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अलीगंज : मिट्टी के दीये से इस दीपावली का करें स्वागत, बाजारी चकाचौंध से रहें दूर

{अलीगंज | चन्द्रशेखर सिंह} :
दीपावली के दिन आने वाले हैं जिसकी तैयारियों में लोग जोर शोर से लगे हैं। अपने-अपने घरों की साफ-सफाई करने में भी लोग व्यस्त हैं। वहीं कुमहार जाति मिट्टी के दिये व घरौंदा बनाने में जोर से लग मिट्टी के दीपक  व अन्य समानों की तैयारी करने में महीनो दिनों से लगे हैं, ताकि दीपावली में अच्छी आमदनी हो सके।
मिट्टी के दीये पारंपरिक उद्देश्य की ओर संकेत देता है, ताकि लोग अपने मिट्टी से जुड़े रहे। लेकिन विडंबना है कि जो लोग मिट्टी के बर्तन तैयार कर मिट्टी से जुड़े हैं, उनकी ख्याल हम लोग व सरकार भी नही कर पा रही है।

उँगलियों में है जादू
मिट्टी की दीपक व बर्तन तैयार करने में कुम्हार के हाथ में जादुई तीव्रता होती है। वे चाक को नचाकर अपने से मिट्टी को जिस प्रकार पात्र या बर्तन बनाना चाहता हैं, उसे बना देते हैं।
बूढ़े हाथों से बच्चु पंडित किस प्रकार का दीपक व बर्तन बना देता है, उनके हाथ की जादू देखते बनती है। वे बताते हैं कि अभी परिवार के सभी सदस्य दीपावली को लेकर मिट्टी के दीपक बनाने में लगे हैं।

इन मिट्टी की कीमत कोई क्या देगा
मिट्टी से बने बर्तन की कीमत अब कोई नहीं दे सकता है। बच्चु पंडित के मुँह से निकला यह वाक्या सुनने में भले ही साधारण लगे पर इसके भावार्थ आधुनिकीकरण में विलुप्त होते पुराने संस्कृति की ओर इशारा करते हैं। बच्चु पंडित कहते हैं कि सुबह पानी और मिट्टी लेकर अपने काम में लग जाते हैं और दिन भर में एक हजार दीपक तैयार कर डालते हैं। वे कहते हैं कि मिट्टी की कीमत कोई नहीं दे सकता, परंतु ये मेरा पुस्तैनी पेशा है, जिससे मेरा परिवार का दो जून की रोटी जूटा लेता है।




समाजसेवी शशिशेखर सिंह मुन्ना बताते हैं कि लोग ज्यादा अब टेम्परोरी समान को अपना दैनिक कार्यों में प्लास्टिक का चीज कप ,गलास थाली उपयोग में लाने लगे हैं।और पुरानी चीजों व पूर्वजो के द्वारा उपयोग में लाये गये पारंपरिक चीज व कार्य को भुलते जा रहे हैं।अब भी लोगों को अपने पुराने ढररे पर लौटना होगा।नही तो एक दिन लोगों के बीच विकट समस्याओं से सामना करना पड़ेगा।ऐसे तो सरकार भी प्लास्टिक पर प्रतिबंद कर रखी है। 


▶ ▶बदलते मौसम में चाईनीज समानों ने बिगाड़ दी दुकानदारी


डब्लु पंडित एवं बब्लु पंडित बताते हैं कि इन दिनों चाईनीज समान व अनेक प्रकार की झालर बत्ती ने हमलोगों के धंधा को ठंडा कर दिया है। लेकिन पारंपरिक त्योहारों में हमारी हाथों की मिट्टी की बनी बर्तन की ही मांग होती हैं। आखिर होगी क्यूँ नहीं इसमें अपने माटी की खुशबू से मन संगंधित हो उठता है।