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आलेख : हर मनुष्य में जागृत हो दया की भावना


   [अलीगंज | राहुल कुमार]

उस दिन हल्की सी पानी की फुहार और ठंडी हवाओं ने मन सुहावना सा कर, जमीन पर धूप और आकाश में इन्द्रधनुष उतर आये थे। दाईं ओर अर्धनिर्मित मकान एवं आस-पास में लगे पेड़-पौधे आदि धुले-धुले से, साफ चमकते पत्तों में शीतलता का हल्की सी अंश घुल गया था। मेरी निगाहें उसी अधुरे मकान में लोहे की बनी खिड़की पे टीकी जिसमें पर्याप्त स्थान था। जिनके भीतर एक मैना दुबक कर बैठी थी और एक चिड़िया जो उसके ही
इर्द-गिर्द मौके की तलाश में घुम रही थी। जैसे ही मैना ने मुंह बाहर की ओर निकाला, अवसर मिलते ही चिड़िया उसके अन्दर घुस गई। अब मैना का मन मचलने लगता मगर जब चिड़िया के करीब मैना आती तब वो मुह अन्दर कर लेती। अब तो यह प्रतिदिन का किस्सा होने लगी थी। कभी चिड़िया बाहर तो कभी मैना बाहर। वे दोनों ही उस अधुरे मकान में अवश्य ही अपना-अपना आशियाना बना लेना चाहती थी।
वो दोनों ही इस मौके की तलाश में होते, इन्ही वज़ह से अक्सर लड़ते-झगड़ते एवं अपने पतले चोच से एक-दूसरे पर झपटते दिखाई पड़ते। जिनको जब मौका मिलता फुदककर अपना अधिकार जमा लेते थे। इन्हें देख ऐसा ज्ञात होता कि दोनों अपने स्वार्थ व अपना-अपना अधिपत्य के लिये लड़ रहा है। परंतु, ये अंदाज़ा लगाना कठिन था कि उस मैना और चिड़िया में कौन किरायेदार है और कौन मकान मालिक। घड़ी दो घड़ी छोड़कर अधिकांश समय दोनो पक्षियो का खेल चलता रहता। जिसे देख चिंता वाज़िब है कि कभी तो दाना चुगने जाते हैं,  इन्हें प्यास लगता या नहीं। इन दोनो को अकेले मन कैसे लगता है 'या' कहीं इस आशा  में तो नहीं कि हमे इस कोठी मे तनिक जगह मिले।
  पक्षियो का ये सिलसिला कई दिनो से चल रहा था। उसके साथ ही घर मे काम भी जारी...  जिसमे अब, कारीगर तह पर तह 
ईंट लगाकर मकान से भवन बनाने के अंतिम कगार पर था। फिर उस भवन के मालिक ने लोहे की खिड़की मे जाली एवं पेंट लगवा दिये। जिसपर हक जमाने और कबज़ाने के लिए हर
रोज अनेक किस्म के तरकीब खोजते और एक प्रवेश कर जाते थे। आखिरी बार उसे शानदार भवन के पास से गुजरते तार पर साथ मे बैठा दिखा था।
इतने दिन हो गया ना, 'फिर कभी
वो मैना दिखा ना, 'ही चिड़िया। ये हमे नहीं पता कि नये कोठी के तलाश मे वे दोनो कहां गयें।
खैर इन पक्षियों के साथ ऐसा तब भी होता हैं, 'जब किसी वृक्ष की टहनियो पर इनका खुद का जायदाद होता है ।और लोग इसे देखे-सुने बिना ही ध्वस्त कर देता है। वे सब पंछी दाना चुगकर जब घर आता है तो पाता है, कि घोसले के साथ-साथ पेड़ भी ...
पक्षियों से लोगों का क्या लेना-देना है। कम से कम इतना तो पता करनी चाहिए कि जिस पेड़ या तना की कटाई करवा रहे है ।उनपर किसी पक्षियों का घर- बार तो नहीं। कहीं उनके बाल, बच्चा तो नहीं ये हम क्यों नही सोचते हैं कि एक वृक्ष में कितने जीव निवास करते हैं। इनके धाराशाई होते ही सब के सब तमाम उम्र बिना घर के हो जाते हैं।

(ये लेखक के अपने नीजि विचार हैं, उक्त आलेख इनकी अपनी रचना है जो इस पाॅर्टल के लिए लिखी गई)
संपर्क:- 9661003520 /राहुल कुमार