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गिद्धौर : नटों ने दिखाया करतब, खूब बजी तालियाँ, बमुश्किल जुटाते हैं अनाज


Gidhaur.com (ख़ास खबर) : गौर से देखिए इन कलाकारों को, एक तरफ जहां मंच सजाकर बैठने के लिए कलाकारों के लिए गद्दे सजाये जाते हैं वही दुसरी तरफ ऐसे कलाकारों के लिए सड़क किनारे एक चटाई भी नसीब नही हो पाती। ऐसे में अंग्रेज़ी की एक पंक्ति यहाँ कहना सही रहेगा - 'Colour doesn't matter, content does.'
बुधवार की सुबह गिद्धौर महावीर मंदिर के पास खड़े गिद्धौर वासियों के कानों मे कर्णप्रिय ध्वनि पहुंची तो आसपास के सारे लोग अपने दुकानों से निकलकर बाहर देखने के लिए मजबूर हो गये और फिर दिखाई पड़ी मधुर संगीत पर नृत्य व सर्कस की कला दिखाते बंजारों के छोटे-छोटे बच्चे। जो वास्तव में प्रशंसा के काबिल खेल दिखा रहे थे। अगर आप भी यह कला देखते तो आपके मुंह से भी अनायास ही यह निकल पड़ता कि ये कला अच्छे साज-बाज के साथ अगर स्टेज पर दिखाई जाती तो इनकी काबिलयत के लोग कायल हो जाते। लेकिन इनका दुर्भाग्य ही कहा जाए कि इनकी जिन्दगी में सड़क पर खेल दिखाना ही लिखा है। 'स्टेज' और 'मंच' जैसी संज्ञा से तो ये अब भी बेखबर हैं।

ये बेचारे गरीब खेल-तमाशे दिखा कर ही अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं। स्टेज तक पहुँचकर उच्च स्तर तक खेल-तमाशों का प्रदर्शन करने की बात तो ये लोग सोच भी नहीं सकते।


ये लोग खेल तमाशे दिखाकर आजीविका चलाते हैं। गली-गली, शहर दर शहर, गाँव-गाँव, अपना ये छोटा सर्कस का खेल दिखा कर अपना गुजारा चलाते हैं। इनके पास अपना खुद का  साज-सामान भी है। जिसमें ढोलक, बैटरी से चलने वाला पियानो, स्पीकर, डेक, माईक भी शामिल है। और गाने की इनकी खुद की आवाज तो कमाल है ही।
अब आपको इस खेल तमाशे के काल्पनिक दृश्य से अवगत कराते हैं। एक छोटी सी लड़की जिसकी उम्र तकरीबन 10-12 होगी, वो अनोखे करतब दिखा कर लोगों का मन मोह रही थी। अब आप सोचेंगे की अनोखा क्यूँ? अगर कोई 12 साल की लड़की बिना किसी सहारे के रस्सी पर इस छोर से उस छोर जा रही है, लोगों व दर्शकों को सलाम नमस्ते   कर रही है, दोनों हाथ उठाकर सबका अभिवादन कर रही है, इसे अनोखा नहीं तो और क्या कहेंगे।
इस लड़की का प्रदर्शन समाप्त होने ही वाला था कि 20-22 वर्षीय युवक ने वो तमाशा प्रस्तुत किया जिसकी पेशकश ने खूब तालियाँ बटोरी।पन्द्रह मिनट के तमाशे में मौजूद हर दर्शक के जबान से भी यही आवाज आ रही थी कि, वाह! क्या बात है! पर इनका नसीब की ये लोग सिर्फ 10 -20 रूपये के लिए ही सड़क किनारे खेल दिखा कर अपनी आजीविका चला रहें हैं।गिद्धौर के दर्शकों ने इनके खेल और कला को सराहा।
अब जरा सोचिये, ना कोई दवा-न-दारू बिका और ना की किसी वस्तु का प्रचार होता है,  मात्र अपने बच्चों द्वारा जान जोखिम में डालकर कला दिखा कर अपनी आजीविका के लिए कुछ रूपये बटोरकर अपने अगले नुक्कड़ की ओर चल देता है। इसे इनका स्वाभिमान ही कहिये कि खेल के अंत में जब मैंने खेल तमाशे दिखाने वाले से पूछा तो उनका कहना था-"जेत्ते छौ, पेट त भर जेते, लेकिन मन नय"।
विचारणीय योग्य यह है कि मंच पर ऐसे प्रदर्शन करने वालों के लिए 100-500 बतौर इनाम दे देते हैं। आव-भगत होती है वो अलग।
और सड़क पर प्रदर्शन करने वाले इन बेचारों को लोग 10 रूपये देने से कतरा रहे थे।
यदि ऐसे ही इनकी कला को लोग सिर्फ मनोरंजनार्थ देखते रहे, तो इनकी मेहनत, इनकी प्रतिभाएं यूं ही किसी दिन किसी सड़क किनारे दम तोड़ती नजर आएगी। मंच की कला सड़कों पर दिखाइ जाने वाली कला के समतुल्य है। बस फर्क है सिर्फ इसे पहचानने वाली नजर की।


(अभिषेक कुमार झा)
गिद्धौर      |      03/09/2017, रविवार 
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