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दुर्गा पूजा : प्रतिमा निर्माण का कार्य जारी, माता के आगमन की शुरू हुई तैयारी

Gidhaur.com (दुर्गा पूजा विशेष) : माता के आगमन की तैयारी शुरू हो चुकी है. इस वर्ष शारदीय नवरात्र 21 सितम्बर से प्रारंभ हो रही है. जिसके मद्देनजर गिद्धौर स्थित दुर्गा मंदिर में माँ दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण कार्य जारी है. गिद्धौर राज रियासत के चंदेल वंश के आठवें शासक महाराजा पूरनमल ने लगभग चार शताब्दी वर्ष पूर्व गिद्धौर के उलाई नदी के तट पर माता के मंदिर का निर्माण कराया था. जहाँ माँ दुर्गा की पूजा विधि-विधानपूर्वक होती आ रही है.


पूजा के लिए माँ दुर्गा की प्रतिमा को मूर्तिकार राजकुमार रावत द्वारा अंतिम रूप दिया जा रहा है. कलाकार मां की प्रतिमा को कुछ ऐसा रूप देने में जुटे हैं कि मानो वह मूर्ति न होकर साक्षात माँ जगजननी हों.
मूर्तिकार राजकुमार रावत ने बताया कि पौराणिक नियमानुसार भाद्रपद कृष्णपक्ष की अमावस्या तिथि से मूर्ति निर्माण कार्य शुरू हो जाता है. जिसके लिए पूजा-संकल्प लिया जाता है. माँ की प्रतिमा बनाने के लिए बनारस की गंगा से मिट्टी लाई जाती है. इसके अलावा प्रतिमा नवरात्र की सप्तमी की शाम तक पूरी तरह बनकर, रंग-रोगन एवं वस्त्र सहित तैयार हो जाती है.
यहाँ पुराने समय से यह रिवाज चला आ रहा है कि मूर्ति पर किसी भी प्रकार का रंग, यहाँ तक की सफ़ेद रंग का अस्तर भी नवरात्र के प्रथम पूजा से ही डाला जाता है. उसके पहले प्रतिमा पर किसी भी प्रकार के रंग का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. सभी वस्त्र बनारस से मंगाए जाते हैं.
नवरात्र के दूसरे पूजा के दिन माता की प्रतिमा में आँखें बनाई जाती है. विशेषता है कि अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा में रंग द्वारा ही पलकें भी बनाई जाती हैं, लेकिन माँ दुर्गा की प्रतिमा में पलकें नहीं होतीं. प्रतिमा रंगने के लिए फैब्रिक कलर का इस्तेमाल होता है.
सप्तमी की मध्य रात्रि अष्टमी के प्रवेश अर्थात निशापूजा के पहले माता की प्रतिमा को वस्त्रालंकार, आभूषण एवं राज-रियासत के ऐतिहासिक, करीबन ढाई किलो वजन के मुकुट से सुशोभित किया जाता है. यह मुकुट स्वर्ण एवं विभिन्न धातुओं के समिश्रण से बना है. इसके अलावा मुकुट में पन्ना, नीलम आदि जैसे रत्न भी जड़े हैं.
माँ दुर्गा की प्रतिमा का स्वरुप भव्य होता है. जिसमें माता रानी महिषासुर का वध करती नजर आती हैं. प्रतिमा में माँ के साथ गणेश, कार्तिक, सरस्वती, लक्ष्मी, भगवान् शिव एवं माता का वाहन शेर भी रहता है. इन सभी के साथ जया-विजया नामक दो परिचारिकाओं की भी प्रतिमा होती है जो माता शेरावाली को चंवर डुलाती नजर आती हैं.
मूर्तिकार माँ की प्रतिमा को इतना विहंगमता प्रदान करते हैं कि लगता है मानो माँ अब बोल उठेंगी. भक्तगण माता का दर्शन कर मोहित हो जाते हैं.

मूर्तिकार राजकुमार बताते हैं कि वो यहाँ गत 19 वर्षों से माँ की प्रतिमा बनाते आ रहे हैं. उन्होंने मूर्ति निर्माण कला की शिक्षा बनारस से ली है.

(सुशान्त साईं सुन्दरम्)
गिद्धौर        |        06/09/2017, बुधवार
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