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आलेख : मेहनत की कमाई

Photo - Rahul Kumar

[gidhaur.com | आलेख/रचना] :- मार्च  महीने की  गुनगुनी दोपहर को जब मैं सैलून गया तो नाई ने वहाँ लगे फ्रेम की ओर हमें इशारा किया। जिसमें स्टाइल से बाल कटवाए हुए लोगों का तस्वीर लगा था। पर मैं उनलोगों में से नहीं था। हाँ, एक आदत है मेरा वो-ये हैं कि अन्य दुकान न जाने के बजाय भीड़-भाड़ मे थोड़ा ठहर जाने की। उस सैलून में आईने के समीप पड़े अखबार को मैं बड़े आराम से पढ़ रहा था । तभी एक बच्चे कि भीख मांगने का आवाज़ पास से आने लगा। उसके लगातार चिल्लाए जाने पर नाई को गुस्सा जरूर आया होगा। वे भी  सिर पर कैंची रोककर झाका बच्चा काफी छोटा था, वे अपने को शांत किया। फिर काम निपटाते हुए आकर बोले, 'इधर सफाई करोगे।' बच्चा क्षण भर के लिए शांत हुआ। और फिर 'बाइया भीख दो ना' कहने लगा। इस बार जब वो पल के लिए शांत हुआ तो नाई ने वही सवाल किया मगर इस बार बच्चे ने स्वीकृति वाले ढंग से गर्दन हिलाया तभी वे काम बताकर खुद भी व्यस्त हो गया। कुछ देर बाद बाहर आया तो देखा बच्चा कटोरे मे रखे सिक्के से खेल रहा है। उस अजनबी नाई ने उस बच्चे से पूछ दिया तुमने बाहर साफ क्यों नही किया? तो उसका जबाव था नही' "मुझे भीख चाहिए, हमे भीख लाने के लिए कहा गया, कुछ भी दे दो। उस बच्चे की ये बात मेरे कानों  से तुफानो की तरह उतरा।अखबार को ओझल कर बाहर आ गया और उस बच्चे से मै भी कहा कि
तुम दुकान  सफाई करोगे तब तुम्हे कुछ मिलेगा मगर भीख नही, तुम्हे तुम्हारे ' परिश्रम के पैसे वो भी तीस रूपये मिलेगा।बच्चा का मन छलाँगे भरने लगा और कुछ कहे बिना दुकान की साफ-सफाई करने लगा। ज़ाहिर है बच्चा काफी छोटा था पर 'आरे-तिरछे' हाथ चलाना अच्छी तरह जानता था। मै सैलून के पास  ही   उस बच्चे को देख रहा था। वो बच्चा बार-बार पूछता मै झाड़ू ठीक से लगाता हुँ न,हाँ बहुत सुन्दर...।
उसी दरमियान उसने पूछने पर  अपना नाम सकलदेव बताया। पर  दिल के एक छोर पर अब भी कई  बात खटक रहा था ।कि नाई और सकलदेव के बीच हमें आने का क्या जरूरत था। और महज़ 6-8 साल के बच्चे से सफाई करवा रहा था, की बच्चे के दिल -दिमाग में परिश्रम से कमाने की इच्छा जागृत हो। भोले-भाले बच्चे को भीख ना देने के पीछे यही इरादा रहा की उसके  मन मे काम करने कि इच्छा जागे। मैने उसके हाथ पर मेहनत की कमाई यानि ' तीस रुपये देते हुए कहा, ' अब यहाँ आकर कभी मत कहना 'बाईया भीख दो न'। पता नही उसे मेरा बात समझ आया या नहीं पर उस घड़ी मेरा दिल आनंद दे रहा था ।तो कहीं पीड़ा भी कि जिस बच्चे को अभी स्कूल मे होना चाहिए था। वो कितने गलिया या चौक से गुजर रहा है ।
                (राहुल कुमार)
अलीगंज(जमुई) |   04/06/2018, सोमवार
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यह लेखक की स्वरचित रचना है, तथा कहीं अन्य जगह प्रकाशित नहीं की गई है।