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कर्मवार ठाकुरों की कुलदेवी डुमरी बुजुर्ग की कराती माई

धर्म एवं आध्यात्म [अनूप नारायण] :

दक्षप्रजापति क्षॆत्र व हरिहर क्षॆत्र की सीमा स्थित नयागाँव डुमरी-बुजुर्ग गाँव में सर्वेश्वरी की सातवीं शक्ति माँ कालरात्रि न सिर्फ कर्मवार ठाकुरों की कुलदेवी हैं,बल्कि सर्वशक्ति अराध्य व उपास्य हैं। जग्दगुरू आदि शंकराचार्य से लेकर अघोराचार्य बाबा कीनाराम,अवघरेश्वर भगवानराम व महाकपालिक बाबा सिद्धार्थ गौतमराम की अराध्य भवानी से लेकर संपूर्ण गँगा गंडक बउधा गंडकी माही नदियों से घिरा सारण की अरण्यक संस्कृति क्षेत्र में शक्ति की भक्ति में निरंतर प्रवाह्यमान हैं।फिर भी सर्वपूजित कालरात्रि भवानी के दरबार ने सबों की झोली भर दी है। गंगा व माही के संगम पर स्थित डुमरी-बुजुर्ग की कराती माईमाँ कालरात्रि सब की इच्छा पूर्ण करती हैं।

प्रदेश राजधानी व जिला मुख्यालय से दूरी:-प्रदेश राजधानी पटना से 65किमी(दीघा-पहलेजा रेल व रोड मार्ग से 30किमी) जिला मुख्यालय छपरा से 45किमी सोनपुर प्रखंड मे है यह शक्ति पीठ। श्रद्धालुओं के लिए धर्मशाला,गेस्ट हाउस व पर्यटन विकासार्थ सांसद व केंद्रीय राज्यमंत्री राजीवप्रताप रूडी भाजपा प्रदेशमहामंत्री विनय व जिला भाजपा नेता व बीडीसी ठाकुर उदय प्रताप सिंह ,बिस्कोमान अध्यक्ष सुनील सिंह अम्बिका भवानी व माँ कालरात्रि दोनों स्थलों के लिए कई बार संकल्प लिया है।

शास्त्रीय प्रमाण
यद्यपि मंदिर व विग्रह का किसी पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख नहीं है। गंधर्व संहिता में वर्णित शुकर,वराह,पलास व हरिहर क्षेत्र मोक्षधाम हैं। सोनपुर क्षेत्र व दक्ष क्षॆत्र की सीमा पर विजय-दायिनी व मोक्षदायिनी स्थित हैं।जो तमोगुणी महाकलि चामुंडा ,चंडी ,तारा,छिन्नमस्तिका,कालरात्रि नाम से पूज्य हैं।

सोनपुर को शोणितपुर का तद्भव मानते हुए भाषाविद् डाक्टर राजेश्वर सिंह राजेश ,पत्रकार विश्वनाथसिंह अधिवक्ता जैसे विद्वानों का मत है कि द्वापर में असुरराज बाणासुर की राजधानी शोणित पुर थी। बाणासुर ,उसकी कन्या उषा व तांत्रिक चित्रलेखा की अराध्य देवी कालरात्रि ही थी। बहरहाल,श्रीकृष्ण-बाणासुर संग्राम,शंकर का बाणासुर के पक्ष मे युद्ध करना वैष्णव व शैव संधि अनिरूद्ध-उषा विवाह में मांकालरात्रि के आशीष से ही संभव हुआ होगा।

ऐतिहासिक प्रमाण
विद्वानों के अनुसार 1193मॆं अंतिम हिन्दू-सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पतन के बाद क्षत्रियों अरण्यक भूमि सारण में प्रवेश की। चौहान परिहार-नरौनी दीक्षित-नेवतनी ,कुशवंशी आमी दिघवारा में बसे। वैस व कर्मवार सोनपुर नयागाँव व डुमरी में बस गए । डुमरी-बुजुर्ग व शोभेपुर के बीच माही नदी तट पर सारणगढ़ टीला विद्यमान है। मिथिलानरेश शिवसिंह व हाजी इलियास के बीच युद्ध में राजा की वीरगति के बाद तुर्क-अफगानों ने हरिपुर का नाम हाजीपुर रख दी।

सोनपुर पर अधिकार के बाद अफगानी-मुगल फौज ने सारणगढ़ की घेराबंदी की। क्षत्रियों ने माँ का स्मरण किया,गदहा-वाहन पर सवार माँ कालरात्रि ने दर्शन दी और आतंकियों का शिरोच्छेदन की आज्ञा दी। क्षात्रतेज व शक्ति बल से उत्साहित रण नाहर ठाकुरों की तलवार कहर बन कर टूट पडी। पराजित तुर्क अनिसाबाद बैरंग वापस हो गए।तब से आज तक कर्मवार ठाकुर कुलदेवी व क्षॆत्रवासी सर्वमंगला कॆ रूप में पूजते हैं।

500 वर्ष पुरानी है पिंडी
पूर्व मुखिया गोकुलानंद मिश्रा के अनुसार अमनौर,दरौली बलिया यूपी,कर्मवारीपट्टी के कर्मवार राजपूतों की कुलदेवी व ग्राम्यदेवी का निर्माण त्यागी बाबा की अगुआई में ग्रामीणों व अन्य गाँवों के सहयोग से हुआ। ब्रिटिशकाल में श्रीगणेशित निर्माण कार्य क्षॆत्रवासियों व जन प्रतिनिधियों द्वारा जारी है।