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संपादकीय : रोजगारविहीन विकास पर  समीक्षात्मक विश्लेषण की दरकार

शुभम मिश्र :-
काफी अरसे से हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी जारी है,और पिछले कुछ सालों में हुए बड़े सुधारों से उसे बुनियादी मजबूती मिली है। इस मजबूती की वजह से अंतराष्ट्रीय बाजार की उथल-पुथल को बहुत हद तक बर्दाश्त करने की क्षमता भी पैदा हुई है तथा भविष्य में वृद्धि  दर में बढ़त की संभावनाएं भी बनी हैं,लेकिन इस विकास का एक चिंताजनक पहलू यह है कि रोजगार के मोर्चे पर अपेक्षा के अनुरुप कामयाबी नहीं मिल पा रही है। बेरोजगारी के साथ ऐसे रोजगार की भी भारी कमी है ,जिनके जरिये कामगार अपने और अपने परिवार के जीवनयापन के लिए ठीक-ठाक आमदनी सुनिश्चित कर सकें ।



अक्सर हम खबरों में देखते हैं कि निचले स्तर के कुछ हजार सरकारी पदों के लिए लाखों युवा आवेदन करते हैं और उनमें से बहुत लोगों की शैक्षणिक योग्यता विज्ञापित पद से बहुत अधिक होती है।इसका एक कारण नौकरी की जरूरत है और दूसरा कारण निर्धारित वेतन का आकर्षण है।रोजगार न सिर्फ निजी और सार्वजनिक जीवन को ठीक से जीने के लिए जरूरी होता है,बल्कि वह समाज,देश और दुनिया के लिए उपयोगी एवं उत्पादक होने का अवसर भी होता है।रोजगार की कमी तथा कम वेतन का सीधा असर लोगों की खरीदने की ताकत पर होता है।यदि लोगों की क्रय-शक्ति घटती है, तो वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग भी कम होती है। ऐसे में औद्योगिक उत्पादन और बाजार की वृद्धि बाधित होती है, जो अंततः अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। अनेक शोध इंगित कर चुके हैं कि बेरोजगारी का संबंध सामाजिक हिंसा और अपराध के बढ़ने से है।बेरोजगारी, कामगार की क्षमता को भी कुंद करती है और उसे मानसिक कुंठा का शिकार भी बनाती है। मौजूदा माहौल में रोजगारविहीन विकास पर समीक्षात्मक विश्लेषण की दरकार है।इस कोशिश में उद्योग जगत और पूंजी बाजार को साथ लेकर सरकार को कारगर उपाय खोजने की आवश्यकता है।