूजा की जाती है। वट वृक्ष की पूजा से घर में सुख-शांति, धनलक्ष्मी का भी वास होता है। वट वृक्ष रोग नाशक भी है। वट का दूध कई बीमारियों से हमारी रक्षा करता है।