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आलेख : मानव सेवा से बड़ी कोई सेवा नही हैं

[gidhaur.com | (आलेख)] :-  जिस राह से हमसब  गुज़र रहे थे, उस से हम पूरी तरह अंजान थे इसी वजह से मैंने वहीं का एक गाइड को चुना, जो इस रास्ते को कई बार तय किये थे। वे बीना कुछ सोचे समझे कदम बढ़ाते न अगल देखते न बगल...कभी-कभार ठहर कर ये ज़रूर देखते कि हमसब कितने दूर हैं। निर्मल मन और सुन्दर गुणवत्ता वाले उस व्यक्ति के नाम से भी अनजाना रहा मैं।
इस बार हमसबों ने राजगीर के चट्टानी पहाड़ों कि यात्रा करने का विचार किये,"जिसपे बुद्ध की पवित्र आत्मा कण-कण में समाहित है। हमसबों को पैदल चलकर भूतल से करीबन 100 फीट ऊंचाई तक पहुंचना है। यह हमारे पैरों और शरीर की कठिन परीक्षा थी । वे सिर्फ अपना गाइड ही नही है,"बल्कि हमारा समान उठाना भी उसी का काम है । सुबह यात्रा करने से पहले हमलोगो से पूछे बैग में सारा सामान है? मैंने रूककर कहा,"हाॅ पर, आपको ज्यादा लगे तो निकाल दें ।उन्होंने बिना कुछ कहे बगैर ही झटके से बैग उठाये बोले' चलिए,मुझे बड़ा अजीब-सा लगा मैंने तो सोचा था कि वे मोल-भाव कर बैग हल्का करवा देंगे। और हमारा सफ़र शुरू हुआ।गाइड ने शर्ट और पजामा पहन रखे थे। साथ  फिजूल की बातें को सुनने और देखने से वह परहेज करते रहे, वे हमसबों से लगभग तीन हाथ आगे चलते थे, चेहरा देख थोड़ा मुरझाई सी लगती थी। क्या वे हमारे धीमी चाल से उब रहे थे? या फिर जानते हैं की बोलने से उची जगहो यानि कि पहाड़ों में चढ़ने में उर्जा खत्म होती है? पता नही उनके तन-बदन मे क्या चल रहा है ।
वैसे अभी वो थोड़ी दूर रूककर हमलोगों का इन्तजार कर लेते तभी आगे कदम बढ़ाते, इसी बहाने पीठ पर से भरा बैग उतारा ज़रा जगह-जगह पर आराम कर भी लेते थे। मैं जब भी बैग उठाते देखता हूं तो मुझे दया आती है कि बैग थोड़ा हल्का हो सकता था । वे बोलते कम पर समझते सब है, जब हमलोगो ने पहाड़ के चौड़े रास्ते मे थोड़ा लंच लेना चाहा तो  उन्होंने उन स्थान को साफ सुथरे व जल का छीटा लगाकर स्वच्छ कर दिये । पहाड़ों के प्रति उनकी भक्ति भाव देखती ही बनती।हम ऊपर पहुंच, महान प्रतिमा भगवान बुद्ध के पास आयें हैं,  उनके दर्शन करने। हाथ-पाँव धोकर अन्य श्रद्धालुओं -शैलानीयों की तरह हमसबों के संग वो गाइड भी कुछ पल तक भगवान् बुध्द के दया या मैत्री भाव मे खो  गयें..।
अब हमसब जरूरत का समान खरीद नीचे उतर रहे हैं , उनका स्वभाव थोड़ा बदल सा गया हैं । जब वे गाइड पहाड़ पे चढते वक्त मज़ाक की बातो मे उतना रूचि नहीं दिखा रहे थे, जितना पहाड़ों पे बसे भोले-भाले पशु पक्षियों को  देख मुस्कुरा रहे है 'हाॅ' वे गाइड अब एकाध बातो को छोड़कर हर बात का जवाब दे रहे थे। उन्होंने चमकते हुए चेहरे से बताये की उन्हें हमसब पर नाज़ है  ।  
कि कितना उतावला थे  शांति के संदेश देने वाले उस ईश्वर से भेंट के लिए ।
उस ढलती शाम मे... गाइड ने अपने बारे मे बहुत कुछ बताये । मुझे यह सुन, आश्चर्य हुआ कि,  बंजारे मन वाला व्यक्ति सावन के महीनों में देवघर बाबा वैद्यनाथ के दर्शन आने जाने वाले काँवरिया बम की सेवा में लग जाते हैं।और नि: स्वार्थ भाव से बम की सेवा करते हैं।और कहते कि मानव सेवा से बड़ा कोई सेवा नही है।दिल से सेवा करने वाले को भगवान भी दिल से मदद करते हैं।

(राहुल कुमार)
अलीगंज | 09/04/2018, सोमवार
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